वैक्सीन-प्लाज्मा से बने एंटीबॉडी पर भारी एप्सिलोन वेरिएंट के म्यूटेशन

वेरिएंट के नामकरण के लिए ग्रीक एल्फाबेट के प्रयोग का मकसद वेरिएंट को उस राष्ट्र के नाम से जोडऩे का चलन खत्म करना है, जहां वेरिएंट के बारे में पहली बार पता चला।

By: विकास गुप्ता

Updated: 12 Jul 2021, 10:01 AM IST

सार्स-कोवि-2 के वेरिएंट की सूची में शामिल एप्सिलोन वह वेरिएंट है, जिसका पहली बार सैम्पल अमरीका में मार्च 2020 में लिया गया था, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस साल 5 मार्च को इसे वेरिएंट ऑफ इंट्रेस्ट में शामिल किया था। इसका कारण इस वेरिएंट का एक से अधिक देशों में पाया जाना और सामुदायिक स्तर पर संक्रमण फैलने के लिहाज से जोखिमपूर्ण होना था। इसके फैलने की क्षमता को देखते हुए वैज्ञानिक इस पर नजर रखे हुए हैं। इसी के चलते हाल ही एक इंटरनेशनल प्रोजेक्ट के तहत शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि एप्सिलोन वेरिएंट के स्पाइक प्रोटीन में मौजूद तीन म्यूटेशन्स की वजह से यह इतना घातक और संक्रामक है कि वैक्सीन से उत्पन्न या कोरोना से उबरने पर बनी एंटीबॉडीज को चकमा दे सकता है। इतना ही नहीं, यह टीकाकरण वाले लोगों के प्लाज्मा से तैयार एंटीबॉडी की प्रभावशीलता कम करने में भी सक्षम है। प्लाज्मा की वायरस को उदासीन करने की क्षमता एप्सिलोन वेरिएंट के मामले में 2 से 3.5 गुना तक कम होती देखी गई। पाया गया कि एप्सिलोन, म्यूटेशन के दौरान स्पाइक प्रोटीन की संरचना बदलने, विस्तारित करने और पुनर्निर्माण के लिए उत्तरदायी है। इस वेरिएंट की कम से कम 34 अन्य देशों में पहचान हो चुकी है।

संक्रमण यांत्रिकी पर शोध जारी-
इस इंटरनेशनल प्रोजेक्ट की अगुवाई सिएटल में यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन (यूडब्ल्यू) स्थित डेविड वेस्लर लैब व वीआइआर बायोटेक्नोलॉजी के लुका पिकोली और डेविड कोर्टी ने की। वेस्लर लैब से जुड़े वैज्ञानिक वर्षों से सार्स की तरह के कोरोना वायरसों की आणविक संरचना और संक्रमण यांत्रिकी की खोज में लगे हैं। यूडब्ल्यू मेडिसिन के अनुसार, वे यह परीक्षण भी करते हैं कि एंटीबॉडीज किस तरह से संक्रमण तंत्र को अवरुद्ध करने का प्रयास करती हैं।

विकास गुप्ता
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