scriptMahatma Gandhi's Ram does not scare anyone | किसी को डराते नहीं हैं महात्मा गांधी के राम | Patrika News

किसी को डराते नहीं हैं महात्मा गांधी के राम

गांधी उस दर्शन में पढ़े थे, जिसमें 'सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया:' ही था और वह उसे केवल 'हिंदू भवन्तु सुखिन:, हिंदू सन्तु निरामया:' नहीं पढ़ते थे।

Published: May 16, 2022 07:37:34 pm

नवनीत शर्मा
हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विवि में अध्यापनरत

गांधीगिरी, गांधीवाद, गांधी विमर्श के साथ माक्र्सवाद, अम्बेडकरवाद, समाजवाद, पूंजीवाद, धार्मिक राष्ट्रवाद, स्त्रीवाद, आधुनिकता, विज्ञानवाद अथवा अन्य सभी कल्पित और अकल्पित वाद गांधी की आलोचना और समालोचना से अपनी राजनीतिक विमर्श और राजनीति का प्रस्थान बिंदु चुनते हैं। गांधी के साथ असहमति कोई अपराध नहीं है और इस असहमति को कोई अपराध की संज्ञा देता तो गांधी ही इसका सबसे पुरजोर विरोध करते। गांधी के विचार और संदेश की आलोचना करते हुए हम गांधी के जीवन की आलोचना करने लगते हैं, शायद इसलिए क्योंकि गांधी ने स्वयं ही कहा कि, मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। गांधी को पसंद अथवा नापसंद किया जा सकता है, परंतु गांधी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इक्कीसवीं सदी के बाईसवें वर्ष में भी गांधी मानवीयता और राजनीति दोनों के लिए अपरिहार्य हैं। विभाजन, भगत सिंह की फांसी, सत्य के अनूठे प्रयोग, अहिंसा, सत्याग्रह, धोती, बकरी, लाठी, जैतून के तेल इत्यादि सबको लेकर आलोचना भारतीय विमर्श में व्याप्त है। बोस, पटेल, नेहरू, सीतारमैया, कानू एवं मनु गांधी, जिन्ना, महादेव देसाई इत्यादि सबके पक्ष और प्रतिपक्ष में गांधी की आलोचना हुई है। गांधी की अनुशंसा और आलोचना पर इतना वांग्मय है कि कुछ नया न कह पाने का संकट विराजमान है।
इसके बावजूद गांधी का नैतिक दर्शन बहुत सूक्ष्म है। उसे समझना होगा। उनके अनुसार कोई मनुष्य केवल इसलिए नैतिक न हो, क्योंकि अन्य की नैतिकता उसके अपने जीवन को सुखद बना देगी, इसलिए भी नहीं कि अनैतिक होने के कारण ईश्वर दंड स्वरूप उसे नरकगामी बना देगा। गांधी के राम अयोध्यावासी दशरथ के पुत्र राम न होकर एक आध्यात्मिक अवधारणा है। गांधी के राम, अल्लाह या ईसा के मानने वालों को डराते नहीं हैं, वरन मनुजता में आस्था रखने का संबल देते हैं। गांधी की नैतिकता अनीश्वरवादी अवश्य थी, परंतु ईश्वरविहीन नहीं। गांधी के खिलाफत आंदोलन के समर्थन और उसके सहारे असहयोग आंदोलन के विस्तार में धार्मिक सौहार्द और सहिष्णुता को पहली चुनौती चौरी-चौरा में मिलती है। यह गांधी सरीखा ही कोई अपनी नैतिकता के प्रति इतना निष्ठावान हो सकता है कि इतने व्यापक जन समर्थन और खुद के शुरू किए हुए जन आंदोलन से स्वयं को अलग कर सके।
हिंसा के प्रति महात्मा गांधी का दुराव इतना गहरा था कि वह उसका श्रेणीकरण न करके, नायक अथवा खलनायक की हिंसा न मान विशुद्ध हिंसा मानते थे। वे दोनों की हिंसा में कोई अंतर नहीं समझते थे। वे मानते थे कि हिंसा, प्रतिहिंसा सारी दुनिया को अंधा बना देगी। गांधी उस दर्शन में पढ़े थे, जिसमें 'सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया:' ही था और वह उसे केवल 'हिंदू भवन्तु सुखिन:, हिंदू सन्तु निरामया:' नहीं पढ़ते थे।
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