अब श्रमिकों की बढ़ गई मुश्किल, अंधेरे में तीर चलाने की प्रवृत्ति से नुकसान

  • कॉर्पोरेट जगत श्रम सुधारों की आशा लंबे समय से कर रहा था, लेकिन दुखद है कि इसमें सरकार ने श्रमिकों की अनदेखी की है

 

By: shailendra tiwari

Published: 08 Oct 2020, 02:12 PM IST

  • डॉ. गौरव वल्लभ, प्रोफेसर और कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता

केंद्र सरकार पिछले 6 वर्षों से हर मोर्चे पर अंधेरे में तीर चला रही है। चाहे नए रोजगार सृजन की चुनौती हो, चाहे भारत को विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने की चुनौती हो या चाहे स्मार्ट शहरों के निर्माण और भारत को आदर्श निवेश गंतव्य के रूप में पेश करने की चुनौती हो, सरकार की अंधेरें में तीर चलाने की प्रवृत्ति के कारण बड़े-बड़े वादे जमीन पर सपाट हो गए हैं। पिछले कुछ समय में इस बात पर बहुत चर्चा हुई है कि भारत में कारोबार करने में आसानी (ईज ऑफ डूइंग बिजनेस) को बेहतर कैसे बनाया जाए। बातें तो बहुत हुईं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक मोर्चे पर धरातल पर कुछ भी बदलाव नहीं हुआ।

विश्व बैंक की ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग में भारत 2019 में 63 वें स्थान पर था, लेकिन अप्रेल 2018 और अगस्त 2019 के बीच चीन से बाहर गए 56 व्यवसायों में से केवल 3 भारत आए। शेष ने वियतनाम, ताइवान, थाईलैंड और इंडोनेशिया को चुना। वाल यह है कि इन सभी बिंदुओं पर सरकार की प्रतिक्रिया क्या रही है?ï व्यापार को और सरल बनाने के लिए कई मानकों पर काम करना होगा। उदार कर शासन, बुनियादी ढांचा, सुसंगत आर्थिक नीतियां, भूमि -श्रम व्यवस्था में सुधार और पर्याप्त वाणिज्यिक अदालतें। अभी जबकि अप्रेल और अगस्त 2020 के बीच लगभग 2.1 करोड़ नौकरियां गई हैं, मांग शायद दशकों के निचले स्तर पर है और कंपनियों ने फिक्स्ड कैपिटल में निवेश बंद कर दिया है। ऐसी स्थिति में सुधारों के सारे केंद्र बिंदुओं में सुधार होना चाहिए ।


अमरीका और चीन में व्यापार युद्ध भारत में कंपनियों को आकर्षित करने का अवसर था, परंतु हमने वह मौका गंवा दिया। सरकार की कर व्यवस्था में सुधार ना लाने की जिद कंपनीज को भारत छोडऩे पर मजबूर कर रही है। ऑटो कंपनियां सरकार से दो पहिया वाहनों पर जीएसटी 28 प्रतिशत से 18 प्रिितशत करने की मांग कर रही हैं। मांग को बढ़ावा देने के लिए इस तरह के करों में बदलाव आवश्यक है। ऐसा नहीं होने की स्थिति में, कई बड़ी ऑटो कंपनियों ने पिछले 2 वर्षों में भारत में निर्माण बंद कर दिया। सरकार ने बुनियादी ढांचे के खर्च में भी कोई बड़ी वृद्धि नहीं की है। इसी शृंखला में अब सरकार ने अपना ध्यान श्रम सुधारों पर केंद्रित किया है।
पिछले दिनों दोनों सदनों ने तीन नए श्रम सुधार बिल पारित कर दिए गए।

तथ्यों पर विश्लेषण करें तो इसका कुछ हिस्सा फायदेमंद लगता है, लेकिन अधिकांश भाग गिरती हुई दीवार पर बैंड एड लगाने जैसा है। कॉर्पोरेट जगत श्रम सुधारों की आशा लंबे समय से कर रहा था, लेकिन दुखद है कि सरकार ने प्रमुख हितधारक श्रमिकों की इसमें अनदेखी की है। औद्योगिक संबंध कोड के अनुसार, जिन कम्पनियों में 300 कर्मचारी तक कार्यरत हंै, उन्हें कर्मचारियों की छंटनी के लिए सरकार की अनुमति नहीं लेनी होगी। आज के समय में, जब बेरोजगारी की दर निरंतर बढ़ती जा रही है, क्या इस तरह की व्यवस्था कंपनियों को कभी भी कर्मचारियों को बर्खास्त करने की छूट नहीं देगी?

यदि सरकार इसके साथ आगे बढऩा चाहती ही थी, तो इसे अन्य देशों के समान एक सार्वभौमिक बेरोजगारी लाभ योजना के साथ किया जाना चाहिए। इस कोड ने एक काम और किया है, वह है बिना पूर्व सूचना के हड़ताल और समझौते के बीच में हड़ताल को गैरकानूनी करार देने का। इस व्यवस्था से मजदूरों की किसी वैध मांग को भी हड़ताल का उपयक्त मंच नहीं मिलेगा। यह सुधार लक्ष्यहीन है। यह न तो किसी भी हितधारक के साथ न्याय करेगा और न ही यह भारत को निवेश के लिए और आकर्षक बनाएगा।

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