नेपाल-भारत संबंध फिर से मजबूत होने की उम्मीद

नेपाल के नए प्रधानमंत्री के सामने चुनौतियों का अम्बार है।
शेर बहादुर देउबा सरकार भारत और चीन के बीच संतुलन बनाना पसंद करेगी, लेकिन उसे चीन को प्रतिबद्ध सहयोगी के रूप में देखने से बचना चाहिए ।

By: विकास गुप्ता

Published: 21 Jul 2021, 08:58 AM IST

के.एस. तोमर, वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक

नेपाल के नए प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने संसद में विश्वास मत हासिल कर लिया है। पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाले सीपीएन-यूएमएल के एक गुट के समर्थन ने देउबा को सहज जीत की ओर अग्रसर किया। उनकी जीत भारत के लिए अच्छा शगुन है और चीन के लिए बड़ा झटका। ऐसा इसलिए कि ओली ने चीन की शह पर नेपाल और भारत के बीच सदियों पुराने सम्बंधों को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया था।

प्रधानमंत्री को बहुमत के लिए जरूरी 136 वोटों के मुकाबले 165 वोट मिले। संसद की प्रतिनिधि सभा में 275 सदस्य हैं। इनमें नेपाली कांग्रेस के 61, पुष्प कमल दहल की पार्टी माओवादी केन्द्र के 49, समाजबादी पार्टी के दोनों धड़े के 32 (दो निलम्बित), पूर्व प्रधानमंत्री के करीबी माधव नेपाल के गुट के 23 सदस्य हैं। ओली की पार्टी सीपीएन (यूएमएल) के एक गुट ने अपने नेता के आदेश के खिलाफ देउबा का समर्थन किया। माधव नेपाल के धड़े ने 21 मई को शेर बहादुर देउबा द्वारा दायर उस याचिका पर हस्ताक्षर किए थे, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने संसद को बहाल किया था और पांच महीने में दूसरी बार संसद के निचले सदन को भंग कर मध्यावधि चुनाव कराने वाले राष्ट्रपति के आदेश को पलटा था। सुप्रीम कोर्ट ने व्हिप की वैधता को भी खत्म कर दिया था, क्योंकि इसका दुरुपयोग किया जा रहा था।

आश्चर्यजनक तो यह है कि ओली की पार्टी के पास 121 सदस्यों की ताकत है, जो संसद में हाल के विश्वास मत के दौरान घटकर 83 ही रह गई। यह संगठन में ओली की घटती लोकप्रियता का चिह्न है। उनके गुट के 28 सांसद गैरहाजिर रहे। अब गठबंधन सहयोगी प्रचंड की माओवादी केन्द्र और भारत की बिहार सीमा से सटे तराई क्षेत्र की समाजबादी पार्टी (मधेशी) के साथ नेपाली कांग्रेस देश पर शासन करेगी।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देउबा को विश्वास मत हासिल करने पर सबसे पहले बधाई दी। प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट किया-' प्रधानमंत्री के सफल कार्यकाल के लिए शुभकामनाएं। मैं दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करने के लिए उनके साथ काम करने को लेकर उत्सुक हूं।' विशेषज्ञों का कहना है कि देउबा ने पूर्व में हिमालयी देश के चार बार प्रधानमंत्रीे के रूप में नेपाल-भारत रिश्तों को मजबूत करने के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई थी। इसलिए पूर्व प्रधानमंत्री ओली के कार्यकाल में बिगड़े दोनों देशों के रिश्तों को सुधारने पर देउबा गंभीरता से ध्यान देंगे।

नए प्रधानमंत्री के सामने चुनौतियों का अम्बार है। देउबा को दोनों राष्ट्रों के बीच पुराने सम्बंधों में ताजगी लानी होगी। ओली ने भारतीय सीमाओं को नेपाल के मानचित्र में दिखाकर और कैलाश मानसरोवर तक भारत द्वारा बनाई जा रही सड़क को लेकर कड़ी आपत्ति जताकर विवाद उत्पन्न कर दिया था। देउबा चीन की भी उपेक्षा नहीं कर सकते। उसने पहले ही नेपाल में बड़ा निवेश किया हुआ है। चीन 12 अक्टूबर, 2019 को 200 बिलियन नेपाली रुपए के निवेश वाली 18 परियोजनाओं पर हस्ताक्षर कर चुका है। साथ ही जीवनस्तर सुधारने के लिए 56 बिलियन एनपीआर की वित्तीय सहायता दी थी। कोविड से निपटना भी बड़ी चुनौती है। सरकार के पास वैक्सीन का स्टॉक नहीं है। ऐतिहासिक तथ्य है कि नेपाली कांग्रेस के भारत के साथ घनिष्ठ सम्बंध रहे हैं। ओली का जाना भारत के लिए अच्छा है। इससे दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क में आसानी होगी। साथ ही दोनों देशों के बीच मजबूत समन्वय होगा। विश्लेषकों का मानना है कि भारत को देउबा सरकार का समर्थन करना चाहिए। देउबा सरकार भारत और चीन के बीच संतुलन बनाना पसंद करेगी, लेकिन उसे चीन को प्रतिबद्ध सहयोगी के रूप में देखने से बचना चाहिए।

विकास गुप्ता
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