श्रम पलायन का विकल्प तैयार करें

आज कोरोना (Corona) ने सारी अर्थव्यवस्था (Economy) ठप कर दी। सरकारी निर्देश 'परायों' की भाषा बोल रहे थे। अपनापन तो कभी का खो चुका। सरकारों को जीवन को पटरी पर लाने के लिए नए सिरे से सोचना चाहिए। बहुत कुछ अब नहीं बदल पाएगा। अब जो जहां है, उसी के आधार पर नए नियम, निर्देश, मानदण्ड तय करने पड़ेंगे।

By: Shri Gulab Kothari

Published: 23 May 2020, 11:50 AM IST

गुलाब कोठारी

आज कोरोना (Corona) ने सारी अर्थव्यवस्था (Economy) ठप कर दी। सरकारी निर्देश 'परायों' की भाषा बोल रहे थे। अपनापन तो कभी का खो चुका। सरकारों को जीवन को पटरी पर लाने के लिए नए सिरे से सोचना चाहिए। बहुत कुछ अब नहीं बदल पाएगा। अब जो जहां है, उसी के आधार पर नए नियम, निर्देश, मानदण्ड तय करने पड़ेंगे। जो गांव में हैं, उन्हें अर्थव्यवस्था के साथ किस प्रकार जोड़ा जाए। शहरों से जो पलायन हो गया, उसकी पूर्ति के उपाय ढूंढने पड़ेंगे। भर्ती और प्रशिक्षण के आधार बदलने होंगे। सरकारों को भी भारतीय पहचान बनाने का प्रयास करना होगा। आज सरकार और कानून दोनों की भाषाएं विदेशी आवरण लिए है।

गांव आर्थिक रीढ़ है-कृषि और पशुपालन के कारण। पूरे देश में राजस्थान ही एकमात्र प्रदेश है जहां पशुपालन (Animal husbandry) है। यहां से ही पूरे देश को गायें, भेड़, घोड़े, ऊंट आदि पशु उपलब्ध होते हैं। यूरोप के कई देश-हॉलैण्ड, स्वीडन, स्वीट्जरलैण्ड आदि के डेयरी उद्योग के स्वरूप का आकलन करना चाहिए। लाखों को रोजगार मिल जाएगा। आज तो सारी नीतियां वहां खेती करने की बनाई जा रही हैं। पूरा गंगानगर, हनुमानगढ़ और नहरी क्षेत्र कैंसर की खेती कर रहा है। हम परम्परागत देशी खेती कर लें तो आज पूरे विश्व में इसकी मांग बढ़ रही है। उपज कम होगी, मूल्य अच्छा मिलेगा। कीटनाशक, सस्ते ऋण, बैंकों के ब्याज, फसल बीमा जैसे सारे मायाजाल से मुक्त हो सकते हैं। कृषि के साथ डेयरी (Dairy) अनिवार्य हो तो प्रकृति के अनुकूल भी सुरक्षा व्यवस्था हो जाएगी।

वृक्षारोपण एक अभियान बन सकता है। सरकार विलायती बबूल के कांटे बो रही है। हमें क्षेत्र के अनुसार फल-औषधियों के वृक्ष लगाने हैं। जूली फ्लौरा को उखाडऩे के लिए भी अभियान चलाना चाहिए। पानी और जमीन दोनों का शत्रु है। पशु भी नहीं खाते। छाया तक नहीं देता। वृक्ष लगाने के साथ जल-संग्रहण कार्य स्वत: ही तेजी पकड़ लेगा। राजस्थान (पश्चिमी) में तो वर्षा का औसत न्यूनतम है। यह भी एक कारण है कि क्यों यहां के पशु अच्छे होते हैं। गांवों का आधार पुश्तैनी कर्म रहा है। उसको पुनर्जीवित करना आवश्यक है। हर गांव में हर व्यक्ति के लिए एक सम्मानजनक कार्य उपलब्ध है।

शिक्षा ने जो सपने दिखाए उसका परिणाम निकम्मापन ही निकला। कौवा चला हंस की चाल, अपनी चाल भी भूला। कुम्हार का बेटा घर की पूंजी बेचकर पढ़ गया। नौकरी मिली नहीं। चाक पर भी आकर नहीं बैठने वाला। निकम्मा हो गया। किसी को उसकी हालत पर तरस आने वाला नहीं है। शिक्षा ने जो 'डिग्निटी ऑफ लेबर' की अवधारणा को जन्म दिया, हर व्यक्ति नौकरी चाहता है।

भारत का प्रत्येक गांव कलाओं का संग्रहालय है। जहां की जैसी भौगोलिक स्थिति है, वहां उसे ही प्रमुखता और कलात्मक श्रेष्ठता से अभिव्यक्त किया जाता रहा है। प्रकृति ही हमारे जीवन को संचालित करती है, हमारा पोषण करती है, स्वस्थ (स्व के पास स्थित-आत्मस्थ) रखती है। शिक्षा ने मानव को कर्ता बनाकर पेट से बांध लिया है। यही जीवन की सबसे बड़ी बीमारी है। हमें इस भूखेपन, अभावग्रस्त या दरिद्रता की मानसिकता से बाहर निकलना है। गरीब भी दुआ तो दे ही सकता है। शिक्षित देना चाहता भी नहीं, देना सीखता भी नहीं। अत: उम्रभर वे भूखे ही दिखाई पड़ते हैं। जीवन को लक्षित भी कहां करते हैं। कोई उनसे पूछे कि, धन क्यों कमाना चाहते हैं, तो शायद इसका उत्तर भी जीवन से जुड़ा नहीं होगा।

नए भारत में जीवन को उपयोगिता देनी है। माटी को पहचान देनी है। कर्मयोग, भक्तियोग की दिशा तय करनी है। मानवता के महत्व को प्रतिष्ठित करना है। आज जिस प्रकार सड़कों पर अपमानित किया जा रहा है, सियासत का मोहरा बनकर कुण्ठित है, इस त्रासदी से बाहर आना है। इसके लिए राजस्थान पत्रिका आज से 'बिल्ड अप इण्डिया' अभियान शुरू कर रही है। प्रवासी गांव में ही रहें। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करें। शहरों के श्रम पलायन का विकल्प तैयार करें। जो कुछ आज बदल रहा है, उसे नैसर्गिक भाषा में समझने के प्रयास होने चाहिए। केवल बुद्धिमता के अहंकार में भारत की आत्मा दिखाई ही नहीं देती। मैंने किसी कृषि अधिकारी को क्षेत्रानुसार फसलों की योजना बनाते, अकाल में किसान की मदद करते या बीमा कंपनियों की कारगुजारी से रक्षा करते नहीं देखा। फिर खाद्य निरीक्षक और कृषि अधिकारी में क्या अंतर है! जब तक सरकारी चोर योजनाओं को रास्ते में ही लूटना बंद नहीं करेंगे, इस देश का विकास नहीं होगा। पहले इन सबको मानसिक रूप से माटी से जोडऩा होगा। आज से पत्रिका और जनता मिलकर इस अभियान को मूर्त रूप देने का प्रयास करेंगे। ईश्वर हमारे संकल्प के साथ चले।

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