आत्म-दर्शन : जैसी संगत, वैसी रंगत

व्यक्ति जैसे लोगों के मध्य रहता है, जिनके साथ उठता-बैठता है, खाता-पीता है, उनका उसके मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

By: विकास गुप्ता

Published: 19 Apr 2021, 08:56 AM IST

मुनि प्रमाण सागर

लोगों का ये भ्रमपूर्ण विश्वास है कि मनुष्य का स्वभाव उसके मन में रहता है। असल में उसका वास्तविक निवास तो उस गोष्ठी (मित्र मंडली) में है, जिसके मध्य वह रहता है। मनुष्य जैसे लोगों के बीच रहता है, उसके भाव और विचार वैसे ही हो जाते हैं । इसलिए संगति को बहुत महत्त्व दिया गया है। व्यक्ति जैसे लोगों के मध्य रहता है, जिनके साथ उठता-बैठता है, खाता-पीता है, उनका उसके मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

यदि वह नकारात्मकता से भरे व्यक्ति के संपर्क में रहता है, तो यह तय है कि उसकी नकारात्मकता बढ़े बिना नहीं रहेगी और यदि सकारात्मक व्यक्ति के साथ रहता है, तो अनायास उसकी सकारात्मकता बढ़ जाती है। ऐसा कहा जाता है कि व्यक्ति जिन पांच व्यक्तियों के मध्य सबसे अधिक समय व्यतीत करता है, तो उसका स्वभाव उन सब का एवरेज हो जाता है।

(मुनिश्री प्रमाणसागरजी महाराज दिगंबर जैन साधु हैं)

विकास गुप्ता
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