मजबूत साइबर सुरक्षा कानून की जरूरत

कैशलेस अर्थव्यवस्था में साइबर स्पेस में अस्थिरता का मतलब है आर्थिक अस्थिरता और कोई भी देश आर्थिक अस्थिरता बर्दाश्त नहीं कर सकता। आने वाले समय में साइबर से जुड़े हुए खतरे और बढ़ेंगे, इसलिए हमें अभी से तैयार रहना होगा।

 

By: shailendra tiwari

Updated: 26 Aug 2020, 06:10 PM IST

कैलाश एम बिश्नोई, टिप्पणीकार

इक्कीसवीं सदी में साइबर जासूसी,साइबर अपराध,साइबर आतंकवाद और साइबर युद्ध जैसे बढ़ते खतरे के साए में साइबर दुनिया को सुरक्षित बनाना आज विश्व के सामने बड़ी चुनौती बन गया है। इंटरनेट उपभोक्ताओं के बढ़ने के साथ-साथ साइबर अपराध निरंतर बढ़ रहे हैं। साइबर स्पेस का खतरा कितना बड़ा है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हमारे देश में पीएमओ से लेकर विदेश व रक्षा मंत्रालय, भारतीय दूतावासों, मिसाइल प्रणालियों, यहां तक कि खुफिया एजेंसी- सीबीआइ के कंप्यूटरों पर भी साइबर अटैक कर उनकी जासूसी हो चुकी है। राहत की बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में नई साइबर नीति लाने की घोषणा की है। इस नीति में भारत में सुरक्षित साइबर स्पेस बनाने की परिकल्पना की जायेगी और यह 2020 के अंत तक तैयार हो जाएगी। इंटरनेट ऑफ थिंग्स, क्लाउड कम्प्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और 5 जी जैसी सूचना प्रौद्योगिकी कै उपयोग बढने के साथ देश के लिए मजबूत समन्वित साइबर सुरक्षा व्यवस्था का होना बहुत जरूरी है।

पूरे विश्व में में हालिया वर्षों में साइबर हमले तेज हुए हैं। साइबर सुरक्षा के जानकारों के मुताबिक दुनिया में तकरीबन 70 प्रतिशत वेबसाइट हैकिंग की शिकार हैं। एक हैक का पता लगाने में औसतन 240 दिन का समय लग जाता है। साइबर क्राइम के मामले में अमेरिका और चीन के बाद भारत तीसरे पायदान पर है। पिछले 10 सालों में हमारे देश में साइबर क्राइम 88 गुना बढ़े हैं। साइबर क्राइम के मामले में गिरफ्तारी में भी दस गुना वृद्धि हुई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इनमें सबसे ज्यादा अपराध फेसबुक के जरिए हुए। आतंक फैलाने के लिए ट्विटर प्लेटफॉर्म का प्रयोग सबसे ज्यादा आतंकी कर रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक सोशल मीडिया के जरिए साइबर अपराधों में 60 से 65 फीसदी फेसबुक जबकि 15 से 20 फीसदी ट्विटर और वॉट्सऐप से किया जा रहा है। यूएसए के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और सबसे सशक्त सॉफ्टवेयर कंपनी के संस्थापक बिल गेट्स के ट्विटर अकाउंट सुरक्षित नहीं हैं।

सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स से संबंधित साइबर अपराध भी बढ़ रहे है। जिनमें निजता का उल्लंघन, पहचान की चोरी, व्यक्तिगत आंकड़े चुराना और प्रोफाइल पर गंदे संदेश भेजना आदि। इसके साथ ही समाज में अश्लीलता दिखाना, परंपराओं व संस्कृतियों या धार्मिक आस्थाओं के साथ छेड़-छाड़ करना आदि समाज में इसके गंभीर दुष्प्रभाव प्रकट हो रहे हैं। बच्चों व महिलाओं का अश्लील प्रस्तुतीकरण उनके समाज में सम्मान व सुरक्षा को घटा रहा है। आज इंटरनेट पर विवाह संपन्न कराने के नाम पर धोखाधड़ी के प्रकरण सामने आ रहे हैं। सरकार व शासन के खिलाफ आतंकी गतिविधियां करने हेतु इंटरनेट का प्रयोग करना व ईमेल,ई-बैंकिंग आदि के द्वारा साइबर आतंकवाद को बढ़ावा देने संबंधी पहलू भी उजागर हो रहे हैं।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, 2013 के मुकाबले 2016 में साइबर अपराधों के ग्राफ में 116 प्रतिशत का उछाल आया। इससे भी ज्यादा तेजी सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म से हुए साइबर अपराधों में हुई है। गौरतलब है कि डिजिटल डाटा की सुरक्षा को देखते हुए ही जून 2020 में भारत सरकार ने 60 से अधिक चीनी मोबाइल ऐप पर प्रतिबंध लगा दिया था। सरकार का दावा था कि ये ऐप कंपनियां भारतीयों के डाटा को चोरी कर रही थीं। भारत में इंटरनेट आधारित कारोबार और सेवाएं प्रदान करने वाली सैकड़ों देशी-विदेशी कंपनियां काम कर रही है। ऐसे में यह बेहद जरूरी हो चला है कि केंद्र सरकार ऐसी कंपनियों पर बेहतर निगरानी रखने के लिए ऐसा निगरानी सिस्टम विकसित करे जो इन कंपनियों पर पैनी नजर रख सकें। उचित यह भी होगा कि जिन कंपनियों की गतिविधियां संदिग्ध नजर आए उन पर शिकंजा कस कानूनी कार्रवाई की जाए। ऐसी कंपनियों के लाइसेंस रद्द किया जाएं जो साइबर सुरक्षा से संबंधित नियमों का पालन करने में कोताही बरत रही हैं। इसके अतिरिक्त भारत में अनेक ऐसी विदेशी कंपनियां सेवाएं दे रही हैं जिनका सर्वर भारत में नहीं है। ऐसी कंपनियों को निगरानी की जद में रखना एक बड़ी चुनौती है।

वर्तमान में भारत की कुल अर्थव्यवस्था के आकार का 14-15 फीसदी हिस्सेदारी डिजिटल अर्थव्यवस्था की है और साल 2024 तक इसे 20 प्रतिशत तक पहुँचाने का लक्ष्य है। इसके लिए सरकार डिजिटल इंडिया और कैशलेस अर्थव्यवस्था की तरफ कदम बढ़ा रही है, जबकि दूसरी तरफ साइबर सुरक्षा पर खतरा दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। अमेरिकी साइबर सुरक्षा कंपनी 'फायर आई' के अनुसार आने वाले सालों में भारत दुनिया में फिशिंग, हैकिंग और ऑनलाइन ठगी के मामले में सबसे ज्यादा निशाने पर रहने वाला है। जाहिर है साइबर सुरक्षा को मजबूत करना हमारी सबसे बड़ी चुनौती है। कैशलेस अर्थव्यवस्था में साइबर स्पेस में अस्थिरता का मतलब है आर्थिक अस्थिरता और कोई भी देश आर्थिक अस्थिरता बर्दाश्त नहीं कर सकता। आने वाले समय में साइबर से जुड़े हुए खतरे और बढ़ेंगे, इसलिए हमें अभी से तैयार रहना होगा। ऐसे परिदृश्य में समावेशी डिजिटल भारत के सपने को साकार करने के लिए कुशल और सुरक्षित साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता हैं।
ऐसी नीति विकसित करने की जरूरत है जो साइबर सुरक्षा क्षेत्र में कैरियर बनाने वाले छात्रों को भी प्रोत्साहित करें। केंद्रीय विश्वविद्यालयों, निजी विश्वविद्यालयों, उद्योग संघों, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों सहित अन्य शैक्षिक संस्थानों को साइबर सुरक्षा को पाठ्यक्रमों में शामिल करना चाहिये। साथ ही समय की मांग है कि देश के प्रमुख शहरों में साइबर अपराध से संबंधित मामलों के लिए विशेष साइबर न्यायालय की स्थापना भी की जाए। साइबर ठगों के बढ़ते हौसले का मुख्य कारण यह है कि देश में साइबर अपराधों को रोकने और अपराधियों को दंडित करने के लिए कठोर तथा प्रभावी कानूनों का अभाव है। यह दुर्भाग्य की बात है कि देश में अभी भी साइबर अपराध गैर जमानती नहीं है और इसके लिए अधिकतम सजा तीन साल है। ऐसे में साइबर अपराध को गैर जमानती बनाने के साथ भारत में एक मजबूत साइबर सुरक्षा कानून की जरूरत है जो विभिन्न प्रकार के साइबर खतरो,हमलों और अपराधो से निपटने के लिए प्रभावी हो। कैशलेस इकोनामी को अपनाने की दिशा में बढ़ने के कारण भारत में साइबर सुरक्षा सुनिश्चित करना अतिआवश्यक है।

shailendra tiwari
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned