रुदन नहीं, रोडमैप जरूरी

रुदन नहीं, रोडमैप जरूरी
Heavy rain in mumbai

Dilip Chaturvedi | Updated: 04 Jul 2019, 07:43:04 PM (IST) विचार

प्रकृति की लय और चाल बदली नहीं जा सकती। हमें ही कुछ ऐसे संतुलन-सेतु तैयार करने होंगे कि न कहीं नदी-नाले तबाही मचाएं और न कहीं सूखा पड़े।

मेघ जितनी उदारता से बरस रहे हैं, मुम्बई उतनी ही बेहाल होती जा रही है। कहा जाता है कि मुम्बई न कभी सोती है और न कभी ठहरती है, लेकिन पांच दिन से जारी मूसलाधार बारिश से देश की आर्थिक राजधानी में सब कुछ ठहरा-ठहरा-सा लग रहा है।

रेल और हवाई सेवाएं पहले ही गड़बड़ा गई थीं, मौसम विभाग की फिर भारी बारिश की चेतावनी के बाद मंगलवार को मुम्बई में सार्वजनिक छुट्टी का ऐलान कर दिया गया। स्कूल-कॉलेज और दफ्तर बंद रहे। पानी में डूबे कई इलाकों को देख कर लगता है, जैसे समुद्र तटबंध तोड़ कर मुम्बई में फैल गया हो। मुम्बई को हर साल ऐसी मानसूनी तबाही से दो-चार होना पड़ता है। हर बार तबाही से बचाने के लिए योजनाओं की रूपरेखा बनती है, लेकिन मौसम बदलते ही इन्हें फाइलों में दफन कर दिया जाता है। अब मुम्बई में राहत की नावों के साथ राजनीति के चप्पू भी चल पड़े हैं। मुम्बई महानगर निगम प्रमुख प्रवीण परदेशी ने छोटी अवधि में इतनी ज्यादा बारिश और इससे पैदा हुए बाढ़ के हालात के लिए जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ मुम्बई की भौगोलिक दशा को जिम्मेदार ठहराया है। प्राकृतिक आपदा का हवाला देकर प्रशासन अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकता। पिछली बार की गलतियों, खामियों और कमजोरियों से सबक लेकर बंदोबस्त के नट-बोल्ट कस दिए गए होते तो मुम्बई को साल-दर-साल यह सब नहीं झेलना पड़ता।

यह अकेले मुम्बई का संकट नहीं है। आने वाले दिनों में देश के कुछ और शहरों को मूसलाधार बारिश से यह संकट झेलना पड़ सकता है। चाहे वह स्मार्ट सिटी बनने में जुटे दिल्ली, बेंगलूरु, पुणे, चेन्नई, जयपुर, अहमदाबाद हों या लखनऊ, पटना, भोपाल और चंडीगढ़। विकास की दौड़ में इन तमाम शहरों में ऊंची-ऊंची इमारतें तो बेहिसाब खड़ी कर दी गईं, लेकिन न पानी की निकासी पर ध्यान दिया गया, न इसके संचय पर। बेहतर होगा कि हर बार भारी बारिश से पैदा होने वाले संकट को लेकर रुदाली की अदाकारी करने के बज ाय प्रशासन नगर नियोजन की उन खामियों का पता लगाए, जो किसी भी नगर के बंदोबस्त को भारी बारिश के दौरान पानी में बहा ले जाती हैं।

आज मुम्बई में मुसीबतों के जो पहाड़ खड़े नजर आ रहे हैं, उनके पीछे नगर नियोजन में अदूरदर्शिता और भ्रष्टाचार का भी बड़ा हाथ है। इस पहेली का हल भी खोजा जाना चाहिए कि देश के कुछ हिस्सों को हर साल भयंकर सूखे तो कुछ हिस्सों को बाढ़ की विभीषिका से क्यों जूझना पड़ता है । प्रकृति की अपनी लय, अपनी चाल है। उसे नहीं बदला जा सकता। हमें ही कुछ ऐसे संतुलन-सेतु तैयार करने होंगे कि न कहीं नदी-नाले तबाही मचाएं और न कहीं सूखे को अपना साया फैलाने का मौका मिले। मुम्बई जैसे संकट के स्थायी समाधान के लिए रोडमैप तैयार करने की ईमानदार कोशिश की दरकार है।

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