आरक्षण नहीं, रोजगार है समाधान

आरक्षण नहीं, रोजगार है समाधान

Dilip Chaturvedi | Publish: Jan, 09 2019 05:10:04 PM (IST) विचार

मोदी सरकार आज वही कर रही है जो पांच साल पहले मनमोहन सिंह सरकार ने जाट आरक्षण को लेकर किया था। चुनाव से कुछ महीने पहले आरक्षण की घोषणा की गई थी, बीजेपी ने भी समर्थन कर दिया। चुनाव के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जाट आरक्षण खारिज कर दिया और चुनाव में जनता ने कांग्रेस को।

योगेंद्र यादव, विश्लेषक
देरी से ही सही, जाते-जाते मोदी जी एक सर्जिकल स्ट्राइक कर गए। यह प्रतिक्रिया थी अखबार की सुर्खियां पढऩे के बाद एक बेरोजगार युवक की। मुख्य पृष्ठ पर गरीबों के लिए 10त्न आरक्षण की घोषणा की खबर थी, जिसे चुनाव से पहले सर्जिकल स्ट्राइक बताया गया था। मुझसे रहा नहीं गया, 'भाई, यह सर्जिकल स्ट्राइक नहीं, यह तो खाली कारतूस चलाया है। सिर्फ देरी से नहीं, गलत निशाने पर चलाया है। सबको पता है कि लागू नहीं हो सकता। और लागू हो गया तो एक भी गरीब सवर्ण को नौकरी मिलने वाली नहीं है।' मेरी बात सुनकर वह चौंका द्ग 'पहले यह बताइए कि देश में सवर्ण भी गरीब हैं या नहीं? या कि शिक्षा व नौकरी के सारे अवसर एससी-एसटी, ओबीसी के लिए ही होंगे?'

अब मेरी बारी थी द्ग 'बेटा, इसमें कोई शक नहीं कि देश की अधिकांश सवर्ण जातियों के अधिकांश परिवार तंगी में गुजारा करते हैं। दिल्ली में रिक्शा चलाने या मजदूरी का काम करने जो लोग बिहार से आते हैं, उनमें बड़ी संख्या सवर्ण जातियों की होती है जो अपने गांव में छोटा काम कर नहीं सकते। देश में रोजगार का संकट है, सवर्ण समाज को भी रोजगार का संकट है। उन्हें काम चाहिए, रोजगार चाहिए और अभी चाहिए। कोई सरकार उनके लिए कुछ भी करे, स्वागत होना ही चाहिए।'

उसे जैसे ढाढ़स बंधा। मैंने उसे याद दिलाया कि यह घोषणा सिर्फ सवर्ण समाज के लिए नहीं है, मुसलमान, ईसाई और सिख जो भी आरक्षण के तहत नहीं आते, उन सब सामान्य वर्गों के गरीब इसके दायरे में आएंगे। और न ही यह पहली बार हुई है। सितंबर 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार ने भी ऐसा ही आदेश जारी किया था। सुप्रीम कोर्ट में उसे चुनौती दी गई। 1992 के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की बेंच ने सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए आरक्षण को दो आधार पर अवैध और असंवैधानिक घोषित किया। पहला यह कि संविधान में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है। केवल आर्थिक आधार पर आरक्षण, संविधान के प्रावधानों व आरक्षण की भावना के खिलाफ है। दूसरा यह कि आर्थिक आधार पर 10त्न आरक्षण से यह कुल 59% हो जाएगा जो सुप्रीम कोर्ट की तय सीमा 50% से ज्यादा है। जो आपत्ति तब थी, वह आज भी मान्य होगी।
'लेकिन इस बार तो सरकार संविधान में संशोधन करने जा रही है।' उसने काफी उम्मीद के साथ कहा। मैंने उसे समझाया कि संविधान संशोधन पेचीदा और लंबा मामला है। पहले लोकसभा और राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत चाहिए फिर राज्यों में विधानसभा से पास करवाना होगा। और संशोधन हो भी गया तो भी सुप्रीम कोर्ट उसे खारिज कर सकता है।

लेकिन असली दिक्कत यह नहीं है। मान लीजिए संशोधन हो जाए, मान लीजिए सुप्रीम कोर्ट स्वीकार भी कर ले, तो भी इस आरक्षण से सामान्य वर्ग के वास्तविक गरीबों को कोई फायदा नहीं मिलेगा। सरकार ने इस आरक्षण के लिए गरीब की परिभाषा अजीब बना दी है। जो इनकम टैक्स में 8 लाख या कम आमदनी दिखाए या जिसके पास 5 एकड़ या कम जमीन हो या बड़ा मकान न हो, उन सबको गरीब माना जाएगा। मतलब यह कि हर महीने एक लाख से अधिक तनख्वाह पाने वाले या बहुत बड़े किसानों और व्यापारियों को छोड़कर लगभग सभी सामान्य वर्ग के लोग इस आरक्षण के हकदार हो जाएंगे। मजदूर या रिक्शावाले के बेटे को वकील और अध्यापक के बच्चे के साथ इस 10% आरक्षण के लिए मुकाबला करना होगा। जिस वर्ग को बिना आरक्षण के आज भी 20 या 30% नौकरियां मिल रही हैं, उसे 10% आरक्षण देने से क्या मिलेगा? कागज पर आरक्षण रहेगा और एक भी व्यक्ति को नौकरी देने की जरूरत नहीं होगी।

अब उसके चेहरे पर निराशा थी, 'यह सब तो सरकार को भी पता होगा। तो फिर सरकार यह घोषणा क्यों कर रही है?' जवाब उसे भी पता था, मुझे भी। मोदी सरकार आज वही कर रही है जो पांच साल पहले मनमोहन सिंह सरकार ने जाट आरक्षण को लेकर किया था। चुनाव से कुछ महीने पहले आरक्षण की घोषणा की गई थी, बीजेपी ने भी समर्थन कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव के बाद जाट आरक्षण खारिज कर दिया और चुनाव में जनता ने कांग्रेस को। इस बार भी वही हो रहा है। बीजेपी को चुनावी हार दिख रही है, अब जानबूझकर ऐसे प्रस्ताव ला रही है, जिससे बस चुनाव के वक्त ध्यान बंट जाएगा। कांग्रेस भी खेल खेल रही है कि हम विरोध कर के बुरे क्यों बने।

'तो फिर करना क्या चाहिए?' अब उसकी निराशा खीज में बदल रही थी। मैंने बात को समेटा द्ग 'समस्या आरक्षण की नहीं, रोजगार की है। अगर नौकरी ही नहीं होगी तो आरक्षण देने या न देने से क्या फर्क पड़ेगा। आज केंद्र सरकार के पास चार लाख से अधिक पद रिक्त हैं और राज्य सरकारों के पास करीब 20 लाख पद। सरकार पैसा बचाने के लिए पद भर नहीं रही। प्राइवेट सेक्टर में नौकरियां कम हो रही हैं। पिछले साल एक करोड़ से ज्यादा नौकरियां घटी हैं। अगर बीजेपी सरकार गंभीर है तो इन नौकरियों को भरने का आदेश जारी क्यों नहीं करती? अगर कांग्रेस गंभीर है तो अपनी सरकारों से रोजगार क्यों नहीं दिलवाती?'
दोनों के मुंह से एक साथ निकला- 'यानी, जुमला नहीं, जॉब चाहिए!'

(लेखक, स्वराज इंडिया के अध्यक्ष। लंबे समय सीएसडीएस से संबद्ध रहे हैं।)

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