मातृभाषा से दूर जाने का अर्थ है समाज से कट जाना

राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने की लड़ाई जारी है। ‘राजस्थानी भाषा अकादमी’ की स्थापना की गई है। राजस्थानी भाषा को व्यवस्थित रूप से पढ़ाने की पद्धति और पाठ्यक्रम बनाने की दिशा में एक प्रयास है।

By: सुनील शर्मा

Published: 19 Feb 2021, 08:51 AM IST

- दलपत सिंह राजपुरोहित, अमरीका के टेक्सास विवि, ऑस्टिन में असिस्टेंट प्रोफेसर

- विशेष कोठारी, विजयदान देथा की कहानियों के अनुवाद के लिए चर्चित

मातृभाषा हमारी विरासत है, हमारी सांस्कृतिक स्मृति है। भाषा केवल संस्कृति और पहचान का अंग ही नहीं है, बल्कि भाषा अपने आप में ही संस्कृति है, हमारी पहचान है। मातृभाषा से कट जाने का अर्थ है समाज से कट जाना। राजस्थानी भाषा का ही उदाहरण लें। राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने की लड़ाई जारी है। ‘राजस्थानी भाषा अकादमी’ की स्थापना की गई है। राजस्थानी भाषा को व्यवस्थित रूप से पढ़ाने की पद्धति और पाठ्यक्रम बनाने की दिशा में एक प्रयास है।

राजस्थानी से जुड़े कुछ सवाल भी सामने आ रहे हैं। इनमें प्रमुख तो यह है कि राजस्थानी कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है, बल्कि हिंदी की ही बोली है। यह तर्क एक तरह से आजादी के आंदोलन के दौरान ‘हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान’ की लड़ाई का अवशेष है, जिसमें नए भारत की नई पहचान को हिंदी से जोड़ा गया था और बहुत सी स्थानीय भाषाओं को हिंदी की बोलियों का दर्जा दिया गया था। भाषा-विज्ञान के नियमों और इतिहास को देखा जाए, तो राजस्थानी हिंदी की बोली नहीं है। फिर भारत आज आजाद है, तो इस सवाल का अभी कोई महत्व नहीं रह गया है। आजादी के बाद कई दशकों से एकराज्य के रूप में राजस्थान एक इकाई है, जिससे हम ऐतिहासिक-सामाजिक रूप से जुड़े हुए हैं। अब प्रश्न उठता है कि जब हम सब भारतीय हैं, तब क्यों एक ‘राजस्थानी पहचान’ को हम पर थोपा जाए?

इसका जवाब यही है कि राज्यों का एकीकरण आधुनिक संस्थाओं यथा शिक्षा प्रणाली, न्याय प्रणाली, शासनप्रणाली इत्यादि की मांग भी है और देन भी। इसलिए हम इससे छुटकारा नहीं पा सकते। राजस्थान में अपनी भाषा और साहित्य की लंबी परंपरा थी। इसमें मारवाड़ी प्रमुख थी, जिसका साहित्य 15वीं सदी से मिलना शुरू हो जाता है। 16-17वीं सदी को राजस्थानी भाषा का स्वर्णकाल कहा जा सकता है। ‘राजस्थानी’ को पहली बार एक भाषा के रूप में कई सदियों बाद बीसवीं सदी के पहले दशक में ही पहचाना गया। हां, एक भौगोलिक इकाई के रूप में राजस्थान नामक संज्ञा का प्रचलन 19वीं सदी की शुरुआत से ही बढऩे लगा था, लेकिन ऐसी कोई पहचान नहीं उभरी जैसी मराठी, बंगाली आदि की उभरी। उस समय राजस्थान की पहचान हिंदी प्रदेश के साथ मिली हुई थी, लेकिन आजादी के बाद राजस्थान को राज्य का दर्जा मिला और पिछले सत्तर सालों में राजस्थान की अपनी पहचान निश्चित रूप से बन गई है। इसीलिए अब इसकी भाषा की बात आती है।

राजस्थान की बोलियों का संबंध राजस्थानी पहचान से आज से सौ साल पहले ही समझा दिया गया था। इसलिए सभी बोलियों की बजाय एक राजस्थानी भाषा, जो कई बोलियों की इकहरी पहचान है, उसकी संवैधानिक मंज़ूरी की संभावना बहुत अधिक है। साहित्य के स्तर पर और बोल-चाल के स्तर पर भी राजस्थान में भाषाई एकता देखी जा सकती है। राजस्थान की बोलियों में आपस में गहरा रिश्ता है और राजस्थानी भाषी उसके अलग-अलग स्वरूपों को भी आसानी से समझते हैं।

सुनील शर्मा
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