कसौटी पर है तेल की कीमतों में वृद्धि

आज भी, चीन, कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन आदि देशों में पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों में रोज वृद्धि नहीं की जाती है। ऐसे में पेट्रोल और डीजल की कीमत को हर दिन बढ़ाना किसी भी दृष्टिकोण से समीचीन नहीं है.

By: shailendra tiwari

Updated: 28 Jun 2020, 04:33 PM IST

सतीश सिंह, 'आर्थिक दर्पण' पत्रिका के संपादक

देश में पेट्रोल और डीजल की कीमत लगातार उछाल पर है. देशभर में 24 जून, 2020 को डीजल की कीमत में लगातार 18वें दिन बढ़ोतरी हुई है और दिल्ली में पहली बार 24 जून को यह पेट्रोल से ज्यादा महंगी हो गई. भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है. विगत 18 दिनों में डीजल की कीमत कुल 10.48 रुपये प्रति लीटर बढ़ी है, जबकि पेट्रोल 8.50 रुपये प्रति लीटर महँगा हुआ है।
पेट्रोल और डीजल की कीमत में लगातार वृद्धि होने का कारण इनपर ज्यादा कर आरोपित करना है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में मामूली वृद्धि हुई है. कोरोना महामारी के दौरान वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत में मार्च और अप्रैल में भारी गिरावट आई थी. उस दौरान भारत में कच्चे तेल का बास्केट वर्ष 2019-20 के औसत 60.6 डॉलर प्रति बैरल स्तर का एक तिहाई यानी 20 डॉलर प्रति बैरल रह गया था.कोरोना महामारी की वजह से पूरी दुनिया में सुस्ती छाई हुई है। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के अनुसार वर्ष 2020 में तेल की वैश्विक मांग कम होकर 90 लाख बैरल प्रति दिन रहने का अनुमान है. तेल की कीमत को नियंत्रित करने के लिये तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक और रूस की योजना जुलाई से दिसंबर तक कच्चे तेल के उत्पादन को कम कर 77 लाख बैरल प्रति दिन और अप्रैल 2022 तक 58 लाख बैरल प्रति दिन करने की है.


इस वजह से 2020 में तेल बाजार में तेल का भंडार कुछ कम रहने की संभावना है। इसके कारण, अभी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में मामूली वृद्धि हुई है. गौरतलब है कि वैश्विक स्तर पर तेल बाजार की दिशा तय करने में अमेरिका,ओपेक,रूस आदि की अहम भूमिका है.


भारत तीसरा बड़ा आयातक:-
भारत दुनिया में कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक देश है। यहाँ 75 से 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात किया जाता है, जबकि 20 से 25 प्रतिशत कच्चे तेल का उत्पादन भारत खुद करता है।भारत में कच्चे तेल का उत्पादन करने वाली ऑयल इंडिया, ओएनजीसी, रिलांयस इंडस्ट्री,केयर्न इंडिया आदि कंपनियां हैं।कच्चे तेल आयात करने वाली कंपनियों को ओएमसी यानि ऑयल मार्केटिंग कंपनी कहते हैं। इसमें इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (आईओसीएल), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) प्रमुख हैं। 95 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात इन्हीं तीन कंपनियों के द्वारा किया जाता है। शेष 5 प्रतिशत का आयात रिलायंस, एस्सार आदि कंपनियां करती हैं।


भारत में तेल है नियंत्रण मुक्त:-
सरकार ने 2010 में पेट्रोल की कीमत को नियंत्रणमुक्त कर दिया था। वर्ष 2014 में डीजल की कीमत को भी नियंत्रणमुक्त कर दिया गया। पुनश्चः पेट्रोल एवं डीजल के कीमतों को निर्धारित करने वाली15 सालों की पुरानी व्यवस्था की जगह पेट्रोल एवं डीजल के खुदरा बिक्री मूल्य (आरएसपी) के रोज मूल्य निर्धारण की व्यवस्था को 16 जून, 2017 से देशभर में लागू किया गया। इसका यह अर्थ हुआ कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत में उतार-चढ़ाव के अनुरूप तेल की कीमत का निर्धारण भारत में होगा। जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत ज्यादा होगी तो भारत में भी तेल की कीमत में बढ़ोतरी होगी। इसी तरह जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत कम होगी तो भारत में भी तेल की कीमत में कटौती की जायेगी।


तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से बढ़ेगी महंगाई:-
रोज मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया विकसित देशों यथा अमेरिका, जापान आदि देशों में लागू है, लेकिन भारत की तुलना विकसित देशों से नहीं की जा सकती है, क्योंकि भारत की एक बड़ी आबादी आज भी गरीबी रेखा के नीचे है। रोज पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर आवश्यक वस्तुओं जैसे, खाद्य पदार्थों, अनाज, फल और सब्जियों की कीमतों पर पड़ता है। अगर कारोबारी भी इसी तर्ज पर सोचेंगे तो इन वस्तुओं की कीमतों में भी रोज बढोतरी होगी और महँगाई के बेलगाम होने में वक्त नहीं लगेगा.

तेल की कीमत में वृद्धि से सरकार को फ़ायदा:-
सरकार को पेट्रोल एवं डीजल से मुख्य तौर पर दो तरह के फायदे हो रहे हैं। पहला, वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कम कीमत होने के कारण इसके आयात पर विदेशी मुद्रा कम खर्च करना पड़ रहा है, क्योंकि भारत कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक देश है। दूसरा, पेट्रोल एवं डीजल पर अधिक कर आरोपित करके सरकार ज्यादा राजस्व कमा रही है। पेट्रोल और डीजल के कीमतों में लगभग आधा हिस्सा केंद्र और राज्य के करों का होता है। पेट्रोल के दामों में केंद्र और राज्यों का करों में 50 प्रतिशत हिस्सा होता है, जबकि डीजल की कीमत में केंद्र और राज्यों का करों में 46प्रतिशत हिस्सा होता है। मौजूदा समय में तेल के बाजार पर 95 प्रतिशत हिस्सा तीन सरकारी कंपनियों यथा,इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन और भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन का है, जिसके कारण तेल कंपनियों को मिलने वाला फायदा भी अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के खाते में जा रहा है।


कच्चे तेल का गणित:-
कच्चे तेल के गणित को समझने के लिये अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में कैसे उतार-चढ़ाव होता है को समझना जरूरी है। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के लेन-देन में खरीदार, बेचने वाले से निश्चित तेल की मात्रा पूर्व निर्धारित कीमतों पर किसी विशेष स्थान पर लेने के लिये सहमत होता है। ऐसे सौदे नियंत्रित एक्सचेंजों की मदद से संपन्न किये जाते हैं। कच्चे तेल की न्यूनतम खरीदारी 1,000 बैरल की होती है। एक बैरल में करीब 162 लीटर कच्चा तेल होता है। चूँकि,कच्चे तेल की कई किस्में व श्रेणियां होती हैं। इसलिए, ख़रीदार एवं विक्रेताओं को कच्चे तेल का एक बेंच मार्क बनाना होता है। इसके बरक्स “ब्रेंट ब्लेंड”कच्चे तेल का सबसे प्रचलित वैश्विक मानदंड है। इंटरनेशनल पेट्रोलियम एक्सचेंज (आइपीई) के अनुसार दुनिया में दो तिहाई कच्चे तेल की कीमतें “ब्रेंट ब्लेंड” के आधार पर तय की जाती है। इसी तरह अमेरिका का मानदंड वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआइ) है। 15 विभिन्न कच्चे तेल की कीमत से ओपेक बॉस्केट ङ्क्त की कीमत का निर्धारण होता है।ङ्क्तओपेक बाजार में तेल पर नियंत्रण रखता है। इसका उद्देश्य बास्केट की कीमत को पूर्व निर्धारित दरों पर रखना है। ङ्क्तके जिस कीमत पर भारत पेट्रोल खरीदता है का लगभग 48 प्रतिशत उसका आधार मूल्य होता है, जो काफी कम होता है। हमारे देश में पेट्रोल एवं डीजल की अधिक कीमत का कारण राज्य एवं केंद्र सरकार द्वारा विविध कर आरोपित करना है। राज्यों द्वारा पेट्रोल एवं डीजल पर कर लगाने के कारण देश में पेट्रोल एवं डीजल की अलग-अलग कीमत होती है।


कैसे होता है तेल की कीमतों में इजाफा:-
पेट्रोल और डीजल की कीमत का रोज निर्धारण हर दिन सुबह 6 बजे होता है। सुबह 6 बजे से ही नई दरें लागू हो जाती हैं। पेट्रोल एवं डीजल के आधार कीमत में कच्चे तेल की कीमत, प्रोसेसिंग चार्ज और कच्चे तेल को शोधित करने वाली रिफाइनरी चार्ज शामिल होता है। अमूमन,रिफाइनिंग चार्ज प्रति लीटर चार रुपये आरोपित किया जाता है। आधार कीमत पर केन्द्र सरकार उत्पाद शुल्क आरोपित करती है। इसके बाद, ओएमसी कंपनी डीलर को तेल बेच देती है और डीलर तेल की कीमत पर अपना कमीशन और राज्य सरकार द्वारा लगाया जाने वाला कर वैट जोड़ता है। फिर, इसपर सेस (पर्यावरण उपकर) जोड़कर पेट्रोल एवं डीजल की अंतिम कीमत का निर्धारण कियाकिया जाता है।फिर, तेल की कीमत के निर्धारण में परिवहन भाड़ा, कमीशन, दूसरे प्रभार आदि आधार कीमत में जोड़े जाते हैं। इसतरह, पेट्रोल एवं डीजल की कीमत मूल कीमत से बढ़कर दोगुनी से अधिक हो जाती है.


रोज मूल्य निर्धारण की सार्थकता:-
पेट्रोल एवं डीजल की कीमत में रोज वृद्धि होने से रोज मूल्य निर्धारण की सार्थकता आज सवालों के घेरे में आ गई है. कोरोना महामारी के कारण करोड़ों लोग अपने रोजगार से हाथ धो बैठे हैं. लॉकडाउन को अनलॉक करने से लोग पुनः रोजगार की तलाश में या नौकरी पर जाने के लिये यात्रायें कर रहे हैं, लेकिन पेट्रोल और डीजल की कीमत रोज बढ़ने से उनकी परेशानियाँ बढ़ रही हैं.


निष्कर्ष:-
कहा जा सकता है कि पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों में वृद्धि का सीधा फायदा सरकार को मिल रहा है। आज भी, चीन, कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन आदि देशों में पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों में रोज वृद्धि नहीं की जाती है। ऐसे में पेट्रोल और डीजल की कीमत को हर दिन बढ़ाना किसी भी दृष्टिकोण से समीचीन नहीं है. भारत का संवैधानिक स्वरूप एक लोक कल्याणकारी देश का है, लेकिन यहाँ लोक कल्याणकारी गतिविधियों को शुरू से ही कम तरजीह दी जा रही है.

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