छोटी-छोटी पहल से संभव है प्रकृति संरक्षण

विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस (28 जुलाई) पर विशेष
लॉकडाउन के दौर ने पूरी दुनिया को यह समझने का अवसर दिया है कि इंसानी गतिविधियों के कारण ही प्रकृति का जिस बड़े पैमाने पर दोहन किया जाता रहा है, उसी के कारण स्वर्ग से भी सुंदर हमारी धरती कराहती रही है।

By: shailendra tiwari

Updated: 27 Jul 2020, 05:21 PM IST

- योगेश कुमार गोयल, पर्यावरण पुस्तकों के लेखक


बिगड़ते पर्यावरणीय संतुलन और मौसम चक्र में आते बदलाव के कारण पेड़-पौधों की अनेक प्रजातियों के अलावा जीव-जंतुओं की कई प्रजातियों के अस्तित्व पर भी अब संकट के बादल मंडरा रहे हैं। पर्यावरण के इस तेजी से बदलते दौर में हमें यह भली-भांति जान लेना चाहिए कि इन प्रजातियों के लुप्त होने का सीधा असर समस्त मानव सभ्यता पर पड़ना अवश्वम्भावी है। इसी दिशा में वैश्विक स्तर पर लोगों का ध्यान आकृष्ट करने के लिए हर साल 28 जुलाई को दुनियाभर में विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस मनाया जाता है, जिसके माध्यम से वातावरण में हो रहे व्यापक बदलावों के चलते लगातार विलुप्ति के कगार पर पहुंच रही जीव जंतुओं और वनस्पतियों की अनेक प्रजातियों की रक्षा का संकल्प लिया जाता है। विश्वभर में आधुनिकीकरण और औद्योगिकीकरण के चलते प्रकृति के साथ बड़े पैमाने पर जो खिलवाड़ हो रहा है, उसके मद्देनजर आमजन को जागरूक करने के लिहाज से आज के समय में विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस की महत्ता कई गुना बढ़ गई है।

दरअसल आज प्रदृषित हो रहे पर्यावरण के जो भयावह खतरे हमारे सामने आ रहे हैं, उनसे शायद ही कोई अनभिज्ञ हो और हमें यह स्वीकार करने से भी गुरेज नहीं करना चाहिए कि इस तरह की समस्याओं के लिए कहीं न कहीं जिम्मेदार हम स्वयं हैं।
कोरोना के कारण हुए लॉकडाउन के दौर में अरसे बाद पूरी दुनिया ने प्रकृति को मुस्कराते देखा था क्योंकि औद्योगिक इकाईयां, हवाई व रेल यात्राएं, बस यात्रा तथा निजी वाहनों का आवागमन बंद होने से हर तरह के प्रदूषण का स्तर नियंत्रित हुआ था। गंगा, यमुना जैसी जो पवित्र नदियां कई जगहों पर गंदे नालों की भांति बहती दिखाई देती थी, उनमें जल की निर्मल धारा बहने लगी थी। जिन नदियों को साफ करने के लिए पिछले कुछ दशकों में अनेक योजनाएं और समितियां बनी तथा नदियों की स्वच्छता के नाम पर अरबों-खरबों रुपये खर्च हो गए, लॉकडाउन के दौरान वे स्वतः ही स्वच्छ और निर्मल हो गई।

पहली बार देखा गया कि किस प्रकार लॉकडाउन के चलते लोगों के घरों में बंद रहने और सभी प्रकार के व्यावसायिक कार्य बंद हो जाने से हवा इतनी शुद्ध हो गई थी कि सैंकड़ों किलोमीटर दूर स्थित पर्वतों की चोटियां भी स्पष्ट दिखाई दी थी। जिन नन्हीं चिडि़यों की चहचहाहट को हमारे कान तरस गए थे, ब्रह्म मुहूर्त में उनकी मधुर आवाज फिर से सुनाई देनी लगी थी।

प्रकृति के इस साफ-सुथरे स्वरूप को देखकर हर कोई खुश था। दरअसल प्रकृति को स्वयं अपनी मरम्मत करने और खुद को सजाने-संवारने का सुअवसर मिला था लेकिन इंसानी गतिविधियां पुराने रूप में पुनः शुरू होने के बाद प्रकृति के साथ खिलवाड़ के फिर उसी दौर की शुरूआत हो चुकी है।

कोरोना काल में लॉकडाउन के दौर ने पूरी दुनिया को यह समझने का बेहतरीन अवसर दिया है कि इंसानी गतिविधियों के कारण ही प्रकृति का जिस बड़े पैमाने पर दोहन किया जाता रहा है, उसी के कारण स्वर्ग से भी सुंदर हमारी धरती कराहती रही है। प्रकृति मनुष्य को ऐसा न करने के लिए बार-बार किसी न किसी बड़ी आपदा के रूप में चेतावनियां भी देती रही है लेकिन उन चेतावनियों को सदा दरकिनार किया जाता रहा है। प्रकृति के साथ मानवीय छेड़छाड़ का ही नतीजा रहा है कि बीते कुछ वर्षों में मौसम चक्र में बदलाव स्पष्ट दिखाई दिया है। वर्ष दर वर्ष अब जिस प्रकार मौसम के बिगड़ते मिजाज के चलते समय-समय पर तबाही देखने को मिल रही है, ऐसे में हमें अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि मौसम चक्र के बदलाव के चलते प्रकृति संतुलन पर जो विपरीत प्रभाव पड़ रहा है, उसकी अनदेखी के कितने भयावह परिणाम होंगे। विड़म्बना है कि हम समझना ही नहीं चाहते कि मनुष्य प्रकृति की गोद में एक अबोध शिशु के समान है किन्तु आधुनिकता की अंधी दौड़ में वह स्वयं को प्रकृति का स्वामी समझने लगा है।

प्रकृति बार-बार मौसम चक्र में बदलाव के संकेत, चेतावनी तथा संभलने का अवसर देती रही है लेकिन हम आदतन किसी बड़े खतरे के सामने आने तक ऐसे संकेतों या चेतावनियों को नजरअंदाज करते रहे हैं, जिसका नतीजा अक्सर भारी तबाही के रूप में सामने आता रहा है। पर्यावरण प्रदूषण के कारण पिछले तीन दशकों से जिस प्रकार मौसम चक्र तीव्र गति से बदल रहा है और प्राकृतिक आपदाओं का आकस्मिक सिलसिला तेज हुआ है, उसके बावजूद अगर हम नहीं संभलना चाहते तो इसमें भला प्रकृति का क्या दोष? प्रकृति के तीन प्रमुख तत्व हैं जल, जंगल और जमीन, जिनके बगैर प्रकृति अधूरी है और यह विड़म्बना ही है प्रकृति के इन तीनों ही तत्वों का इस कदर दोहन किया जा रहा है कि प्रकृति का संतुलन ही डगमगाने लगा है, जिसकी परिणति अब अक्सर भयावह प्राकृतिक आपदाओं के रूप में सामने आने लगी है। प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए जल, जंगल, वन्य जीव और वनस्पति, इन सभी का संरक्षण अत्यावश्यक है। प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन और प्रकृति के साथ खिलवाड़ का ही नतीजा है कि पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने के कारण मनुष्यों के स्वास्थ्य पर तो प्रतिकूल प्रभाव पड़ ही रहा है, जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियां भी लुप्त हो रही हैं।


दुनियाभर में पानी की कमी के गहराते संकट की बात हो या ग्लोबल वार्मिंग के चलते धरती के तपने की अथवा धरती से एक-एक कर वनस्पतियों या जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियों के लुप्त होने की, इस तरह की समस्याओं के लिए केवल सरकारों का मुंह ताकते रहने से ही हमें कुछ हासिल नहीं होगा बल्कि प्रकृति संरक्षण के लिए हम सभी को अपने-अपने स्तर पर अपना योगदान देना होगा। प्रकृति के साथ हम बड़े पैमाने पर जो छेड़छाड़ कर रहे हैं, उसी का नतीजा है कि पिछले कुछ समय में भयानक तूफानों, बाढ़, सूखा, भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सिलसिला तेजी से बढ़ा है। पर्यावरण पर प्रकाशित ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक में बताया गया है कि पर्यावरण का संतुलन डगमगाने के चलते लोग अब तरह-तरह की भयानक बीमारियों के जाल में फंस रहे हैं, उनकी प्रजनन क्षमता पर इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है, उनकी कार्यक्षमता भी इससे प्रभावित हो रही है। कैंसर, हृदय रोग, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों का संक्रमण, न्यूमोनिया, लकवा इत्यादि के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और लोगों की कमाई का बड़ा हिस्सा इन बीमारियों के इलाज पर ही खर्च हो जाता है।


हमारे जो पर्वतीय स्थान कुछ सालों पहले तक शांत और स्वच्छ वातावरण के कारण हर किसी को अपनी ओर आकर्षित किया करते थे, आज वहां भी प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है और ठंडे इलाकों के रूप में विख्यात पहाड़ भी अब तपने लगने हैं, वहां भी जल संकट गहराने लगा है। दरअसल पर्वतीय क्षेत्रों में यातायात के साधनों से बढ़ते प्रदूषण, बड़े-बड़े उद्योग स्थापित करने और राजमार्ग बनाने के नाम पर बड़े पैमाने पर वनों के दोहन, सुरंगें बनाने के लिए बेदर्दी से पहाड़ों का सीना चीरे जाने का ही दुष्परिणाम है कि हमारे इन खूबसूरत पहाड़ों की ठंडक भी अब लगातार कम हो रही है। स्थिति इतनी बदतर होती जा रही है कि अब हिमाचल की धर्मशाला, सोलन व शिमला जैसी हसीन वादियों और यहां तक कि जम्मू कश्मीर में कटरा जैसे ठंडे माने जाते रहे स्थानों पर भी पंखों, कूलरों के अलावा ए.सी. की जरूरत भी महसूस की जाने लगी है। पहाड़ों में बढ़ती इसी गर्माहट के चलते हमें अक्सर घने वनों में भयानक आग लगने की खबरें भी सुनने को मिलती रहती हैं। पहाड़ों की इसी गर्माहट का सीधा असर निचले मैदानी इलाकों पर पड़ता है, जहां का पारा अब वर्ष दर वर्ष बढ़ रहा है।

प्रकृति बार-बार अपना रौद्र रूप दिखाकर हमें स्पष्ट चेतावनी देती रही है कि अगर हमने उसके साथ अंधाधुंध खिलवाड़ बंद नहीं किया तो उसके कितने घातक परिणाम होंगे लेकिन विड़म्बना है कि लगातार प्रकृति का प्रचण्ड रूप देखते रहने के बावजूद हम हर बार प्रकृति की चेतावनियों को नजरअंदाज कर स्वयं अपने विनाश को आमंत्रित करते रहे हैं। हम समझना ही नहीं चाहते कि पहाड़ों का सीना चीरकर हरे-भरे जंगलों को तबाह कर हम कंक्रीट के जो जंगल विकसित कर रहे हैं, वह वास्तव में विकास नहीं है बल्कि विकास के नाम पर हम अपने ही विनाश का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। प्रकृति कभी समुद्री तूफान तो कभी भूकम्प, कभी सूखा तो कभी अकाल के रूप में अपना विकराल रूप दिखाकर हमें बारम्बार चेतावनी देती रही है कि हम यदि इसी प्रकार प्राकृतिक संसाधनों का बुरे तरीके से दोहन करते रहे तो हमारे भविष्य की तस्वीर कैसी होने वाली है।

जब भी कोई बड़ी प्राकृतिक आपदा सामने आती है तो हम प्रकृति को कोसना शुरू कर देते हैं लेकिन हम नहीं समझना चाहते कि प्रकृति तो रह-रहकर अपना रौद्र रूप दिखाकर हमें सचेत करने का प्रयास करती रही है कि अगर हम अभी भी नहीं संभले और हमने प्रकृति से साथ खिलवाड़ बंद नहीं किया तो हमें आने वाले समय में इसके खतरनाक परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। प्रकृति हमारी मां के समान है, जो हमें अपने प्राकृतिक खजाने से ढ़ेरों बहुमूल्य चीजें प्रदान करती है लेकिन अपने स्वार्थों के चलते हम अगर खुद को ही प्रकृति का स्वामी समझने की भूल करने लगे हैं तो फिर भला प्राकृतिक तबाही के लिए प्रकृति को कैसे दोषी ठहरा सकते हैं। दोषी हम खुद हैं। हमारी ही करतूतों के चलते वायुमंडल में कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन, ओजोन और पार्टिक्यूलेट मैटर के प्रदूषण का मिश्रण इतना बढ़ गया है कि हमें वातावरण में इन्हीं प्रदूषित तत्वों की मौजूदगी के कारण सांस की बीमारियों के साथ-साथ टीबी, कैंसर जैसी कई और असाध्य बीमारियां जकड़ने लगी हैं।

सीवरेज की गंदगी स्वच्छ जल स्रोतों में छोड़ने की बात हो या औद्योगिक इकाईयों का अम्लीय कचरा नदियों में बहाने की अथवा सड़कों पर रेंगती वाहनों की लंबी-लंबी कतारों से वायुमंडल में घुलते जहर की या फिर सख्त अदालती निर्देशों के बावजूद खेतों में जलती पराली से हवा में घुलते हजारों-लाखों टन धुएं की, हमारी आंखें तब तक नहीं खुलती, जब तक प्रकृति का बड़ा कहर हम पर नहीं टूट पड़ता। अधिकांश राज्यों में सीवेज ट्रीटमेंट और कचरा प्रबंधन की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है। पैट्रोल, डीजल से उत्पन्न होने वाला धुआं वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड तथा ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा को खतरनाक स्तर तक पहुंचाता रहा है। पेड़-पौधे कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित कर पर्यावरण संतुलन बनाने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं लेकिन पिछले कुछ दशकों में वन-क्षेत्रों को बड़े पैमाने पर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील कर दिया गया है।

पर्यावरणीय असंतुलन के बढ़ते खतरों के मद्देनजर हमें स्वयं सोचना होगा कि हम अपने स्तर पर प्रकृति संरक्षण के लिए क्या योगदान दे सकते हैं। हमें अपनी इस सोच को बदलना होगा कि अगर सामने वाला व्यक्ति कुछ नहीं कर रहा तो मैं ही क्यों करूं? हर बात के लिए सरकार से अपेक्षा करना ठीक नहीं। सरकारों का काम है किसी भी चीज के लिए कानून या नियम बनाना और जन-जागरूकता पैदा करना लेकिन ईमानदारी से उनका पालन करने की जिम्मेदारी तो हमारी ही है। सरकार और अदालतों द्वारा पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बनती पॉलीथीन पर पाबंदी लगाने के लिए समय-समय पर कदम उठाए गए लेकिन हम पॉलीथीन का इस्तेमाल करने के इस हद तक आदी हो गए हैं कि हमें आसपास के बाजारों से सामान लाने के लिए भी घर से कपड़े या जूट का थैला साथ लेकर जाने के बजाय पॉलीथीन में सामान लाना ज्यादा सुविधाजनक लगता है और अपनी इसी सुविधा के चलते हम बड़ी सहजता से पॉलीथीन से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को नजरअंदाज कर देते हैं।

जहां तक गहराते जल संकट की बात है तो इसके लिए भी कहीं न कहीं हम स्वयं भी जिम्मेदार हैं। अक्सर देखा जाता है कि सुबह-सुबह टूथपेस्ट करते समय या शेविंग करते समय हम नल खुला छोड़ देते हैं और पानी लगातार बहता रहता है। हमें अपनी इन गलत आदतों को बदलना होगा। अगर हम वाकई प्रकृति संरक्षण चाहते हैं तो हमें अपनी इन आदतों में सुधार कर सकारात्मक सोच का प्रसार करते हुए अपने आसपास के लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करना होगा। अपनी छोटी-छोटी पहल से हम सब मिलकर प्रकृति संरक्षण के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। हम प्रयास कर सकते हैं कि हमारे दैनिक क्रियाकलापों से हानिकारक कार्बन डाई ऑक्साइड जैसी गैसों का वातावरण में उत्सर्जन कम से कम हो। कोरोना महामारी के इस दौर में पहली बार ऐसा हुआ, जब प्रकृति को स्वयं को संवारने का सुअवसर मिला। अब प्रकृति का संरक्षण करते हुए स्वर्ग से भी सुंदर अपनी इस पृथ्वी को हम कब तक खुशहाल रख पाते हैं, यह सब हमारे ऊपर ही निर्भर है। कितना अच्छा हो, अगर हम प्रकृति संरक्षण दिवस के अवसर पर प्रकृति संरक्षण में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाने का संकल्प लेते हुए अपने स्तर पर उस पर ईमानदारी से अमल भी करें।

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