एक दिन, दो बड़े फैसले!

By: मुकेश शर्मा

Published: 09 Nov 2016, 11:39 PM IST

बीते चौबीस घंटों के दौरान दुनिया के दो बड़े देशों में दो बड़े फैसले हुए। एक फैसला अमरीका की जनता ने सुनाया और डोनाल्ड ट्रंप को 45वां राष्ट्रपति चुन लिया। दूसरा फैसला, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लिया। कालेधन, जाली नोटों और आतंक के विरुद्ध 'ट्रंप कार्डÓ चलते हुए उन्होंने 500 व 1000 के नोटों को चलन से बाहर करने का साहसिक कदम उठाया।


 इन दोनों ही निर्णयों का असर आम भारतीय पर दिखाई देगा। क्या होगा तात्कालिक और क्या होगा दीर्घकालीन असर? क्या भारत के लिए अमरीका की 'मुद्राÓ में बदलाव आएंगे? और, भारतीय 'मुद्राÓ में आ रहे बदलाव हमें कैसे करेंगे प्रभावित? जानिए दो आलेखों में...

पलटी बाजी और सबको चौंका दिया इस वोट ने

चुनाव की     शुरुआत में जरूर लगता था कि     अमरीका के     राष्ट्रपति पद     के चुनाव में     रिपब्लिकन     उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप डेमोक्रेट उम्मीदवार हिलेरी क्लिटन से पिछड़ जाएंगे। लेकिन, पिछले तीन दिनों में स्थितियां बदल रहीं थीं और बाजी पलटने के संकेत मिलने लगे थे। खासतौर पर हिलेरी के ई-मेल प्रकरण के बाद तो अमरीकी मतदाताओं में उनके प्रति नाराजगी काफी बढ़ती जा रही थी। वास्तव में इस बार का राष्ट्रपति पद का चुनाव नाराज मतदाताओं का चुनाव कहा जा सकता है। ऐसे हालात के बावजूद लोकतंत्र में एक उम्मीद बंधी रहती है क्योंकि राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता। ट्रंप की जीत की घोषणा से इस उम्मीद को झटका लगा।


कुल मिलाकर जिस तरह से हालात बदलते चले गए, उनकी जीत को पूर्ण रूप से अनपेक्षित नहीं कहा जा सकता।दो देशों के संबंधों में चुनाव परिणामों का बहुत अधिक असर नहीं पड़ता। भारत और अमरीका के बीच संबंधों में जो प्रगाढ़ता आई है, उस पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। अमरीका के साथ जो समझौते हुए हैं, अब तो उन्हें लागू करने की बात है। फिर, ट्रंप के सामने चुनौती घरेलू राजनीति को संभालने की अधिक है। जहां तक अमरीकी कांग्रेस और हाउस ऑफ रिप्रिजेंटेटिव्स के रवैये का सवाल है तो पिछले दो वर्षों से वहांं माहौल भारत के पक्ष में ही बना हुआ है। एक बात और स्पष्ट कर दूं कि अमरीका में विदेश नीति को तय करने में कांग्रेस की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण होती है।


 वहां पाकिस्तान के विरुद्ध माहौल है। भारत आतंक का शिकार देश है। इस नजरिये में फिलहाल कोई परिवर्तन होने की आशंका दिखाई नहीं देती। इसके विपरीत पाकिस्तान को अमरीका से मिलने वाली सहायता बंद किए जाने को माहौल ही अधिक है। नए राष्ट्रपति के लिए इस धारणा एकाएक बदलना संभव नहीं होगा। इस लिहाज से हमारे लिए चिंतित होने की कोई बात नहीं है। जहां तक अप्रवासियों     खासतौर पर भारतीयों के वीजा को लेकर ट्रंप क्या नीति अपनाते हैं, इसे लेकर इंतजार करना होगा।


सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमरीका  ने बड़ी मात्रा में चीन से धन उधार ले रखा है। ऐसे में अमरीकी अर्थव्यवस्था को ट्रंप कैसे संभालेंगे? और, दक्षिण चीन सागर पर इन परिस्थितियों के मद्देनजर वे क्या रुख रखते हैं, इस पर विश्व राजनीति की नजर जरूर रहने वाली है। चीन के साथ अमरीका के संबंध  कैसे आगे बढ़ेंगे, इस पर भारत को जरूर नजर रखनी होगी। इसके     अलावा ईरान के साथ भी     डोनाल्ड     ट्रंप     कुछ सख्ती करने के इच्छुक दिखाई देते हैं

जबकि ओबामा की ओर से ईरान पर लगी पाबंदियों में ढील दी गई थी। उधर, भारत और ईरान के संबंध में काफी बेहतर हैं। प्रश्न यह उठता है कि अमरीका की ईरान के साथ सख्ती का भारत-ईरान रिश्ते पर क्या असर होगा? मुझे लगता है कि भारतीय विदेश नीति इतनी परिपक्व और सुधरी है कि उसने दुनिया के अन्य देशों के साथ अलग-अलग रिश्ते बनाए हैं। उन रिश्तों पर अमरीका के साथ मतभेदों का विशेष असर नहीं पडऩे वाला।


उधर, रूस के साथ भी यही स्थिति रहेगी। चूंकि ट्रंप रूस के राष्ट्रपति पुतिन को निजी तौर पर पसंद करते हैं और ऐसे में यदि रूस और अमरीका मिलकर  अन्य समस्याओं का हल निकालना शुरू कर देते हैं, तो भारत के लिए और भी अच्छा है। लेकिन, मेरा मानना है कि यदि रूस-अमरीका के संबंध पहले की तरह ही खिंचाव वाले बने रहते हैं, तो भी भारत को कोई परेशानी नहीं है। द्विपक्षीय संबंधों पर अन्य देश के साथ संबंधों का विशेष असर नहीं पड़ता। किसी मुद्दे पर मतभेद भले ही हों लेकिन संबंधों पर इसका असर नहीं पड़ता।



दो देशों के संबंधों में चुनाव परिणामों की भूमिका नहीं होती। भारत-अमरीका संबंधों में आई प्रगाढ़ता पर कोई नकारात्मक असर नहीं होगा। अब तो दोनों देशों के बीच हुए समझौते लागू ही करना है।


काली कमाई को झटका     चकाचौंध कर दिया नोट ने


    भारत में  कालाधन से चलने वाली एक समानांतर अर्थव्यवस्था को रोकने के प्रयास दशकों से चलते आ रहे हैं। मौजूदा एनडीए सरकार ने भी ढाई साल से कोशिशें कर रही है। पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार रात 500 और 1000 रुपए के नोट बंद करने के फैसले की जो घोषणा की, वह वाकई चकाचौंध करने वाला था।


 बड़े नोट वाली करंसी हमेशा से देश के लिए सिरदर्द साबित होती रही है। कालाधन धारकों को बड़े मूल्य के नोटों के संग्रहण में आसानी रहती है और सीमापार से आने वाली जाली करंसी से हमें नुकसान होता रहा है। सरकारों ने समय-समय पर कालधन धारकों को स्वेच्छा से घोषणा करने के प्रावधान किए हैं लेकिन उसके बावजूद बड़ी मात्रा में कालाधन उजागर नहीं हो पाया।


 अभी 500-1000 के नोट अचानक बंद करने से ऐसी राशि धारकों पर बड़ा असर पड़ेगा। इस दृष्टि से यह सकारात्मक कदम कहा जा सकता है। हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि मौजूदा फैसला जल्दबाजी में लिया गया लगता है। लेकिन हमें इस फैसले के मायने और दूरगमी असर समझने होंगे।  विमुद्रीकरण से  लाभ जरूर होगा पर यह माना जाए कि इससे काला धन बाहर आ जाएगा, यह पूरी तरह संभव नहीं है और न ही बहुत व्यावहारिक भी।


 कालाधन के संग्रहण और मौजूदा फैसले को सफल बनाने के लिए अन्य सहायक उपाय भी करने होंगे। जिस तरह अभी पुराने नोट बैंक में जमाकर नए लेने के लिए एक सीमा तय की गई है। एटीएम निकासी पर सीमा लगाई गई है।


 डेबिड-क्रेडिट कार्ड, चैक से लेनदेन पर जोर दिया गया है, इन उपायों को आगे बढ़ाकर सरकार चले तो विमुद्रीकरण सफल हो सकता है। इससे लोगों की बैंकों में जाना मजबूरी हो जाएगी। अधिक लेनदेन करने वाले लोगों को टे्रक करना करना आसान होगा। रियल एस्टेट, ठेकेदारी आदि में जो काला धन जाता है, उसे इस फैसले से बड़ा धक्का लगा है। हालांकि इसके भविष्य में परिणाम क्या होंगे, इसे लेकर अभी अनिश्चितता है।


 फिलहाल सामाजिक कठिनाई भी आएगी।  शादी-ब्याह, उत्सवों में नकदी के लेनदेन में दिक्कतें आएंगी। इसलिए अभी इस योजना को लेकर सवाल भी अनेक हैं। वहीं विरोधाभास भी है। सरकार ने 500-1000 रुपए के नोट तो बंद करने का अच्छा कदम उठाया है पर 2000 का नोट जल्द जारी करने वाली है। यानी बड़े नोट बंद करके उससे भी बड़ा नोट लाना कितना तार्किक है? अभी जो बड़े कालाधन धारक हैं, उनके पास रखे नोट रद्दी हो जाएंगे।


बेहतर होता, इसके उत्पादक इस्तेमाल का उपाय किया जाता। इसलिए मेरा मानना है कि नोट बंद करना कालाधन रोकने की सुनिश्चितता नहीं है। यह वैसा ही है, जैसा सोने के साथ सरकारें करती रही हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने सोने का आयात पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया था। उससे तस्करी बहुत  बढ़ गई।


वहीं नरसिंहा राव की जब सरकार थी तो उन्होंने आयात खोल दिया तो तस्करी रुक गई। अभी हाल ही में सोने पर आयात शुल्क बढ़ा दिया तो फिर तस्करी बढ़ गई। इसी तरह नोट पर प्रतिबंध ही काफी नहीं है। सरकार कर प्रणाली का सरलीकरण करे। इसमें प्रशासन की दखल कम हो। लेनदेन के तौर-तरीके स्थायी और टिकाऊ  हों तो व्यापक हल निकलेगा।


जितने भी सरकारी कार्यक्रम हैं - भले ही पॉवर प्रोजेक्ट हों, सड़क-भवन निर्माण हो,  रक्षा खरीद आदि में ही बड़े पैमाने पर काला धन इस्तेमाल होता है। इस पर तो पहले सरकारी तंत्र सख्ती करे। चुनावों में राजनीतिक दलों पर करोड़ों रुपए में टिकट बांटने के आरोप लगते हैं। चुनावों में उम्मीदवार जमकर कालाधन खर्च करते हैं।


 अब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। वहां सभी राजनीतिक दल धन बहाएंगे, वह कालाधन कहां से आएगा? बड़े मूल्य के नोट पर प्रतिबंध लगाना फौरी तौर पर तो सही उपाय हो सकता है। पर इससे बैंकिंग के बाहर चलने वाली काली अर्थव्यवस्था नहीं रुकेगी। इसलिए देश में मौजूद और बनने वाली काली रकम पर वृहद रणनीति बनाकर तोड़ निकालना होगा।

विमुद्रीकरण से देश को लाभ तो होगा पर यह मानना कि काला धन बाहर आ जाएगा, यह पूरी तरह संभव नहीं है। मौजूदा फैसले को सफल बनाने के लिए अन्य सहायक उपाय भी करने होंगे।

मुकेश शर्मा Reporting
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