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Patrika Opinion: परम्परागत चिकित्सा को संजीवनी देने का प्रयास

दुनिया के पहले पारम्परिक चिकित्सा के वैश्विक केन्द्र की कोशिश होगी कि वह पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियों के प्रभाव को साबित करने के लिए वैज्ञानिक आधार पर शोध करेगा और उसके बाद उनके परिणामों को प्रमाणित करेगा। यह केवल इलाज के लिए ही काम नहीं करेगा, बल्कि पारम्परिक चिकित्सा में नवाचार और तकनीक के प्रयोग को भी बढ़ाने की दिशा में भरसक प्रयास करेगा।

Published: April 21, 2022 07:50:42 pm

आयुर्वेद समेत तमाम परम्परागत चिकित्सा पद्धतियों के मानकीकरण के प्रयासों में बड़ा कदम देश के भीतर उठाया गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ मिलकर बनाए जा रहे दुनिया के पहले पारम्परिक चिकित्सा के वैश्विक केन्द्र का शिलान्यास किया। दरअसल, इस केन्द्र की कोशिश होगी कि वह पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियों के प्रभाव को साबित करने के लिए वैज्ञानिक आधार पर शोध करेगा और उसके बाद उनके परिणामों को प्रमाणित करेगा। यह केवल इलाज के लिए ही काम नहीं करेगा, बल्कि पारम्परिक चिकित्सा में नवाचार और तकनीक के प्रयोग को भी बढ़ाने की दिशा में भरसक प्रयास करेगा।
प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र
यह ऐसी पहल है, जिसका स्वागत पूरी दुनिया को खुले दिल से करना चाहिए। आज नैचुरोपैथी से लेकर कई पैथी इलाज के लिए उपलब्ध हैं, लेकिन ज्यादातर के पक्ष में वैज्ञानिक आधारों का अभाव देखा जाता है। काफी हद तक ये पद्धतियां व्यक्तिगत पसंद और नापसंद का आधार बनकर रह गई हैं। ऐसे में सबसे मजबूती के साथ ऐलोपैथी उभरी और उसने दूसरी सभी परम्परागत चिकित्सा पद्धतियों को किनारे कर दिया। विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ मिलकर परम्परागत चिकित्सा पद्धतियों के वैज्ञानिक प्रमाण जुटाना न केवल इसकी विश्वसनीयता को बढ़ावा देगा, बल्कि इन पद्धतियों को देश और दुनिया के भीतर प्रामाणिकता के साथ स्थापित करने में मददगार बनेगा। इसके साथ ही आम लोगों को अपने इलाज के लिए दूसरे परम्परागत तरीके भी उपलब्ध हो सकेंगे।
दरअसल, पूरी दुनिया में परम्परागत इलाज की कई पद्धतियां आज भी न केवल अपना अस्तित्व बरकरार रखे हुए हैं बल्कि उपयोग में भी ली जा रही हैं, लेकिन दिक्कत यह है कि इनमें वैज्ञानिक आधार पर प्रामाणिकता की कमी देखी जाती है। कुछ पद्धतियां लुप्तप्राय भी हो चुकी हैं। ऐसे में इन पद्धतियों को खोजकर उनके वैज्ञानिक आधार जुटा कर उन्हें पुन: स्थापित करने और उपयोग में लाने से पूरी दुनिया को कई अहम तरीके इलाज के लिए उपलब्ध हो सकेंगे। इससे ऐसी कुछ बीमारियों के भी इलाज उपलब्ध हो सकेंगे, जिन्हें ऐलोपैथी में तो लाइलाज माना जाता है, जबकि दूसरी पद्धतियां उनके इलाज का दावा करती रही हैं। इससे दुनियाभर में न केवल रोजगार के नए अवसर उपलब्ध होंगे, बल्कि लोग दूसरे देशों की उपचार की पद्धतियों का लाभ भी ले सकेंगे।

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