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कर राजस्व पर निर्भर करेगा राजकोषीय घाटे का गणित

महंगाई पर अंकुश के कदमों से राजकोषीय घाटा ढाई से तीन लाख करोड़ रुपए तक बढ़ने का अनुमान

Published: May 24, 2022 04:45:25 pm

राधिका पाण्डेय

(सीनियर फेलो, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी)

केन्द्र सरकार ने खुदरा मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए कई उपायों की घोषणा की है, जो कि अप्रेल माह में आठ साल के उच्चतम स्तर 7.79 प्रतिशत पर पहुंच गई थी। इसमें लगातार चार माह तक ग्रामीण मुद्रास्फीति शहरी मुद्रास्फीति से अधिक रही। महंगाई पर आधारित थोक मूल्य सूचकांक अप्रेल माह में 15 प्रतिशत से ज्यादा ऊंचा रहा। इन राजस्व उपायों के तहत पेट्रोल पर 8 रुपए प्रति लीटर और डीजल पर 6 रुपए प्रति लीटर के हिसाब से उत्पाद शुल्क घटाया गया है। साथ ही प्लास्टिक व स्टील के कच्चे माल पर सीमा शुल्क भी घटाया गया है। इसके अलावा लौह अयस्क और इस्पात के मध्यवर्ती उत्पादों पर निर्यात शुल्क बढ़ाया गया है। सीमा शुल्क और निर्यात शुल्क बढ़ाने से लोहे व इस्पात की घरेलू कीमतें घट जाएंगी। इसके अलावा प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के 9 करोड़ से ज्यादा लाभार्थियों को एक साल में प्रति एलपीजी सिलेंडर 200 रुपए की सब्सिडी दी जाएगी।
प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र
वैश्विक स्तर पर उर्वरकों की बढ़ती कीमतों को देखते हुए सरकार ने 1.10 लाख करोड़ रुपए की अतिरिक्त सब्सिडी की घोषणा की है, जबकि बजट में पहले ही इसके लिए 1.05 लाख करोड़ रुपए दिए जा चुके हैं। बेहतर लॉजिस्टिक्स के जरिए सीमेंट की उपलब्धता में सुधार के प्रयास भी किए जा रहे हैं। ये उपाय दरअसल 4 मई को आयोजित बैठक में आरबीआइ द्वारा घोषित उपायों के पूरक हैं। इसमें आरबीआइ ने पॉलिसी रेपो रेट में 40 बेसिस पॉइंट और नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) में 50 बेसिस पॉइंट की वृद्धि की घोषणा की थी। ये उपाय महंगाई को कुछ हद तक कम करने में सहायक होंगे। खास तौर पर, पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती से मुद्रास्फीति में 0.2 से 0.3 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। प्रत्यक्ष प्रभाव के अलावा डीजल की कीमतों में कमी का अप्रत्यक्ष प्रभाव भी पड़ेगा जैसे ट्रक भाड़ा कम हो जाएगा और परिवहन की लागत कम आएगी। अन्य वर्ग भी इससे प्रभावित होंगे। जून में इन उपायों का असर दिखाई देगा, क्योंकि मई में अब केवल 10 ही दिन रह गए हैं। उर्वरक सब्सिडी दोगुनी करने से किसानों को राहत मिलेगी, लागत दबाव कम होगा और खाद्यान्न के दाम कम होंगे।
एक और राहत की खबर है कि इंडोनेशिया की सरकार ने 23 मई से पाम ऑइल निर्यात पर लगा प्रतिबंध हटाने की घोषणा की है। इससे खाद्य तेल की कीमतें कम होंगी। सरकार ने खाद्य तेलों पर आयात शुल्क घटा दिया है ताकि इनकी बढ़ती कीमतों को कम किया जा सके। सरकार के उपाय जहां अप्रेल में देखी गई रेकॉर्ड उच्च महंगाई को कम करेंगे, वहीं खुदरा महंगाई आने वाले महीनों में आरबीआइ की अधिकतम सीमा 6 फीसदी से बाहर बने रहने की संभावना है। इस महंगाई से मुकाबला करने के लिए आरबीआइ ब्याज दरें बढ़ा सकता है।
वैश्विक स्तर पर मूल्यों का दबाव अब भी बना हुआ है। हालांकि कच्चे तेल की कीमतें जो कि मार्च माह में 135 डॉलर प्रति बैरल रहीं, अब 105 से 110 डॉलर प्रति बैरल के बीच चल रही हैं। खाद्य एवं कृषि संगठनों के खाद्य मूल्य सूचकांक (एफपीआइ) में जरूर मार्च माह में दर्ज अब तक के सर्वाधिक उच्चतम स्तर से कुछ गिरावट देखी गई है, लेकिन अब भी यह गत वर्ष 2021 के अप्रेल माह के स्तर से अधिक है। धातुओं की कीमतों में अप्रेल माह से ही तेजी से गिरावट देखी गई है।
इस तरह के भी संकेत हैं कि अगर वैश्विक स्तर पर महंगाई का दबाव बना रहता है तो सरकार उत्पाद शुल्क में और कटौती व अन्य राहत उपायों की घोषणा कर सकती है। ये उपाय जहां महंगाई से राहत दिलाएंगे, वहीं इनके महत्त्वपूर्ण राजकोषीय निहितार्थ भी होंगे। पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती से करीब 85,000 करोड़ से 1 लाख करोड़ रुपए के बीच राजस्व भार पड़ेगा।
उधर, उर्वरक सब्सिडी दोगुनी करने से एक लाख करोड़ रुपए के राजस्व की हानि होगी। गैस सिलेंडर पर सब्सिडी देने से सरकार को 6100 करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान होगा। इसके अलावा पीएम गरीब कल्याण योजना के तहत 80,000 करोड़ रुपए की राजस्व हानि होगी। इन उपायों से राजकोषीय घाटा ढाई से तीन लाख करोड़ रुपए तक बढ़ सकता है। आरबीआइ से अपेक्षित से कम लाभांश सरकार के वित्त पर और दबाव डाल सकता है।
बजटीय राजस्व घाटे से विचलन की सीमा आने वाले महीनों में कर राजस्व के ग्राफ पर निर्भर करेगी। ऐसे संकेत हैं कि कर राजस्व, बजटीय कर राजस्व से ज्यादा हो सकते हैं। उस स्थिति में बजट राजस्व घाटा कम होगा। हर हाल में, शुल्कों में कटौती और सब्सिडी से सरकार के ऋण बढ़ेंगे। बॉन्ड के प्रतिफल और बढ़ सकते हैं। चूंकि आरबीआइ की पहली प्राथमिकता महंगाई पर नियंत्रण है, तो यह बॉन्ड प्रतिफल बढऩे देगा। आरबीआइ द्वारा बॉन्ड प्रतिफल कम करने का कोई भी जतन जैसे कि बॉन्ड खरीदना तरलता बढ़ाएगा और इससे उसके लिए मुद्रास्फीति प्रबंधन का कार्य और जटिल हो जाएगा।

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