मां!

जो जगत् का सृष्टा, पालनकर्ता, नियंता है, उस माता-पिता रूप ईश्वर का क्या कोई एक निश्चित दिन हो सकता है? क्या कोई भी दिन उसके बाहर होना संभव है? तब क्या अर्थ ‘मदर्स-डे’ का, ‘फादर-डे’ अथवा ‘टीचर्स-डे’ का।

By: Shri Gulab Kothari

Published: 10 May 2020, 12:00 PM IST

- गुलाब कोठारी

‘पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामह:।
वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च।। (9.17)

गीता में कृष्ण कह रहे हैं कि इस जगत को धारण करने वाला पिता, माता, पितामह, जानने योग्य पवित्र ऊँ कार, ऋक्-साम-यजु:वेद भी मैं ही हूं।

जो जगत् का सृष्टा, पालनकर्ता, नियंता है, उस माता-पिता रूप ईश्वर का क्या कोई एक निश्चित दिन हो सकता है? क्या कोई भी दिन उसके बाहर होना संभव है? तब क्या अर्थ ‘मदर्स-डे’ का, ‘फादर-डे’ अथवा ‘टीचर्स-डे’ का। सब नकली चेहरे हैं-जीवन के। क्या इन्हीं माताओं के लिए ‘मातृ देवो भव’ या पिताओं के लिए ‘पितृ देवो भव, ‘आचार्य देवो भव’ कह सकते हैं। ये तो देवता हैं, जो प्राण (सूक्ष्म) रूप से हमारे जीवन को चलाते हैं। देवता दिखाई नहीं पड़ते। देवता भाव के भूखे हैं। माता-पिता शरीर नहीं हैं। हम भी शरीर नहीं हैं। आत्मा हैं, शरीर की तरह समय के साथ न पैदा होते हैं, न मरते हैं। शरीर बस एक मार्ग है आत्मा को 84 लाख योनियों में लाने, ले जाने का। जगत् का एक ही पिता है-सूर्य। वही आत्मा बनकर सबके हृदय में प्रतिष्ठित रहता है। ‘ईश्वर:सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति’ (18.6)।

तब हमारी ‘मदर्स-डे’ वाली माता कौन है जिसके लिए वर्ष में एक बार होली-दिवाली की तर्ज पर त्योहार मनाना चाहते हैं? शेष वर्ष (364 दिन) के लिए चर्चा से बाहर! क्या पंचमहाभूत की स्थूल देह को ‘मां’ कहना उचित होगा? क्या नवरात्रा में नौ दिन के अनुष्ठान की अधिकारिणी हो सकती है यह देह? यह देह तो प्राणीमात्र की, हर मादा की होती है। कोई भेद नहीं है। कार्यकलाप भी स्थूल दृष्टि से तो एक ही हैं। तब सभी प्राणियों की माताओं के लिए क्यों नहीं मनाया जाए मदर्स-डे?

मां एक सृष्टि तत्त्व है, प्रकृति है जो पुरुष के संसार का संचालन करती है। पुरुष आत्मा को कहते हैं। सृष्टि में पुरुष एक ही है। अत:सृष्टि पुरुष प्रधान है। शेष सब माया है। माया ही मां है। मातृ देवो भव।

मानव योनि कर्म प्रधान योनि है। शेष योनियां भोग योनियां हैं। अत: मानव पितृ-मातृ स्वरूप में दैविक आधार एक विशेष उद्देश्य लिए रहता है। हमारे शास्त्रों ने जीवन को पुरुषार्थ रूप में प्रस्तुत किया है। इसका अर्थ है-धर्म आधारित अर्थ और काम के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करना। अर्थात्-कामना मुक्त हो जाना। माया ही अर्थ और काम को धर्म रूप देती है। माता के रूप में अन्य योनियों से आए हुए जीव को प्रसव पूर्व मानव (संस्कार युक्त) बनाती है। इस पके हुए मटके का स्वरूप संसार की कोई शक्ति बदल नहीं सकती। माता केवल आकृति ही नहीं देती, प्रकृति में भी रूपांतरण करती है। अन्य मादा प्राणियों में यह क्षमता नहीं होती। सम्पूर्ण मानव सभ्यता को माता चाहे तो एक पीढ़ी में बदल सकती है। अभिमन्यु की तरह दीक्षित कर सकती है। आज शिक्षा ने नारी देह से ‘मातृत्व’ की दिव्यता को नकार दिया है। अत: विकसित, बुद्धिमान मादा रह गई है।

हर माता को गर्भकाल में अपेक्षित वातावरण नहीं मिलता। वह जानती है कि उसकी संतान में कौन सी कमी छूट गई है। कमी चूंकि आत्मा के स्तर की होती है-(संतान भी शरीर नहीं आत्मा ही होता है) अत: वह अन्न-ब्रह्म या नाद-ब्रह्म के सहारे संतान की आत्मा तक पहुंचने को रूपान्तरित करने का प्रयास करती है। मां की लोरियां उसकी आत्मा का नाद होता है। शरीर-मन-बुद्धि में यह क्षमता नहीं होती कि आत्मा तक पहुंच सके।

अन्न-ब्रह्म का उपयोग केवल भारतीय ‘मां’ (मदर नहीं) ही करती रही है। वह जो कुछ पकाती है, वह प्रसाद की तरह एक-एक ठाकुर (व्यक्ति) के लिए, उसे प्रसन्न करने के लिए, इच्छित वरदान मांगने के लिए पकाती है। ‘मेरा बच्चा यह खाएगा तो ऐसा हो जाएगा’। ‘मेरा पति यह खाएगा तो ऐसा हो जाएगा’। खाना खाते समय यह प्रार्थना संतान/पति के हृदय में सूक्ष्म रूप से पहुंचती रहती है। संपूर्ण परिवार संस्कारवान भी होता है और एक सूत्र में बंधा ही रहता है। इस दृष्टि से आज की माताओं को मदर्स कहना ही उचित है। वे ‘मां’ कहलाने योग्य नहीं हैं वे सन्तान के लिए खाना पकाना सजा मानती हैं। और ‘मां’ का एक नया रूप भी है। हर पत्नी में पति के लिए भी ‘मातृत्व’ भाव होता है। बुढ़ापे में तो सभी मानने लगते हैं। वह पच्चीस वर्ष की वय में प्रवृत्ति बन कर आती है। एक अनुभवहीन (जीवन दर्शन में) पुरुष के जीवन में आहूत हो जाती है। वही पुरुष के जीवन (अर्थ-काम) की हवन सामग्री बनती है। एक श्लोक है-आत्मा (पिता) वै जायते पुत्र:। केवल मां ही जानती है कि उसने पति को ही पुत्र बनाया है अत: उसे पूरी उम्र पति मान कर ही उसकी सेवा करती है। पुरुष के पत्नी को लेकर कोई स्वप्न नहीं होता। स्त्री सपने बुनकर पति से जुड़ती है। उसका पति कैसा होगा-खूब समझती है। पचास की उम्र उसकी निवृत्ति की है। इस गृहस्थाश्रम के पच्चीस वर्षों में श्रद्धा, वात्सल्य, काम और स्नेह के छैनी-हथौड़ी से पति की मूर्ति घड़ देती है-सपनों वाली। हालांकि उसका यह व्यवहार पति के मन में विमोह ही पैदा करता है। यही पत्नी की मां के रूप में उपलब्धि है। वह स्त्री से विमुख हो गया तो वानप्रस्थ और संन्यास में कामना मुक्त हो ही जाएगा। उसका मोक्ष तो निश्चित कर ही दिया न! सृष्टि में कोई भी प्राणी अन्य प्राणी के लिए नहीं जीता। आज तो शिक्षित व्यक्ति तो पशु ही है। देह मात्र उसका ध्येय है। ‘मां’ स्वयं अपने लिए नहीं जीती, न किसी पर अधिकार जताती है। सन्तान कुछ अच्छा कर भी दे तो मन ही मन गर्व कर लेती है। जीवन का कौनसा क्षण ‘मां’ के बाहर हो सकता है? पुरुष बीज है। उसके बाद उसके बिना सृष्टि चलती है, बीज के-ब्रह्म को केन्द्र में रखकर। मां ही गुरु होती है गुरु भी ‘मां’ बने बिना शिष्य की आत्मा तक नहीं पहुंच सकता। वहां पहुंचकर क्या मां, क्या गुरु, क्या संतान!

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