लक्ष्य तय होने से ही मिलेंगे बेहतर परिणाम

'लक्ष्य भी तय हों' पर प्रतिक्रियाएं

 

By: shailendra tiwari

Updated: 31 Jul 2020, 04:40 PM IST

देश की शिक्षा नीति में बदलाव व इसमें लॉर्ड मैकाले की क्लर्क बनाने वाली शिक्षा से मुक्ति की दिशा में पहल का स्वागत करने के साथ ही इसमें कुछ बड़ी अपेक्षाओं को दर्शाते पत्रिका के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी के अग्रलेख 'लक्ष्य भी तय होंÓ को प्रबुद्ध पाठकों ने नई शिक्षा नीति पर सटीक चिंतन व विश्लेषण माना है। पाठकों ने बदलाव का स्वागत करते हुए इसके अनुरूप क्रियान्वयन की जरूरत का उल्लेख किया है। पाठकों ने उम्मीद जताई है कि सरकार इन सब बातों का ध्यान रखते हुए शिक्षा पद्धति के लिए लक्ष्य भी जल्दी निर्धारित कर देगी। पाठकों की प्रतिक्रिया विस्तार से-

बदलाव और भी जरूरी
पत्रिका के 31 जुलाई को "लक्ष्य भी तय हो" शीर्षक से गुलाब कोठारी का अग्रलेख पढ़ा। मानव संसाधन विकास विभाग अब शिक्षा विभाग हो जाएगा। इतना ही काफी नहीं। और भी बदलाव जरूरी है। आने वाली संतति हमारी संस्कृति को संजोए रखे इसके लिए नए पाठ्यक्रम में पुरातन ज्ञान वेद, उपनिषद व गीता का समावेश जरूरी है। — गोपाल अरोड़ा, जोधपुर

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स्वागत योग्य कदम
लंबे अरसे से देश को नई शिक्षा नीति की आवश्यकता थी जो भारतीय संस्कृति के अनुकूल हो। अभी प्रचलित शिक्षा पद्धति से तो पढ़ेे-लिखे अंग्रेज ही तैयार हो रहे थे। नई शिक्षा नीति की सबसे बड़ी विशेषता पढ़ाई के मातृभाषा में कराने की है। यह स्वागत योग्य कदम है। क्योंकि प्राथमिक स्तर का बालक अपनी मातृभाषा में तेजी से सीखता व समझता है।
—कौशल त्रिपाठी, भीम,राजसमंद
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खामियों को दूर करना होगा
अभी जो शिक्षा प्रणाली चल रही थी उसमें सिर्फ शिक्षा ही है संस्कार नहीं। ऐसी शिक्षा किस काम की जिसमें न देशभक्ति हो और न ही रोजगार। उम्मीद की जानी चाहिए कि नई शिक्षा नीति इन खामियों को दूर करने में सफल होगी। —राजेंद्र शर्मा, कोटा ।
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लक्ष्य तय होने से ही मिलेंगे परिणाम
गुलाब कोठारी के लक्ष्य भी तय हों शीर्षक से अग्रलेख मे नई शिक्षा नीति को लेकर जो सुझाव दिए गए हैं उन्हें मान लिया जाए तो सोने में सुहागा हो सकता है। लक्ष्य निर्धारित करने व सही क्रियान्वयन से ही सुखद परिणाम आएंगे। क्रियान्वयन के लिए इच्छा शक्ति के अभाव अखरता है। शिक्षा को रोजगारपरक भी बनाना होगा।
—हरिचरण सिंघल, जयपुर
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आमजन के लिए परेशानी न बने
वर्तमान शिक्षा काफी महंगी है, बावजूद उसके बेरोजगारी का बोलबाला है। हमारे स्कूलों में और रोजगार के लिए अंग्रेजी जरूरी भाषा बन चुकी है। शिक्षा का ऑनलाइन होना भी कहीं न कहीं जटिलता पैदा कर रहा है, क्योंकि लोगों के पास रोजगार पहले से नहीं है। ऐसे में ये शिक्षा पद्धति आमजन के लिए परेशानी बन सकती है। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए ही शिक्षा पद्धति के लिए लक्ष्य तय किए जाने चाहिए।
कपिल गुप्ता, शिक्षक, ग्वालियर

खाई को पाटना होगा
शिक्षा नीति में बदलाव एक अच्छी पहल है, लेकिन अब जिम्मेदारी है इसके सही क्रियान्वयन की। नीति में केंद्र शासन ने बदलाव तो कर दिया। अब यहां जो सवाल है कि आखिर कैसे इसे सही ढंग से लागू किया जाए, जिससे शिक्षा में कोई खाई नहीं रहे। जब तक यह खाई नहीं पटेगी, शिक्षा समाज और उसके उत्थान के लिए कार्य नहीं कर सकेगी।
दिनेश परमार, शिक्षक, ग्वालियर


स्थानीय भाषा में पढ़ाई स्वागत योग्य
शिक्षा में स्थानीय भाषा का उपयोग अच्छा कदम है। ऑॅनलाइन शिक्षा हमारे यहां धरातल से परे है, क्योंकि हमारे यहां पर आधे से अधिक लोग गरीब व बेरोजगार हैं। शिक्षा के साथ व्यावसायिक ज्ञान जरूरी है। इससे बेरोजगारी को दूर करने में कुछ हद तक सफलता मिलेगी।
यशवंत अग्निहोत्री, वरिष्ठ अभिभाषक, उज्जैन

बेरोजगारी के मुद्दे को दबाने का प्रयास
सरकार ने बड़ी चालाकी से स्कूली शिक्षा को एक साल बढ़ा दिया। जाहिर है युवा एक साल बाद नौकरी मांगेंगे। बेहतर होता सरकार शिक्षा नीति की बजाय रोजगार नीति पर ध्यान देती। बेरोजगारी के मुद्दे को सरकार नई-नई नीतियों के आभामंडल में दबा देना चाहती है।
दिलीप राजपूत, अभिभाषक, गुना

बुनियादी बदलाव आएंगे
नई शिक्षा नीति निकट भविष्य में बुनियादी बदलाव लाएगी। लार्ड मैकाले की बाबू बनाने वाली शिक्षा से निजात मिलेगी। बच्चे नई शिक्षा से अपना सुनहरा और स्वर्णिम भविष्य बना सकेंगे। आजादी के बाद पहली बार इस दिशा में सोच विचार मंथन करके आवश्यकता के अनुसार विषय वस्तु को शामिल किया गया है, जो नि:संदेह काबिले तारीफ है।
राघवेंद्र पारे, राज्यपाल पुरस्कार प्राप्त शिक्षक, हरदा

नई शिक्षा नीति के समक्ष कई चुनौतियां
अंग्रेजी और हिंदी के बीच विभाजित रही भारतीय शिक्षा प्रणाली लार्ड मैकाले के दृष्टिकोण की ही सुरक्षा कर रही थी जिसने बड़ी संख्या में गुलाम और बेरोजगार तथा अंग्रेजी और हिंदी के बीच के करोड़ों त्रिशंकु पैदा किए। इस हिसाब से नीति में बदलाव स्वागतयोग्य है, लेकिन नई शिक्षा नीति को अमलीजामा पहनाने में अभी व्यापक चुनौतियां हैं, जिन पर काम करने के लिए एक मजबूत इच्छा शक्ति से कर्तव्यबोध के साथ काम करने वाली व्यवस्था खड़ी करनी होगी।
त्रिभुवनेश भारद्वाज, शिक्षाविद्, रतलाम

वेदशा ों को समाहित करने की पैरवी सही
कोठारी ने अपने अग्रलेख में आधुनिक शिक्षा व उसके परिणामों का जिक्र करते हुए नई शिक्षा नीति में पुरातन ज्ञान व वेद शास्त्रों को समाहित करने की पैरवी की है। इस पर गौर किया जाए तो शैक्षणिक गतिविधियां और भी मजबूत हो सकती हैंं।
प्रो. आदर्श तिवारी, पं. एसएन शुक्ल विश्वविद्यालय, शहडोल

चीन, जापान की तरह अपनी भाषा में ही शिक्षा मिले
कोठारी ने सही लिखा है कि अंग्रेजी माध्यम का विकल्प विश्वविद्यालय स्तर पर ही उपलब्ध रहे तो स्वत: ही शिक्षा में भारतीय संस्कृति प्रवेश कर जाएगी। आज शिक्षा पर अंग्रेजी हावी है। हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी उपेक्षित हो रही है, जबकि अन्य विकसित देश रूस, चीन, जापान आदि को देखें तो वहां की शिक्षा अपनी भाषा में ही हो रही है तो वे भी तो आगे बढ़ रहे हैं। हम अपनी संस्कृति को छोड़कर अंग्रेजी सभ्यता के पीछे भाग रहे हैं। शिक्षा नीति में इस संबंध में जरूर प्रावधान होना चाहिए।
हरीश भावनानी, भोपाल सिटीजंस फोरम, भोपाल

स्थानीय संवेदना को बढ़ावा मिलेगा
नई शिक्षा नीति लागू होने से भारत की नई पीढ़ी के निर्माण में नई पहल की शुरुआत होगी। प्राथमिक शिक्षा में लोक भाषाओं को प्रोत्साहन से स्थानीय संवेदना को बढ़ावा मिलेगा। इससे हमारे नौनिहालों को शिक्षा रुचिकर लगेगी, बोझ नहीं।
प्रोफेसर सत्येन्द्र कुमार शेन्डे, शासकीय पीजी कॉलेज, सिवनी

वैदिक शिक्षा अच्छा सुझाव
वैदिक शिक्षा एक अच्छा सुझाव है। जब विदेशों में गीता, रामायण, महाभारत व संस्कृत पढ़ाई जा सकते हैं तो भारत में इसके महत्व को क्यों नहीं बताया जा सकता है। बच्चों को धर्म और संस्कृति वैदिक शिक्षा से ही तो मिलेगी। नीति में अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म होना अच्छी बात है, पर वर्तमान परिस्थितियों के तहत उससे दूर भी नहीं रहा जा सकता है। अधिकांश पालक चाहते हैं कि उनके बच्चों को विदेशी भाषाओं का भी ज्ञान होना चाहिए। - एसके खंडूजा, राष्ट्रपति अवार्ड से सम्मानित सेवानिवृत्त शिक्षिका, छिंदवाड़ा
शैक्षणिक व्यवस्था पर उत्तम विचार
कोठारी का अग्रलेख शैक्षणिक व्यवस्था पर उत्तम विचार है। प्रश्न इसके क्रियान्वयन का है। शिक्षा देने वाले स्वस्थ मानसिकता के लोग होने चाहिए। क्षेत्रीय भाषा में प्राथमिक शिक्षा सराहनीय कदम है। यह भी देखना है कि राष्ट्र भाषा क्या हो, जो देश की पहचान बने। विद्वानों को मिलकर सोचना और निर्धारित करना आवश्यक है, बगैर राजनीतिक हस्तक्षेप के। राष्ट्रीय स्वालंबन में ग्रामीण क्षेत्रों के अनुरूप रोजगार स्थापित किए जाएं। ग्रामीण क्षेत्रों का उत्पादन विदेशी बाजारों में भी उपलब्ध कर सकें। शिक्षकों के प्रशिक्षण में भी तद्नुसार बदलाव किया जाना आवश्यक है।
निर्मल चंद निर्मल, सागर

शैक्षणिक संस्थान नई नीति के अनुरूप तैयार हों
रोजगारमूलक शिक्षण लंबे समय से देश की जरूरत बना हुआ था। व्यवसायीकरण की दौड़ में बच्चे अपनी मातृभाषा से भी दूर हो रहे थे। नई शिक्षा नीति तैयार तो हो गई, मगर यह देखना जरूरी है कि हमारे शैक्षणिक संस्थान इसके लिए कितने तैयार हैं। अंकों की प्रतिस्पर्धा पूरी तरह से खत्म होना चाहिए।
प्रो. रमेश मंगल, शिक्षाविद, इंदौर

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