आख्यान : मनुष्य कर्ता नहीं, माध्यम भर है

श्रीकृष्ण कहते हैं, 'जिस व्यक्ति का कार्य समाप्त हो चुका हो, उसे जाना ही पड़ता है। मोह के वशीभूत हो नियति का विरोध करना अधर्म है।'

By: विकास गुप्ता

Published: 09 Jun 2021, 07:58 AM IST

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

कुरुक्षेत्र में अपने समक्ष पितामह भीष्म, गुरु द्रोण, कृप और दुर्योधन आदि समस्त बंधु-बांधवों को देख कर मोहग्रस्त हुए अजुर्न ने हाथ से गांडीव छोड़ दिया और कहा, 'हे कृष्ण! मैं इन लोगों से कैसे युद्ध कर सकता हूं? शास्त्र कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने कुल-धर्म का विनाश करता है, वह सदैव नरक में वास करता है। कुल का नाश होने पर सनातन कुल परम्परा नष्ट होती है और इस तरह शेष कुल भी अधर्म में प्रवृत्त हो जाता है। माना कि ये लोग लोभ के वश में आ कर हमारा अधिकार छीन रहे हैं, पर हम तो लोभी नहीं हैं। हम इनका वध कैसे कर सकते हैं? मैं यह युद्ध नहीं कर सकता माधव! मैं पितामह भीष्म और गुरु द्रोण जैसे पूज्य व्यक्तियों पर बाण कैसे चलाऊंगा? भले दुर्योधन आदि मुझ निहत्थे को मार दें, पर मैं युद्ध नहीं करूंगा।'

कृष्ण मुस्कुराए। वे अर्जुन के मोह को समझ रहे थे, क्योंकि यह मोह केवल अर्जुन के हृदय में नहीं उपजा था, बल्कि यह मोह समस्त मानव जगत के हृदय में बसता है। कृष्ण ने कहा- 'हे अर्जुन! व्यक्ति को अपना कर्तव्य वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर तय करना चाहिए। इस युद्धभूमि के बाहर तुम पाण्डुपुत्र अर्जुन हो, पर युद्धभूमि में तुम केवल और केवल एक सैनिक मात्र हो। यहां तुम्हारा एक ही कर्तव्य है - युद्ध! तुम्हारा युद्ध छोडऩा अपने कत्र्तव्य की अवहेलना है, जिससे बड़ा अधर्म संसार में कोई नहीं। महत्त्वपूर्ण यह नहीं कि सामने कौन खड़ा है, महत्त्वपूर्ण बस यह है कि तुम योद्धा हो और तुम्हें अपना धर्म निभाना है। युद्धक्षेत्र में खड़ा व्यक्ति यदि सहिष्णु हो जाए तो वह अपने राष्ट्र, धर्म और संस्कृति तीनों के लिए घातक होता है।

अर्जुन ने कहा, 'हे केशव! यह कार्य मैं ही क्यों करूं? मेरा कत्र्तव्य इतना कठोर क्यों है कि वह मुझसे मेरे परिजनों का वध कराना चाहता है? श्रीकृष्ण बोले, 'हे अर्जुन! तुम इन्हें नहीं मारोगे तो क्या ये नहीं मरेंगे? पार्थ! मृत्यु जीवन का सबसे बड़ा सत्य है। जिस व्यक्ति का कार्य समाप्त हो चुका हो, उसे जाना ही पड़ता है। यही नियति है, और मोह के वशीभूत हो नियति का विरोध करना अधर्म होता है। मनुष्य कर्ता नहीं, माध्यम भर होता है। जिस तरह तुम्हारी उंगलियों का आदेश पा कर तुम्हारे वाण कार्य करते हैं, उसी तरह परमात्मा का आदेश पा कर तुम कार्य करते हो। इसलिए अपना धर्म निभाओ पार्थ, धर्म निभाओ।'

(लेखक पौराणिक पात्रों और कथानकों पर लेखन करते हैं)

विकास गुप्ता
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