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स्वास्थ्य के क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देने की आवश्यकता

बीमारियों के उपचार पर अक्सर विदेशी दवा अथवा शोध के भरोसे बैठे रहना भी तो ठीक नहीं है। हमारे पास आज किस चीज की कमी है, जो हम दूसरे देशों का इंतजार करें? कोरोना की वैक्सीन बनाकर भारत ने यह करके दिखा दिया। मेडिकल कॉलेज के शिक्षक इसके लिए आगे आएं, ताकि दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़े।

नई दिल्ली

Published: December 18, 2021 10:38:58 am

स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार की संभावनाएं सदैव ही बनी रहती हैं। बढ़ती बीमारियों के बीच उन पर काबू पाने का संघर्ष भी दिन-ब-दिन बढ़ रहा है। कोरोनाकाल के भीषण दौर से हम गुजर रहे हैं। तकरीबन दो साल में हमने बहुत कुछ सीखा और समझा। इसके बाद भी बहुत कुछ बाकी रह गया। अब ओमिक्रॉन की घुसपैठ से जनता दहशत में है। वैक्सीन के बाद भी अनेकानेक आशंकाएं डर का माहौल बनाए हुए हैं। उपलब्ध संसाधन कम पडऩे लगे हैं। रोगों की बाढ़ पर अंकुश बहुत जरूरी हो गया है। किसी भी दवा के वास्तविक प्रभाव का पता केवल गहराई से वैज्ञानिक रिसर्च करके ही लगाया जा सकता है। कोविड-19 महामारी से बचाव के लिए वैक्सीन बनाने की होड़ पूरी दुनिया में लगी। रिसर्च पर भी शंका उठती रहीं, इसके बाद भी कुछ हद तक उम्मीद की किरण ने मायूस चेहरों पर चमक ला दी।
Need to promote research in the field of health
अब इस पर भी अध्ययन होने लगा है कि ऐसी स्थिति बनी कैसे?

कोरोना के चलते सभी लोगों ने स्वच्छता का सबक सीखा, सेहत के प्रति सावचेती का पाठ पढ़ाया। कोरोना संक्रमण की शुरुआत में देश की चिकित्सा व्यवस्था की स्थिति उजागर हुई । हालांकि ऑक्सीजन से लेकर वेंटिलेटर की खामियां दुनियाभर के देशों में रहीं, पर अपने मुल्क की बेचारगी भी कम नहीं थी। इसके बाद राजस्थान सरकार के कार्य पूरे देश के लिए उदाहरण बने, तो राज्य में ऑक्सीजन समेत अन्य खामियों को दूर करने का अभियान सा चला।

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सुधार इसलिए हुआ, क्योंकि हम अचानक आए इस रोग से मुकाबला करने के लिए व्यवस्था को सुदृढ़ करने में जुट गए। हार नहीं मानी, न ही दूसरे देशों को देखकर चुप्पी साधी। असल में किसी भी रोग से मुकाबले के लिए मेडिकल व्यवस्था का चाक-चौबंद होना बेहद जरूरी है।
कोरोना जैविक था या कृत्रिम, अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है। इस पर भी अध्ययन चल रहा है। सेहत सुधार के अनवरत चलने वाले अभियान में देश को मजबूत करने की आवश्यकता है। स्कूली बच्चों को फिटनेस मंत्र-पाठ देना तो बहुत अच्छा है, पर बड़ों को भी इससे अलग करना ठीक नहीं। स्वस्थ्य रहने के तौर-तरीके भूल रहे हैं, तो बदलती लाइफ स्टाइल भी कोढ़ में खाज वाली कहावत को चरितार्थ कर रही है। रोगों से आमजन को बचाने की जिम्मेदारी तो मेडिकल सेक्टर के लोगों की ही है।
डॉक्टर के साथ इस क्षेत्र के अलग-अलग मोर्चों पर डटे लोगों को ही आगे आकर कोरोना जैसी बीमारियों को हराना होगा। इसके लिए संसाधन विकसित हों। शोध कार्य कम हो रहे हैं, उन्हें बढ़ाने की जरूरत है। बीमारियों के उपचार पर अक्सर विदेशी दवा अथवा शोध के भरोसे बैठे रहना भी तो ठीक नहीं है। हमारे पास आज किस चीज की कमी है, जो हम दूसरे देशों का इंतजार करें? कोरोना की वैक्सीन बनाकर भारत ने यह करके दिखा दिया।

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मेडिकल कॉलेज के शिक्षक इसके लिए आगे आएं, ताकि दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़े। उनकी प्राइवेट प्रैक्टिस बंद हो। शोध के लिए यूनिवर्सिटी/कॉलेज समेत अन्य साधन-संसाधन भी विकसित किए जाएं। रिसर्च के प्रति समर्पण अमरीका-यूरोप जैसे देशों से भी सीखा जा सकता है। आने वाला समय मेडिकल क्षेत्र की मजबूती का हो। हमारे मेडिकल क्षेत्र के हुनरमंद युवा बाहर नहीं जाएं, इसके लिए माहौल तैयार करना होगा।
ईश मुंजाल
(सदस्य, राजस्थान मेडिकल काउंसिल)

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