लक्ष्य भी तय हों

मानव संसाधन विकास विभाग अब पुन: शिक्षा विभाग हो जाएगा-बधाई। दशकों बाद शिक्षा नीति में बदलाव किया गया है, जबकि जीवनशैली और आवश्यकताएं तो बहुत तेजी से बदल रहीं हैं। इस बार नई नीति में भारतीयता को प्राथमिकता मिलेगी, मैकाले की क्लर्की से पीछा छूटेगा।

By: Shri Gulab Kothari

Published: 31 Jul 2020, 07:20 AM IST

- गुलाब कोठारी

मानव संसाधन विकास विभाग अब पुन: शिक्षा विभाग हो जाएगा-बधाई। दशकों बाद शिक्षा नीति में बदलाव किया गया है, जबकि जीवनशैली और आवश्यकताएं तो बहुत तेजी से बदल रहीं हैं। इस बार नई नीति में भारतीयता को प्राथमिकता मिलेगी, मैकाले की क्लर्की से पीछा छूटेगा। शिक्षा विभाग को एक बड़ा संकल्प यह भी करना चाहिए कि भारत के पुरातन-ज्ञान (वेद-उपनिषद्-गीता आदि) का भी शिक्षा में पूर्ण समावेश रहे। उस काल में आज का कोई भी धर्म पैदा नहीं हुआ था। हमारा ज्ञान सही अर्थों में धर्म निरपेक्ष है, मानव मात्र के लिए है। तब हमारी संतानें प्रज्ञावान बनेंगी, केवल बुद्धिमान नहीं। राष्ट्रधर्म, मानवीय संवेदना का अभाव देखा जाता है शुद्ध बुद्धिजीवियों में। वे अच्छे नौकर बन सकते हैं-बस!

यह एक अच्छा विचार है कि छात्र-छात्राएं किसी भी स्तर पर पढ़ाई छोड़ सकते हैं। इसके साथ यह भी अनिवार्य है कि उसी के अनुरूप ‘कौशल विकास’ की योजना भी बन जानी चाहिए। आज शिक्षा महंगी हो गई, बेरोजगारी बढ़ रही है। पढऩे-पढ़ाने के लिए धन कहां है? एक प्रश्न यह भी उठता है कि बच्चा पढ़े ही क्यों? अधपढ़ा रहकर न नौकरी कर सकता है, न ही पुश्तैनी काम पर लौट सकता है। पूंजी तो खर्च हो जाती है, लाभ परिवार तक नहीं पहुंचता बल्कि कष्ट शुरू हो जाते हैं।

नई शिक्षा में 10+2 के स्थान पर 5+3+3+4 कर देना कितना भी आकर्षक लगे, स्कूली शिक्षा में एक और साल जोड़ दिया गया। पहले भी हाई स्कूल+पीयूसी को हटाकर बारह वर्ष का हायर सैकण्डरी कर दिया गया था। अब स्नातक का क्रम आगे और खिसक गया। भारत जैसे गरीब देश में यह परोक्ष भार कम नहीं है। नौकरी भी आगे खिसक जाएगी।

नीति के दो स्तर होते हैं। एक शिक्षा के पाठ्यक्रम का तथा दूसरा, ढांचागत व्यवस्था का। यूजीसी, नियामक आयोग जैसे विषय ढांचागत व्यवस्था में आते हैं। शिक्षा के परिणामों, व्यक्तित्व निर्माण, मानवीय सम्मान जैसे सभी विषय शिक्षा के लक्ष्यों का अंग होते हैं। शिक्षा विभाग को इन लक्ष्यों की घोषणा भी करनी चाहिए। अंग्रेजी मानसिकता वाले, साम्प्रदायिक विचारधारा एवं देश को खण्डित करने की वृत्ति से भी छुटकारा दिलाना है। इस कार्य को विधायिका के हाथ में ही होना चाहिए, कार्यपालिका के हाथ में नहीं। स्थानीय भाषाओं का उच्च शिक्षा में प्रवेश देश में नया प्रकाश पैदा करेगा। स्कूलों में अंग्रेजी विषय तो पढ़ाया जाए, किन्तु माध्यम हिन्दी या स्थानीय भाषा ही रहे। अंग्रेजी माध्यम का विकल्प विश्वविद्यालय स्तर पर ही उपलब्ध रहे। स्वत: ही हमारी संस्कृति शिक्षा में प्रवेश कर जाएगी। तब जाकर शिक्षित व्यक्ति समाज को कुछ लौटाने की सोचने योग्य होगा। आज तो बस झोली भरे, न पेट। ऐसे शिक्षित देश के काम नहीं आ सकते। इसके लिए यह भी आवश्यक है कि विभिन्न विषयों में प्रवेश मेरिट पर भी हो, तथा रुझान (एप्टिट्यूड) टेस्ट के बाद ही मिले। इससे छात्र/छात्रा की सफलता भी सुनिश्चित हो सकेगी।

इस दृष्टि से ‘न्यू टाइप’ की शिक्षा ने शिक्षा से समझदारी ही छीन ली। केवल अच्छे अंक लाकर गाल तो फुला कर ऐंठ सकते हैं, किन्तु एक निबंध भी नहीं लिख सकते। नई नीति के क्रियान्वयन में सामथ्र्य बढ़ाने पर जोर देना चाहिए। आस्थावान मानव-शृंखला पैदा करनी चाहिए। ऐसे अंकों को स्पर्धा में कहीं स्थान नहीं मिलेगा। बिना लाए भी न बने और लाने का लाभ भी नहीं। क्योंकि रटना ज्ञान नहीं हो सकता। शिक्षा देने वाले और लेने वाले दोनों ही स्वयं को भ्रमित करते हैं। भीतर सब ढोल की पोल।

अन्त में एक और मुद्दा। शिक्षा आज ऑनलाइन होती जा रही है। कोरोना ने ‘वर्क फ्रॉम होम’ की तरह ही ‘लर्न फ्रॉम होम’ भी कर दिया है। आधा देश गरीब है, एक चौथाई बेरोजगार। कहां से व्यवस्था हो पाएगी? दो तरह की व्यवस्थाओं के मध्य कैसे सामंजस्य बैठ पाएगा, यह देखने वाली बात है। आज तो जेबें भी खाली हैं, सिवाय सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों के। पेट और शिक्षा की अनिवार्यता में संघर्ष का काल शुरू हो गया है। ऑनलाइन में तो छोटे बच्चों के स्वास्थ्य के भी बड़े प्रश्न उठ रहे हैं। तब शिक्षा किस भाव पड़ेगी और क्या बढ़ती बेरोजगारी इसका हल उपलब्ध करा सकेगी?

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