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लौट आओ-मां!

Mother's Day 2022: मां ही तैयार कर सकती है इस दृष्टि से सम्पूर्ण पीढ़ी को। पहले उसे यह ज्ञान करना पड़ेगा कि जीव किस देह को छोड़कर, कैसे संस्कार लेकर आया है। स्वयं में आने वाले परिवर्तनों का आकलन पहली आवश्यकता है... Mother's Day के अवसर पर पढ़ें 'पत्रिका' समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी का यह भावपूर्ण अग्रलेख-

Updated: May 08, 2022 07:32:49 am

Gulab Kothari Article on Mother's Day 2022: जैसे बच्चा पैदा होता है, उसी के साथ मां भी पैदा होती है। इसके पहले स्त्री होती है। माया होती है, जिसे देखकर ब्रह्म के मन में कामना पैदा होती है-'एकोहं बहुस्याम्'। उस समय तक ब्रह्म भी निराकार होता है। माया उसे घेरे में बांधकर एक स्वरूप देती है। ब्रह्म में क्रिया नहीं होती, न इच्छा में क्रिया होती है। इसी का एक अन्य पक्ष है-मातृ देवो भव:। पितृ देवो भव:। दोनों ही प्राण (देवता) स्वरूप हैं, सूक्ष्म हैं। मैं भी आत्मा हूं, शरीर नहीं हूं। मरता नहीं हूं, पैदा नहीं किया जा सकता। तीनों संस्थाएं सूक्ष्म हैं। माता-पिता स्थूल शरीर का निर्माण करते हैं। मैं आकर इसमें रहता हूं। मैं ही ब्रह्म हूं-बहुस्याम् का परिणाम। मेरा स्वरूप यहां आकर 84 लाख योनियों में बंट गया। हर योनि में माता-पिता हैं, सातों लोकों तथा 14 भुवनों में। आज विश्व मातृत्व दिवस पर प्रत्येक माता को सादर नमन।
Mother's Day: लौट आओ-मां!
Mother's Day: लौट आओ-मां!

सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्म स्वतंत्र था। बाद में कर्मों के अनुसार उसके विस्तार को प्रकृति रूप माया ने अपनी मु_ी में ले लिया। ब्रह्म मुक्ति के लिए छटपटाने लगा है। केवल मानव योनि में विधि पूर्वक किए गए कर्म ही उसे मुक्त कर सकते हैं। अत: मानव रूपा माता (स्त्रैण भाव में) ही जीव को मुक्त होने में सहायक हो सकती है।

वही प्रकृति है, वही शक्ति है। वही प्रवृत्ति है, वही निवृत्ति है। शक्ति रूप में विद्या है, प्रकृति रूप में त्रिगुणा भी है, अविद्या भी है। प्रश्न उठ सकता है कि क्या हम में से प्रत्येक की माता का स्वरूप ऐसा ही है, एक रूपा है? क्या हम सभी अर्द्धनारीश्वर भी हैं?
तब सूक्ष्म-स्थूल-कारण शरीरों का भेद कैसे समझ में आएगा? तीनों सूक्ष्म हैं और मुक्त होने की प्रक्रिया भी सूक्ष्म में चलती है, तब शरीर की उपयोगिता क्या? शास्त्र कहते हैं कि पिता ही सन्तान बनता है। तब, भीतर में क्या तीनों एक नहीं हैं? मोक्ष की कल्पना का मार्ग? मानव योनि ही मोक्ष का द्वार है किन्तु मानव शरीर धारण कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। यात्रा तो आत्मा को करनी है। शरीर के रहते-रहते।

कन्या को शक्ति कहते हैं। वह माया का जाग्रत रूप है। प्रकृति स्त्रैण भाव है-क्रिया रूप है। दाम्पत्य युगल सृष्टि का आधार है। दोनों ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हमारे यज्ञ से प्रसन्न होकर एक निर्मल आत्मा को परिवार में भेजें। हमारा यज्ञ आपको समर्पित है। आगे सारा मां का क्षेत्र।

मां भी पैदा होती है। कन्या पैदा होती है-शोणित की प्रचुरता से। जन्म के साथ स्त्री-पुरुष दोनों ही अद्र्धनारीश्वर होते हैं। समय के साथ पुरुष का पौरुष, स्त्री का स्त्रैण भाव विकसित होता है। आज देर से विवाह होने के साथ स्त्री का पौरुष भाग भी तेजी से विकसित होने लगता है। स्त्रैण भाव घटता जाता है।

एक ही पिता से पाण्डु, धृतराष्ट्र तथा विदुर हुए। तीनों की भिन्नता का कारण था सृष्टि यज्ञ काल में स्त्री के मन के भाव। दाम्पत्य में वह गंभीरता अब नहीं दिखती। नशे की आड़ में, आक्रामकता के साथ यदि यज्ञ होगा, तो घर में असुर आएंगे, सन्तानें विकृत होंगी। सन्तान के साथ ही मां पैदा होती है। नि:सन्तान मां नहीं होती।
इसका अर्थ है कि अद्र्धनारीश्वर में स्त्रैण भाव का विकास पूर्णता प्राप्त करता है। यदि पौरुष भाव अधिक बढ़ा है तो शक्ति स्वरूप सूक्ष्म से उतरकर स्थूल में प्रकट हो जाएगा। दिव्यता दैहिक पाशविक स्तर ग्रहण कर लेगी। अधिदेव का लोप ही पाशविकता की विकास भूमि है।

तप्त धरती मां पर राजा इन्द्र वर्षण करता है। हरियाली पैदा होती है। अन्न का रस जठराग्नि पर बरसता है-शरीर का निर्माण होता है। शुक्र की वर्षा पुन: तप्त अग्नि पर होती है। मां बनती है। सन्तान उत्पन्न होती है। प्रकृति में मां का स्वरूप एक शृंखला के रूप में होता है। यह कोई निजी सम्पत्ति नहीं है। हम सब इसी शृंखला की कड़ी हैं।
अन्तर अपने-अपने कर्मों का है। उसी के अनुरूप देह प्राप्त होती है। मनुष्य देह चूंकि मुक्ति का द्वार है, अत: यहां मां-माया की विशिष्ट भूमिका होती है। सच अर्थों में माया ही घेरे में लेती है और संकल्प (मुक्ति का) दृढ़ हो जाए तो मां रूप में वही इस मार्ग पर चढ़ा भी देती है।

पहला पड़ाव है जीव का गर्भ में प्रवेश। मां को ही इसकी सूचना रहती है। क्योंकि पिण्ड में होने वाली क्रियाओं की जानकारी बहुत स्पष्ट हो जाती है। ये मां का प्रभव (उत्पत्ति) स्थान है। दूसरा पड़ाव है जीव की यात्रा का ज्ञान। जीव किस-किस देह से गुजरता हुआ यहां पहुंचा है? अन्तिम शरीर और संस्कार क्या थे? विज्ञान के उपकरण इस होने वाली मां के आगे निष्फल हैं।
मां के शरीर-मन-बुद्धि तथा स्वभाव में जो परिवर्तन आएंगे, वे जीव के संस्कारों की अभिव्यक्ति ही होगी। मां की चर्या, खान-पान, स्वप्न, निद्रा-भय, विचार सब बदल जाएंगे। इसी आत्मा को सौ साल मानव शरीर में जीना है। परिवार का प्रतिनिधित्व भी करना है और मुक्त भी हो जाना है। ताकि पुन: किसी योनि में जन्म नहीं लेना पड़े।

यही सर्वाधिक महत्वपूर्ण, प्रज्ञावान, गुरुत्व का पड़ाव है। किसी अन्य प्राणी के संस्कारों से रंजित इस आत्मा को आत्मभाव से सराबोर करके मानुष-आत्मा में रूपान्तरित करना। तभी तो यह आत्मा मानव देह को मानव के रूप में जी सकेगा। इसके अभाव में मानव में पूर्व जन्म का प्राणी ही अपने संस्कारों के साथ सौ साल जीयेगा।

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जो आज चारों ओर मानव का पशुभाव, आक्रामकता, आसुरी प्रवृत्तियां तेजी से फैलती दिखाई दे रही हैं, उसके पीछे आत्मा के परिष्कार का अभाव ही है। दैविक के स्थान पर दैहिक सन्तानें, अन्य प्राणियों की तरह, ही पैदा हो रही हैं।

विकास की नई अवधारणाओं, नारी स्वातंत्र्य सशक्तिकरण के संघर्ष ने स्त्री को आत्मा के सूक्ष्म-दैविक धरातल से दूर करके शरीर में स्थापित कर दिया। अब उसे स्त्रैण बोध की आवश्यकता ही नहीं लगती। जीव के गर्भ में प्रवेश के साथ-साथ माता को भिन्न-भिन्न प्रकार के स्वप्न आने लगते हैं, जो जीव के स्वरूप की पूर्ण जानकारी देते हैं।
भगवान महावीर की माता त्रिशला के चौदह स्वप्नों पर कई व्याख्यान हो चुके हैं। इन स्वप्नों के अर्थ केवल मां की समझ में आते हैं। इस काल में मां की प्रज्ञा भी पूर्ण जाग्रत रहती है। वह ब्रह्म की सृष्टि के विस्तार में व्यस्त रहती है। आज प्रजनन एक दैहिक प्रक्रिया भाव रह गई। मां का सूक्ष्म देह में प्रवेश ही नहीं होता। तब जीव का रूपान्तरण कैसे हो? यहीं से नई विश्व-मानव सभ्यता का विकास निकलता है।

देर से शादी एक शिक्षित स्त्री-पुरुष को अनिवार्यता लगती है। इस बीच दोनों में पौरुष भाव बढ़ता है। सन्तान पैदा करना भी स्वेच्छा से जुड़ गया। गर्भ निरोधक गोलियों और उपायों ने इस कार्य को सहज कर दिया। आगे जाकर इसी के कारण गर्भाशय और स्तनों को शरीर से निकाला जाता है, जो सजा नहीं है क्या?

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आज तो मां के दूध में भी कीटनाशक पहुंच गए। तब मां का शरीर पूर्ण रूप से विषाक्त नहीं हो गया? सन्तान आत्माहीन, अमृत विहीन, मानवीय संस्कारों से शून्य होकर धरती पर अवतरित होगी। कृष्ण तो इसके हृदय में भी सो रहे होंगे। धर्म की स्थापना कर पाएंगे क्या?

मां ही तैयार कर सकती है इस दृष्टि से सम्पूर्ण पीढ़ी को। पहले उसे यह ज्ञान करना पड़ेगा कि जीव किस देह को छोड़कर, कैसे संस्कार लेकर आया है। स्वयं में आने वाले परिवर्तनों का आकलन पहली आवश्यकता है। स्वयं को पूर्ण आस्था के साथ, मातृत्व और वात्सल्य की पूर्ण गहनता के साथ जीव से संवाद-भले ही एक तरफा हो-स्थापित करना है।
ध्यान रहे, जीव भी जाग्रत है, स्वयं के सभी अनुभवों और क्षमता के साथ। आप से बात करेगा बिना शब्दों के, स्वप्न में ही। आप सुनाएं लोरियां, कथाएं, इतिहास, संगीत, भाषा ज्ञान आदि। जो आप बनाना चाहती हैं उसको। आप कहेंगी, तो बड़ा होकर आपके सपने भी पूरे कर सकेगा।

ऐसे ही हर मां अपना अभिमन्यु पैदा कर सकती है। कृष्ण पैदा कर सकती है। विश्व शान्ति के नायक दे सकती है। मां के तैयार किए हुए और पकाए घड़े को देवता भी नहीं बदल सकते। प्रश्न यह है कि विकास के इस प्रवाह में क्या ठहर पाएगी मां? अथवा विकास के सागर में जाकर खो जाएगी मां!!!

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