फिर खतरे में सूचना का अधिकार

फिर खतरे में सूचना का अधिकार

Jameel Khan | Publish: Sep, 08 2018 04:43:14 PM (IST) विचार

जब से सूचना का अधिकार कानून (RTI 2005) लागू हुआ है, तभी से संशोधन कर इसे दंतहीन बनाने का प्रयास चल रहा है।

जब से सूचना का अधिकार कानून (RTI 2005) लागू हुआ है, तभी से संशोधन कर इसे दंतहीन बनाने का प्रयास चल रहा है। देश के लोगों ने अभी तक कानून को बचा कर रखा है, लेकिन हाल में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित संशोधन की वजह से RTI कानून पर फिर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। लोकसभा के मानसून सत्र में जनता से सलाह-मशविरा किए बिना, केंद्र और राज्य के सूचना आयुक्तों की तनख्वाह, कार्यकाल आदि केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किए जाने का प्रस्ताव संशोधन के तहत रखा गया है। जाहिर है जो तनख्वाह तय करता है, वह कर्मचारी पर अंकुश भी रखेगा। बांस को अपना बनाओ, तो बांसुरी के सुर भी अपने ही होंगे। एक स्वतंत्र आयोग सरकारी दफ्तर बन कर रह जाएगा।

इस एकदम अनुचित संशोधन का भरपूर विरोध हुआ। सरकार ने संशोधन के पक्ष में अजीब दलील रखी कि मुख्य सूचना आयुक्त संवैधानिक पद नहीं है तो उसे संवैधानिक अधिकारी के बराबर तनख्वाह नहीं देनी चाहिए। तर्क है कि जज के बराबर तनख्वाह देने का यह अर्थ नहीं कि कोई जज बन जाता है। संसद में इस कानून को पारित करते समय संसदीय समिति के अध्यक्ष ईएमएस नचियप्पन ने समझाया था कि सूचना आयुक्तों को ऐसा दर्जा दिया जा रहा है जिससे उनकी स्वतंत्रता और अधिकार पर सरकार कभी दखल नहीं दे सके। उनका कहना था कि ऐसा हुआ तो सूचना के अधिकार जैसे कानून का कोई औचित्य नहीं रहेगा।

सार्वजनिक विरोध को देखते हुए सरकार ने संशोधन को अभी के लिए 'स्थगित' कर रखा है। नए सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए जारी विज्ञापन में तनख्वाह और कार्यकाल बाद में बताने का प्रावधान रखा गया है। मानो संशोधन पारित होने से पहले ही सरकार ने संशोधित शक्तियों का इस्तेमाल शुरू कर दिया हो। जाने-माने बुद्धिजीवी और बंगाल के पूर्व राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी ने आधार कानून पर बहस के समय एक बहुत सटीक विश्लेषण रखा था। उनका कहना था कि सूचना का अधिकार कानून ने जनता को सरकार के हर कदम पर निगरानी रखने का अधिकार और जरिया दिया है। साथ ही उन्होंने चेतावनी भी दी कि कहीं ऐसा न हो 'आधार कानून' के जरिए सरकार हर नागरिक के हर कदम पर निगरानी की व्यवस्था बना दे।

उनकी चेतावनी बिल्कुल सही निकली। आज की तारीख में आधार नंबर न केवल भारत के 99 प्रतिशत नागरिकों को लेना पड़ा, बल्कि उस नंबर के जरिए सरकार ने इतनी सूचनाएं इकट्ठी कर ली हैं कि उन सूचनाओं को सुरक्षित रखने के लिए उसे एक और कानून बनाना पड़ रहा है। सरकार ने न्यायाधीश बीएन श्रीकृष्णा (रिटायर्ड) की अध्यक्षता में एक समिति बनाई, जिसने सूचना के अधिकार के निजता वाले प्रावधान में संशोधन प्रस्तावित किया है। सूचना का अधिकार कानून के तहत जो निजता के सीमित प्रावधान हैं, उनका भी दुरुपयोग करते हुए कई सरकारी कर्मचारी और नेता अपनी सूचना छिपाने में लगे हुए हैं।

विडम्बना देखिए संविधान के अनुसार जो काम करते हैं जनता के लिए, जिन्हें तनख्वाह मिलती है जनता के पैसों से, वह कहते हैं कि उनकी और उनके परिवार की संपत्ति निजी सूचना है। उनका सर्विस रिकॉर्ड, उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) निजी सूचना है। उनके ऊपर कोई जांच चल रही है तो वह भी उनकी निजी सूचना है। अत: उनके कहे अनुसार चले, तो उनके कामकाज के बारे में लगभग सारी सूचनाएं निजी हो जाएंगी और आरटीआइ कानून बेकार हो जाएगा। प्रस्तावित निजता आधारित संशोधन कई सार्वजनिक सूचनाएं हासिल करने में बड़ी बाधा साबित होंगे।

निजता के लिए संघर्षरत नागरिक समूहों ने भी आरटीआइ कानून में संशोधन का विरोध किया है। न्यायाधीश एपी शाह की अध्यक्षता में छह साल पहले निजता पर एक समिति बनी थी। उस समिति ने भी निजता के कानून को आरटीआइ कानून के तहत रखने का प्रस्ताव रखा ताकि लोगों के सार्वजनिक हित की सूचनाएं निजता के नाम पर रोकी नहीं जाएं। भाजपा के सत्ता में आने से पहले और सत्ता में आने के बाद के स्वरों में बहुत अंतर है। पारदर्शिता और जवाबदेही पर सरकार का रवैया नकारात्मक रहा है। लोकपाल और 'विसलब्लोअर' कानून लागू नहीं किए गए, बल्कि उनमें या तो नकारात्मक संशोधन किए गए या प्रस्तावित हैं। शर्मनाक स्थिति यह है कि आए दिन आरटीआइ कार्यकर्ताओं की हत्या की खबरें आती हैं और सरकार बेअसर है। हाल ही भ्रष्टाचार निरोधक कानून में संशोधन किए गए, जिससे अधिकारियों के खिलाफ जांच से पहले सरकार से अनुमति लेना जरूरी किया गया। अत: न पारदर्शिता, न जवाबदेही, न भ्रष्टाचार की खिलाफत और न ही सक्रिय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर सरकार का कोई सकारात्मक कदम।

लोकसभा चुनाव आसन्न हैं, पारदर्शिता, जवाबदेही, और जनभागीदारी लोकतंत्र के मूल आधार हैं। जनता को इन मूल्यों के आधार पर संगठित हो सभी राजनीतिक दलों और सरकार पर दबाव डालना चाहिए जिससे कि आरटीआइ सहित इन सभी कानूनों को ताकतवर बनाकर नागरिकों और लोकतंत्र को सशक्त किया जा सके।

निखिल डे
सामाजिक कार्यकर्ता

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