पीएम मोदी के सख्त मैसेज से राजनीति में नई शुरुआत !

New beginning in politics : भाजपा संसदीय दल की बैठक में पीएम ने साफ किए इरादे। दो टूक कहा कि बेटा किसी का भी हो, अब मनमानी नहीं चलेगी।

By: भुवनेश जैन

Published: 03 Jul 2019, 01:14 PM IST

भुवनेश जैन

New beginning in politics : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने नए 'स्वच्छता अभियान' को और आगे बढ़ा दिया। भाजपा संसदीय दल की बैठक में उन्होंने दो टूक शब्दों में संदेश दे दिया कि 'बेटा किसी का भी हो, अब मनमानी नहीं चलेगी'। हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन हर कोई जानता है कि उनका इशारा पार्टी के एक ताकतवर महासचिव के विधायक पुत्र की ओर था। सरकारी अधिकारी को सरेआम क्रिकेट के बल्ले से पीट कर चर्चा में आए ये युवा विधायक दो दिन पहले ही जमानत पर छूट कर जेल से बाहर आए हैं। जेल से छूट कर आने के बाद भी वे बेशर्मी से बोले कि उन्हें अपने किए पर कोई अफसोस नहीं है।

राजनीति में दूसरे लोगों की गलतियां गिनाना तो बहुत आसान होता है, लेकिन बात जब अपनी पार्टी की आती है तो बड़े-बड़े राजनेता च्अपनेच् लोगों को अंगुली दिखाने की हिम्मत नहीं कर पाते। इस लिहाज से प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य को साहसिक कहा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री को इसके लिए बधाई। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि प्रधानमंत्री की इस सार्वजनिक लताड़ के बाद सत्ता पक्ष में किसी न किसी तरह शामिल हो गए आपराधिक मनोवृत्ति के लोगों के कारनामों पर अंकुश लगेगा। कुछ लोगों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए तो और भी अच्छा होगा। अपने अभिभावकों के सत्ता बल का दुरुपयोग करने वाली संतानों से तो भाजपा को पीछा छुड़ा ही लेना चाहिए।

शुरुआत भ्रष्ट अधिकारियों की सेवा मुक्ति से
देखा जाए तो मोदी अपने इस नए स्वच्छता अभियान की शुरुआत राजस्व सेवा के भ्रष्ट अधिकारियों को सेवामुक्त करके पहले ही कर चुके हैं। चुनावों में प्रत्याशियों के चयन में भी इसकी झलक देखने को मिली जब अनेक प्रभावशाली वंशवादी और आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों के टिकट काट दिए गए। हालांकि इसके बाद भी पार्टी में बहुत से आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों ने किसी न किसी तरह जगह बना ली। पर, चलो शुरुआत तो हुई। दूसरी पार्टियां इस मामले में इतनी भी हिम्मत नहीं कर पा रहीं। हो सकता है प्रधानमंत्री की इस अनूठी पहल से राजनीति को आपराधिक तत्वों से मुक्त करने का बड़ा रास्ता खुल जाए।

अनदेखी के परिणाम खतरनाक
किसी जनप्रतिनिधि के अपराध को अनदेखा कर देने के क्या नतीजे हो सकते हैं, इंदौर की घटना के बाद इसके कई ज्वलंत उदाहरण सामने आए। दो दिन बाद ही सतना में भाजपा कार्यकर्ताओं ने एक नगरपालिका अफसर की पिटाई कर दी। दमोह में एक युवा नेता बैट लेकर नगरपालिका पहुंच गया। कानून हाथ में लेकर सरकारी कर्मचारियों की पिटाई करने या गाली-गलौज करने वाले जनप्रतिनिधियों की कारस्तानियों के सैकड़ों उदाहरण हैं।

राजस्थान में देवीसिंह भाटी, प्रहलाद गुंजल जैसे नेताओं के नाम और कारनामें आज भी लोगों को याद हैं। मध्यप्रदेश में विश्वास सारंग से लेकर अनूप मिश्रा तक कई जनप्रतिनिधियों या उनके संबंधियों पर ऐसे आरोप लगे। ज्यादातर जनप्रतिनिधि अपनी ऊंची पहुंच के कारण कानून के शिकंजे से बच निकलते हैं। मध्यप्रदेश का शहला मसूद कांड इसका उदाहरण है। कांग्रेस व दूसरी पार्टियां भी ऐसे ही आपराधिक तत्वों से भरी हुई हैं। लेकिन प्राय: पार्टियों के शीर्ष नेता या तो उनकी अनेदखी कर जाते हैं या आपराधिक कारनामों को ढकने में लग जाते हैं। यही वजह है कि संसद और विधानसभा में आपराधिक इतिहास वाले जनप्रतिनिधियों की संख्या कम नहीं हो पा रही। प्रधानमंत्री के कठोर रुख को आशा की नई किरण के रूप में देखा जा सकता है।

बिगड़ैल नेताओं और उनके समर्थकों पर अंकुश जरूरी
जब आपराधिक मनोवृत्ति वाले लोग जनप्रतिनिधि बनकर सत्ता में पहुंच जाते हैं तो आमतौर पर उनकी संतानें भी अपने अभिभावकों के नक्शेकदम पर चल देती हैं। इसलिए जरूरी है शुरुआत में ही उन पर रोक लगाई जाए। प्रधानमंत्री की मंशा स्पष्ट है कि अपराध के सार्वजनिक प्रदर्शन में सहयोग करने वालों को भी बख्शा नहीं जाएगा।
यदि एक साथ इस तरह राजनीति में घुली गंदगी को साफ किया जाता है तो भारत की गौरवशाली राजनीतिक व्यवस्था को लौटने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। आशा की जानी चाहिए कि आने वाले समय में स्वच्छता की छलनी में छंटकर कई अपराधी बाहर हो जाएंगे।

प्राय: देखा जाता है कि अपराधों में लिप्त जनप्रतिनिधियों और उनकी संतानों को पुलिस अफसर, आयकर, यातायात जैसे विभाग छूते भी नहीं हैं। नशा कर के अंधाधुध वाहन दौड़ाने वाली बिगडै़ल संतानों के तो ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे। ऐसा भेदभाव करने वाले अधिकारियों पर भी कार्रवाई की जानी चाहिए। ऐसे जनप्रतिनिधियों को तो पार्टी से बाहर निकाल देना चाहिए, क्योंकि बिना उनके संरक्षण के उनकी संतान कानून से खेलने की हिम्मत नहीं कर सकती। फिर भले ही ऐसा जनप्रतिनिधि राजनीतिक रूप से कितना भी उपयोगी क्यों न हो। कटार सोने की भी हो तो उसे पेट में नहीं डाला जा सकता।

कठोर तो होना पड़ेगा
प्रधानमंत्री ने जो सख्त रुख दिखाया है, उसका संदेश देश में ही नहीं, विश्वभर में गया है। विश्व की सबसे बड़ी पार्टियों में से एक भाजपा उनके इरादे को कठोरता से लागू कर देती है और इंदौर विधायक, उनके सहयोगियों और संरक्षकों को घर बैठा देती है तो यह कदम लोकतंत्र की स्वच्छता के अभियान में मील का पत्थर साबित होगा।

भुवनेश जैन
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