रणनीतिक खाका तैयार करने की जरूरत

अब ज्यादा आक्रामक हो गया है चीन...
कैलाश पर्वत शृंखला के हिस्से को खाली करना भारत की सामरिक गलती थी। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सैनिक वहीं हैं, जहां वे थे

By: विकास गुप्ता

Published: 10 Jun 2021, 10:57 AM IST

अरुण जोशी, दक्षिण एशियाई कूटनीतिक मामलों के जानकार

वास्तविक नियंत्रण रेखा से चीनी और भारतीय सैन्य बलों के हटने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद सभी को भरोसा था कि तनाव कम हो जाएगा और दोनों देश बातचीत के माध्यम से सीमा विवाद हल करने में सक्षम होंगे। चीन की नई पैंतरेबाजी से यह आस क्षीण हुई है। पिछले वर्ष 15/16 जून को हुए गलवान घाटी संघर्ष को एक वर्ष हो रहा है, पर अब भी गंभीर तनावपूर्ण हालात हैं, जिससे क्षितिज पर नया खतरा मंडरा रहा है। यह अपरिहार्य सच्चाई है। हालांकि, इन तनावों के बारे में चीन के साथ सख्ती के साथ और प्रभावपूर्ण बातचीत न करने की आदत बन गई है। यह अपने आप में रणनीतिक खतरा है, जिसे देशवासियों को समझना चाहिए।

कोरोना वायरस की दूसरी लहर काफी घातक रही। हजारों लोग कालकवलित हुए, लाखों लोग संक्रमित हुए। इसकी गंभीरता ने इन तनावों पर राष्ट्र को ध्यान आकर्षित करने की अनुमति नहीं दी। इसका मतलब यह नहीं कि समस्या खत्म हो गई। एलएसी पर कई स्थान हैं, जहां चीन-भारत के बीच स्पष्ट सीमा रेखा परिभाषित नहीं होने से टकराव का खतरा हमेशा ही बना रहता है। जैसे कि पिछले वर्ष गलवान घाटी में बर्फीली चोटियों पर हुआ। टकराव को यदि व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह सीमाओं तक सीमित नहीं है। चीन ने अपनी समीपवर्ती सीमा रेखा से परे भारत को उत्तेजित करना शुरू कर दिया है। उसने भौगोलिक और राजनीतिक मामलों पर नियंत्रण के स्पष्ट उद्देश्य के साथ अपने अभियान को तेज किया है। इस काम में वह अपने सार्वकालिक मित्र पाकिस्तान के साथ अफगानिस्तान में भौतिक विस्तार के लिए जुटा है। अप्रेल 2020 के आखिर से चीन ने भारत के लिए ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी है कि वह आसानी से बाहर नहीं निकल सकता। पूर्वी लद्दाख में चीनी बलों की बराबरी में उसे सैन्य बलों, बुनियादी ढांचा और युद्धक मशीनरी की एकसमान संख्या रखनी होती है। लद्दाख की कड़कड़ाती ठंड, जमी हुई झील और बर्फीले पहाड़ों पर भारतीय सेना ऑपरेशनल मोड में रहती है, जहां का तापमान माइनस 40 डिग्री रहता है। इतनी ऊंचाई पर गर्मी कभी नहीं अवतरित होती।

कैलाश पर्वत शृंखला के हिस्से को खाली कर भारत ने एक सामरिक गलती की। चीन अब अपने वादे को पूरा नहीं कर रहा है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सैनिक वहीं हैं, जहां वे थे। उनकी आक्रामक स्थिति से पता चलता है कि वे पीछे नहीं हटेंगे। भारत जिन संभावनाओं का पता लगा सकता है, उनमें से कुछ उच्च जोखिमों से भरी हैं। अन्य क्षेत्रों में भी इससे स्थायी रूप से असाधारण समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। भारत ने तत्कालीन ट्रंप प्रशासन की हस्तक्षेप की पेशकश को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया था कि वह बीजिंग के साथ बातचीत के जरिए मसले को सुलझा लेगा। चीन को चुनौती के लिए भारत को ताकत जुटानी होगी कि वह असम्भव चीजों को सम्भव कर सकता है। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत होगी। इसमें अमरीका अच्छी उम्मीद हो सकता है। इस परिदृश्य में, भारत उस समय की तुलना में अधिक मुसीबतों को आमंत्रित कर रहा होगा। वर्तमान का अमरीकी प्रशासन, जो अफगानिस्तान से जल्द निकलने का इच्छुक है, चीन से सीधे तौर पर बात करने और भारत के पक्ष में खड़ा रहने को उत्सुक नहीं होगा। अगर ऐसा हुआ तो क्या कश्मीर मुद्दे पर भारत-पाक के बीच मध्यस्थता की मांग वाली संभावना से इनकार किया जा सकता है? इस सवाल का जवाब कठिन है।

सबक यह है कि भारत को चीन के बारे में रणनीतिक खाका तैयार करना चाहिए और गहराई से सोचना चाहिए। देश की संप्रभुता और गरिमा दांव पर है। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नरेंद्र मोदी हैं। देश आश्वस्त है कि वे राष्ट्र के उच्च मूल्यवान सिद्धान्तों के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे।

विकास गुप्ता
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