सम्पूर्ण क्रांति की अवधारणा में अहिंसक संघर्ष

विनोबा जयंती 11 सितम्बर पर विशेष

सर्वोदय विचारधारा के जनक, भारत की विभूतियां है। विश्वविद्यालय व कालेजों में उन्हें पढ़ाया जाना चाहिए व चर्चा कराई जानी चाहिए जिससे युवा पीढ़ी इन क्रांतिकारियों को जान सके, सीख सके।

By: shailendra tiwari

Updated: 10 Sep 2020, 04:48 PM IST

डाॅ. सत्यनारायण सिंह, पूर्व आईएएस

गांधी का लक्ष्य एक अहिंसक समाज की रचना करने का था। ‘‘ग्राम स्वराज पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था, आर्थिक विकेन्द्रीयकरण, ट्रस्टशिप व स्वदेशी के आधार पर अर्थव्यवस्था तथा उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अहिंसक सत्याग्रह।’’ विनोबा भावे की मान्यता थी, सर्वोदय (गांधी विचार) को रचनात्मक कार्यक्रमों और लोक शिक्षण के माध्यम से ही स्थापित किया जा सकता है। विनोबा ने रचनात्मक कार्यक्रमों को सत्याग्रह की संज्ञा दी और हृदय परिवर्तन को सत्याग्रह की विधि। ग्राम-दान, भू-दान हृदय परिवर्तन की विधि का ही रूप माना। धीरेन्द्र मजूमदार ने विनोबा के आन्दोलन को क्रांति कहकर सम्बोधित किया है जो सभ्यता व परम्परा को बदलने के लिए था। भू-दान, ग्राम-दान आन्दोलन से, सदियो से भूमि की मिलकियत के संबंध में जो मूल्य समाज में प्रतिष्ठित थे उनके प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन आया। ग्राम दान का संदेश दूर-दूर तक पहुंचा लेकिन ट्रस्टीशिप की स्थापना के लिए दबाब निर्मित नहीं हुआ।


लोक शिक्षण न्यासिता के सिद्धांत को बड़े उद्योगों की स्थापना काल में, व्यवहारिक रूप नहीं दे सका। बिनोबा ने लोक शिक्षण को महत्व दिया, अहिंसक असहयोग और सविनय अवज्ञा उसके अंग नहीं थे। राज्य पर दबाब डालकर संबंधित कानून बनवाने का प्रयास भी नहीं हुआ। शोषण और अन्याय से पीड़ित समाज में सर्वोदय के कार्य केन्द्रीय भूमिका नहीं निभा सके। 1974 में जयप्रकाश नारायण विनोबा के आन्दोलन से पृथक हो गये। उन्होंने सम्पूर्ण क्रांति की अवधारणा और उसके लिए अहिंसक संघर्ष की पद्धति को अपनाया और उसके संदर्भ में वर्ग संघर्ष को भी स्वीकार कर लिया जो शांतिमय संघर्ष, असहयोग व सत्याग्रह के रूप में हो सकता है। उनका जोर था ‘‘भूमि स्वयं भी अपने अधिकार का दावा करें। लोक शिक्षण का का दबाब और वर्ग संगठन का दबाब, दोनों सामंती परम्पराओं और शोषण की व्यवस्था तौड़ सकते हैं।’’ यह अवधारणा भी जयप्रकाश के स्वर्गवास के साथ समाप्त हो गई। महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू द्वारा जागीरदारी, जमींदारी की समाप्ति एवं पंचायतराज संस्थाओं की स्थापना व सशक्तिकरण, सहकारिता आन्दोलन का सशक्तिकरण व इन्दिरा गांधी का आदिम जाति व अनुसूचित जाति सशक्तिकरण व बीस सूत्री कार्यक्रम, निर्जीव राष्ट्र में नवीन प्राणों का संचार करने में सफल रहे और इससे दोनों अहिंसक सत्याग्रही सर्वोदयी नेताओं के कार्यक्रम आगे बढ़ने से रूक गये। राजनीति के छल कपट और दांवपेच से भरी अशांत दुनिया व जीवन में सर्वोदयी उत्तराधिकारी, सेनानी ‘‘शांति, असहयोग, सत्याग्रह’’ से दूर हो गये, विखण्डित हो गये, नैतिक आधार कमजोर हो गया और वे संकीर्ण व्यक्तिगत या वर्गीय स्वार्थो से उपर नहीं उठ पाये।


मुझे विद्यार्थी जीवन में विनोबा जी, जयप्रकाश नारायण, ठक्कर बापा आदि प्रमुख सर्वोदयी महापुरूषों के साथ रहने, उनको नजदीक से देखने, सुनने, वार्तालाप करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। मैंने विनोबा भावे के साथ लम्बी पैदल यात्राएं भी की है, उनके साथ रहा हूं, उनको अनेक बार सुना है। बिनोबा भावे उच्च कोटि के विद्वान, विचारक एवं गांधी में विश्वास रखने
वाले, उनके समकक्ष संत थे। यात्रा के पश्चात प्रमुख ग्रन्थों व पुस्तकों का अध्ययन करते थे, बहुत प्रभावशाली व स्पष्ट वक्ता थे।
एक बार पठानकोट में पदयात्रा के पश्चात एक ब्रिटिश विचारक उनसे मिलने आये। उन्होंने आते ही देखा विनोबा के पास कुछ प्रमुख पुस्तकें रखी हैं, सबके उपर र्बाअबिल रखी है, उसके नीचे अन्य धार्मिक पवित्र ग्रंथ थे। उन्होंने कहा ‘‘मुझे खुशी है आप बाईबिल को सबसे अधिक सम्मान देते है।’’ बिनोबा जी ने कहा ‘‘मैं बाईबिल को अत्यन्त सम्मान देता हूं परन्तु आपने गौर नहीं किया सबसे नीचे कौनसा ग्रंथ है और उन्होंने निकालकर कहा भगवत गीता, हंसते हुए कहा नींव में तो गीता ही है।’’ आगन्तुक महानुभाव अत्यन्त शर्मिंदा हुए। विनोबा ने कहा ‘‘रात्री को अंतिम बार बाईबिल को पढ़ा था इसलिए सबसे उपर है।’’
पदयात्रा में सायंकालीन प्रार्थना सभा के पश्चात विभिन्न विषयों पर चर्चा होती थी। गांधी के अस्पृश्यता संबंधी विचार, जाति प्रथा व सामाजिक असमानता पर एक समाजशास्त्र के वरिष्ठ अध्यापक ने गांधी की कठोर आलोचना की। विनोबा ने शांतिपूर्ण तरीके से गांधी के विचार व कार्यक्रमों को स्पष्ट किया परन्तु वे महानुभाव अडे रहे और कहा मैं एमए सोसियोलोजी हूं, मैं अधिक सामाजिक ज्ञान जानता हूं, अधिक समझता हूं, अपनी विद्वता प्रकट करने लगे। विनोबा ने प्रसंनता प्रकट करते हुए और हंसते हुए पूछा ‘‘तुम्हारे एमए में कितने प्राप्तांक थे’’, उन्होंने 55 प्रतिशत बताये। उन्होंने पुनः पूछा ‘‘आपके प्रोफेसर साहब के भी इतने ही प्रतिशत ही होंगे।’’

उन्होंने कहा शायद 55 प्रतिषत ही। बिनोबा ने कहा आपके प्राध्यापक 45 प्रतिशत फेल थे और आप भी 45 प्रतिशत फेल, फिर भी आप मास्ट आफ सोसियोलोजी 45 प्रतिशत फेल टीचर से पढ़कर स्वयं 45 प्रतिशत फेल होकर आप शत प्रतिशत नाॅलेज क्लेम कर रहे है। महात्मा गांधी के विचार पढ़ो, मेरे आश्रम में आकर रहो, पदयात्रा में साथ रहकर वास्तविक स्थितियों को समझो। सामाजिक ज्ञान के प्राध्यापक महोदय लज्जित हो गये।

एक अन्य प्रार्थन सभा में उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण व परिवार नियोजन पर अपने विचार रखे। एक महानुभाव ने उसका विरोध किया, कार्यक्रम को धर्म विरूद्ध बताया, कुरान की आयतों के विरूद्ध बताया। बिनोवा जी ने अपनी तकरीर में बहुत सुन्दर तरीके से जनसंख्या नियंत्रण व सीमित परिवार के संबंध में अपने विचार रखे, परन्तु वे महानुभाव क्रोधित हो गये और व्याख्यान को धर्म विरूद्ध बताने लगे। बिनोबा जी ने उनसे पूछा ‘‘कुरान का पहला शब्द क्या है’’ उन्होंने कहा ‘‘ब’’। उन्होंने पुनः पूछा ‘‘अंतिम शब्द क्या है’’, उन महानुभाव ने कहा ‘‘स’’। बिनोबा जी ने कहा ‘‘बस’’ और उन्होंने स्पष्ट किया कुरान एक विशिष्ट स्थान पर, विशिष्ट स्थितियों में, विशिष्ट परिस्थितियों, सोच, विचारधारा व उद्देश्य के साथ लिखी गई है। अब समय, स्थान, परिस्थितियां व आवश्यकताएं बदल गई हैं, उन्हें उनके अनुसार धार्मिक ग्रंथों को समझना चाहिए।

गांधी, विनोबा की तरह जेपी व ठक्कर बापा भी विश्व की श्रेष्ठ पुस्तकों का अध्ययन करते थे, उनके विचार पूर्णतया स्पष्ट थे और खुलकर अपने विचार प्रकट करते थे। जो कुछ कहते थे उसे जीवन में उतारते थे। सर्वोदय विचारधारा के जनक, भारत की विभूतियां है। विश्वविद्यालय व कालेजों में उन्हें पढ़ाया जाना चाहिए व चर्चा कराई जानी चाहिए जिससे युवा पीढ़ी इन क्रांतिकारियों को जान सके, सीख सके।

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