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नगालैंड: विश्वास जीतने के लिए नियंत्रित करने होंगे सेना के अधिकार

Nagaland: निर्दोष नागरिकों की मौत का नगा शांति वार्ता पर असर पड़ता दिख रहा है। नगा अलगाववादी संगठनों पर हिंसा छोड़कर शांति प्रक्रिया में भागीदार बनने का दबाव बढऩे लगा था, लेकिन सेना की कार्रवाई के बाद नगालैंड का माहौल बदल गया है।

नई दिल्ली

Updated: December 22, 2021 03:06:45 pm

प्रियरंजन भारती
(वरिष्ठ पत्रकार)
नगालैंड के मोन जिले में सेना की गोलीबारी में नागरिकों की मौत के बाद विरोध के स्वर गूंज उठे हैं। इसके बाद राजधानी कोहिमा में नगा विद्रोहियों और छात्र संगठनों की विरोध रैली में सशस्त्र बल (विशेष शक्ति) अधिनियम (एएफएसपीए) 1958, यानी अफस्पा को निरस्त करने और सेना की गतिविधियों को नियंत्रित करने की उठी मांगें आंदोलन की शक्ल में उभर चुकी है। इसका दूरगामी असर नगा शांति प्रक्रिया पर पड़ता दिख रहा है। विभिन्न नगा समुदायों के आम लोग नगा शांतिवार्ता की ओर बड़ी उम्मीद भरी नजरों से देखने लगे थे। इस समुदाय के लोगों को यह भरोसा हो चुका था कि भारत सरकार अब नगाओं के स्वाभिमान और सम्मान की बात सोच रही है।
Nagaland: to win trust Army's rights have to be controlled
यही वजह है नगा अलगाववादी संगठनों पर हिंसा छोड़कर शांति प्रक्रिया में भागीदार बनने का दबाव बढऩे लगा था, लेकिन सेना की कार्रवाई के बाद नगालैंड का माहौल बदल गया है। सभी नगा समुदायों को एकजुट करने के लिए मनाया जाने वाला हॉर्नबिल उत्सव भी थम सा गया है, क्योंकि वहां भी सेना के विरोध में पोस्टर दिख रहे हैं। मोन की घटना ने आम नगाओं के दिल को भी गहरे चोटिल कर दिया। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव नगा शांति वार्ता पर पडऩा स्वाभाविक है। यदि नगा समुदाय नाराज रहा] तो विद्रोहियों को भी समझाना मुश्किल होगा।

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लिहाजा इस विरोध आंदोलन के पूर्वोत्तर राज्यों में फैलने के बढ़ते संकेतों के बीच सरकार को नगा शांति प्रक्रिया में आए गतिरोध को दूर करने की स्वाभाविक चिंता करनी पड़ेगी। जांच के लिए गठित एसआइटी की भूमिका पर लोगों के संदेह को कम करते हुए सेना और केंद्र सरकार को नगा समुदाय के दिल में जगह बनाने के लिए उनकी मांगों पर समुचित पहल तुरंत कर देनी चाहिए।

प्रभावित परिवारों को समुचित मुआवजा और न्याय देकर तत्काल राहत देने से लेकर सेना के अधिकारों को नियंत्रित करने के उपायों से विद्रोह की आग को कम करके केंद्र सरकार नगा समुदाय का विश्वास जीतने में सफल हो सकती है। इससे नगा शांति वार्ता के मार्ग की मुश्किलें दूर होंगी।
नगा आंदोलन लंबे समय से चल रहा है। 1997 में तत्कालीन केंद्र सरकार की पहल पर नगा नेताओं के साथ हिंसा रोककर बातचीत के लिए एक समझौता तो हुआ, पर नगा समस्याओं के राजनीतिक समाधान के लिए बातचीत की शुरुआत नरेंद्र मोदी की सरकार के सत्तारूढ़ होने के बाद 2015 में हुई।

नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम से औपचारिक बातचीत का दौर अक्टूबर 2019 में संपन्न हो जाने के बाद अब समझौते को निर्णायक स्वरूप दिया जाना बाकी है। नगा अलगाववादियों और समूचे नगा समुदाय को इस संभावित समझौते से काफी उम्मीदें लगी हुई हैं। इस बीच हुई सैन्य कार्रवाई ने लोगों की उम्मीदों को झटका देकर विचलित कर दिया है। इस एक घटना से समूचे पूर्वोत्तर में विरोध की लपटें फैलने लगी हैं।
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विशेषज्ञों की मानें तो सेना और भारत सरकार मिलकर सहिष्णु और उदार रवैया अपनाकर ही समस्या का निराकरण कर पाएगी, तभी लोगों का भरोसा जीतने में कामयाबी मिल पाएगी। अफस्पा हटाने की मांग नगालैंड के मुख्यमंत्री समेत विभिन्न राज्यों के नेताओं की ओर से की जाने लगी है, जो केंद्र के लिए चिंता की बात है। सेना की ताजा कार्रवाई के कारण नगाओं में पैदा हुए रोष से इसे और बल मिल गया है। इसका असर पूर्वोत्तर समेत सीमावर्ती दूसरे राज्यों में पर भी पडऩे का खतरा बढ़ गया हैं। केंद्र सरकार और सेना को गंभीरता से अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।


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