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हमारी अनुभूतियों को आकाश की उन्मुक्त उड़ान देता है संगीत

21 जूनः विश्व संगीत दिवस

Published: June 21, 2022 09:08:31 pm

अतुल कनक
साहित्यकार और लेखक

कहते हैं कि कृष्ण जब गोकुल में थे तो रास के समय बांसुरी बजाया करते थे। मुरली की धुन गोपियों को आनंद से पूर्ण कर देती थी। ज्ञान की देवी सरस्वती के हाथों में भी हमेशा वीणा रहती है और अभ्यंकर शिव के एक हाथ में डमरू रहता है। नारद भी अपने हाथों में एकतार वाला वाद्य लेकर जगत का भ्रमण करते बताए जाते हैं। मान्यता है कि अपने पिता के व्यवहार से क्षुब्ध सती जब यज्ञाग्नि में प्रविष्ट हो गई तो शंकर ने ऐसा ताण्डव नर्तन किया था कि तीनों लोक कम्पायमान हो उठे। तभी शिव का उद्वेग कुछ नियंत्रित हुआ था।
21 जूनः विश्व संगीत दिवस
21 जूनः विश्व संगीत दिवस
संगीत अंतस की अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम है और आवेग को नि:सृत करने का सबसे सार्थक उपादान भी। भारतीय परंपराओं में गीत, वाद्य और नर्तन तीनों को ही संगीत का अंग माना है। तीनों के लिए एक निश्चित लय, ताल और स्वर की आवश्यकता होती है। लय का अनुशासन जीवन में रस उत्पन्न करता है। संसार का अस्तित्व इसी अनुशासन से है। अंतरिक्ष में गए कुछ लोगों का कहना है कि वहां भी उन्होंने प्रणवनाद जैसा एक घोष सुना। यदि विविध ग्रह अपने परिभ्रमण में लय के अनुशासन को तोड़ते हैं तो स्थिति कितनी विकट होगी, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। फिर अंतरिक्ष में कुछ वैसा ही होगा, जैसा सड़क पर मनमर्जी से गाड़ियां दौड़ाने पर होता है।
संगीत आवेग को सर्जनात्मक अभिव्यक्ति देता है और आनंद को सकारात्मक संचेतना। विविध देवी-देवताओं के जीवन प्रसंगों को संगीत से जोडऩे के मूल में यही भाव है कि संगीत की दिव्यशक्ति को पहचाना जाए। आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि भारतीय रागिनियों से अलग-अलग रोगों का निदान किया जा सकता है। अलग-अलग स्वरों के उच्चारण से वातावरण में अलग-अलग ध्वनि तरंगें उत्पन्न होती हैं जो मन-मस्तिष्क को विशिष्ट आवेग से स्पर्श करती हैं। स्वरों का यह स्पर्श सुनने वाले की चेतना पर और उसके आसपास के परिवेश पर खास तरह का प्रभाव डालता है। कहते हैं प्रसिद्ध भारतीय गायक पं. औंकार नाथ चतुर्वेदी ने एक विदेश दौरे में अपने गायन से ही मुसाोलिनी के अनिद्रा रोग का निदान कर दिया था। आज भी जब कोई सिद्ध गायक राग मालकौंस गाता है तो वातावरण में गर्मी-सी महसूस होती है और राग मल्हार गाता है तो आसपास कहीं बादल बरसने की अनुभूति होती। मध्यकाल के गायक तानसेन के बारे में कहा जाता है कि उनका गाना मनुष्य ही नहीं, पशु भी सुनते थे और वह जब राग दीपक गाते थे तो बंद सभागार में रखे दीपक अचानक जल उठते थे।
इस तथ्य से शायद ही कोई इंकार करे कि संगीत हमारी अनुभूतियों को आकाश की उन्मुक्त उड़ान देता है। दुख के समय उदासी भरे गाने हमें कुछ संतोष देते हैं तो खुशी के समय उल्लास भरे गाने उमंगों को नया आसमान। भारतीय मान्यताओं में स्वीकार किया गया है कि संगीत स्वयं ब्रह्मा ने वरदान स्वरूप नारद को दिया था। यों सामवेद से संगीत की उत्पत्ति मानी गई है। सामगान के साथ सामवेद की ऋचाओं के उच्चारण को संगीत परंपरा का प्राचीनतम प्रमाण माना जाता है। 400 ईस्वी पूर्व के आसपास हुए भरतमुनि ने तो अपने ग्रंथ में भारतीय संगीत पर विस्तार से लिखा। 'संगीत रत्नाकर' ग्रंथ भी भारतीय संगीत की परंपरा व अनुशासन के बारे में विस्तार से चर्चा करता है। संगीत की कोई भाषा नहीं होती, उसका माधुर्य संसार के हर जीव के अंत:स्थल को स्पंदित करता है। वैज्ञानिक प्रयोग भी बताते हैं कि संगीत पौधों तक के विकास को प्रभावित करता है। मनोविज्ञान कहता है कि व्यक्ति संगीत के माध्यम से मन के आवेग व आशंकाओं को जीत लेता है और इस तरह संगीत व्यक्ति को अवसाद से उबरने में मदद करता है। भजनों से मिलने वाले आनंद के मूल में शायद यही तत्त्व है। वास्तव में संगीत अंतस की अनुभूतियों का अनहद नाद है।

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