बने आम सहमति

बने आम सहमति
presidential election

Shankar Sharma | Updated: 13 Jun 2017, 10:57:00 PM (IST) विचार

राष्ट्रपति एक संवैधानिक पद है और कोशिश की जानी चाहिए कि इसका चुनाव आम सहमति से हो। सिर्फ मतों की संख्या के आधार पर तौलकर नहीं देखा जाना चाहिए

राष्ट्रपति चुनाव के लिए आज अधिसूचना जारी हो जाएगी। सभी प्रमुख राजनीतिक दल और गठबन्धन देश के लिए नया 'महामहि' चुनने की रणनीति बनाने में जुटे हुए हैं। कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्षी खेमा यूपीए प्रत्याशी चयन के लिए पहले ही समिति का गठन कर चुका है।

सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष ने भी आम सहमति का प्रत्याशी तय करने के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित कर दी है। ये समिति भाजपा के सहयोगियों केअलावा विपक्षी दलों के साथ बातचीत करके प्रत्याशी चयन के लिए आम सहमति बनाने के प्रयास करेगी। भाजपा की पहल अच्छी है लेकिन यही पहल अगर दस-पन्द्रह दिन पहले की जाती तो कुछ नतीजा निकलने की उम्मीद बंधती।

राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन भरने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद आम सहमति के प्रयास करना किसी दिखावे से कम नहीं है। सन1977 में नीलम संजीव रेड्डी को छोड़ दिया जाए तो अब तक किसी राष्ट्रपति को निर्विरोध निर्वाचित होने का सौभाग्य नहीं मिला है। प्रत्याशी चयन में आम सहमति बनाने के प्रयास हर बार हुए लेकिन कभी परवान नहीं चढ़ पाए। आम सहमति के प्रयास इस बार अब तक तो शुरू भी नहीं हुए हैं।

राष्ट्रपति एक संवैधानिक पद है और कोशिश की जानी चाहिए कि इसका चुनाव आम सहमति से हो। इसे सिर्फ मतों की संख्या के आधार पर तौलकर नहीं देखा जाना चाहिए। सन 2002 में हुए राष्ट्रपति चुनाव का उदाहरण देश के सामने हैं। तब केन्द्र में सत्तारूढ़ अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने एनडीए की तरफ से महान वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को प्रत्याशी बनाया था।

विपक्षी दल कांग्रेस समेत अधिकांश दलों ने कलाम का समर्थन किया था। लेकिन वामपंथी दलों ने कलाम का विरोध करते हुए लक्ष्मी सहगल को उम्मीदवार के रूप में उतार दिया। कलाम राष्ट्रपति बने जरूर लेकिन मुकाबले के बाद। तब से लेकर बीते पन्द्रह सालों में देश की राजनीति काफी बदल चुकी है।

अब तो आम सहमति से प्रत्याशी चुनना तो दूर उसके बारे में सोचना भी हास्यास्पद सा लगता है। भाजपा ने आम सहमति का प्रत्याशी चुनने के लिए समिति भले बना दी हो लेकिन इसका नतीजा सबको पता है। दोनों खेमे एक-दूसरे के प्रत्याशी पर सहमत हो जाएं, इसके आसार कम ही लगते हैं। आसार 17 जुलाई को चुनावी मुकाबले के ही अधिक दिखाई दे रहे हैं।
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