वोटों के विकेट

कोरोना से ठप हुए उद्योग-धंधों को फिर से चालू करवाने के मामले में हर कोई रक्षात्मक खेल खेलने में लगा है। उद्योग-धंधे वापस शुरू हो न हों, पर वोटों पर कोई संकट नहीं आना चाहिए!

By: भुवनेश जैन

Published: 06 May 2020, 11:50 AM IST

- भुवनेश जैन

क्रिकेट का एक बेहद जाना पहचाना शब्द है ‘रक्षात्मक’ या ‘डिफेन्सिव’ खेल। रक्षात्मक खेल तब होता है जब खिलाड़ी रन बनाए या न बनाए, उसे ‘अडऩा’ बहुत अच्छे तरीके से आना चाहिए, ताकि विकेट बचा रहे। कोरोना से ठप हुए उद्योग-धंधों को फिर से चालू करवाने के मामले में हर कोई रक्षात्मक खेल खेलने में लगा है। उद्योग-धंधे वापस शुरू हो न हों, पर वोटों पर कोई संकट नहीं आना चाहिए! केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, सत्तापक्ष और विपक्ष, सभी रक्षात्मक खेल खेलने में लगे हुए हैं। व्यवस्था पुन: पटरी पर आए या न आए- वोटर कब्जे में बना रहना चाहिए।

कोरोना संकट शुरू होने के बाद केन्द्रीय गृह मंत्रालय और राज्य सरकारें अपने-अपने तरीके से नित नए आदेश और दिशा-निर्देश निकालने में लगे हैं। एक दूसरे से कोई तालमेल नजर नहीं आता। इस बात की भी कोई चिंता कहीं नहीं दिखाई देती कि ठप आर्थिक गतिविधियां फिर से शुरू हों। बस आदेश निकालने से मतलब- लागू हो पाएगा या नहीं, किसी को कोई लेना-देना नहीं है।

सबसे पहले लॉकडाउन-01 शुरू होते ही सारे कल-कारखाने, दफ्तर-बाजार बंद कर दिए गए। इसके साथ ही यह आदेश निकाल दिए गए कि भले ही कारखाने चलें या बंद हों, कामगारों को वेतन पूरा देना होगा। जब लॉकडाउन 01 व 02 खत्म होकर लॉकडाउन-03 लागू हुआ तो आदेश आया- चाहे ग्रीनहो, ऑरेंज हो या रेड जोन- हर जोन में कल-कारखाने चल सकते हैं। इसके समानान्तर ही एक आदेश जारी कर दिया कोई कामगार कारखाने न जाकर घर जाना चाहे तो जाए-टिकट का पैसा सरकार देगी। क्या घालमेल है! एक तरफ फैक्ट्री, उद्योग-धंधे खोल रहे हैं, दूसरी ओर मजदूरों को घर भेज रहे हैं। फिर कारखाने कैसे चलेंगे? क्या घर लौट चुके कामगार मजदूरों को वापस काम पर लाना आसान होगा। वह भी उस हाल में जब काम पर नहीं जाने वालों को भी वेतन मिलने के निर्देश हैं।

हर कोई रक्षात्मक खेल खेल रहा है। कांग्रेस और भाजपा में वोट बटोरने की होड़ लगी है। उद्योग-धंधे फिर से चलें, अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़े-इसकी किसी को चिंता नहीं है। जिन्हें उद्योग शुरू करने हैं-उनके सामने क्या वास्तविक समस्याएं आ रही हैं- यह कोई नहीं देख-सुन रहा। उनको वेतन किसी का काटना नहीं है। बिजली-पानी के स्थाई शुल्क में कोई छूट मिलेगी नहीं। बैंकों के ऋण को ब्याज सहित चुकाना है और सरकार मजदूरों को घर भेजने की व्यवस्था में जुटी है, अब आपको बिना मजदूरों के फैक्ट्रियां चलाने का हुनर दिखाना है। ऊपर से कोरोना के नए ‘इंस्पेक्टर राज’ से भी जूझना है।

क्या वोटों के विकेट बचाते हुए खेलने वाले राजनीति के इन रक्षात्मक खिलाडिय़ों से जीत दिलाने वाले किसी तेज और आक्रामक खेल की उम्मीद की जा सकती है?

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