डर के हिज्जे, उजालों की तरह विभाजित होने लगे अंधेरे भी

सब्जी मंडी में फूल लेती अचानक मेरे आँखों के सामने जैसे हरा अंधेरा छा गया था,

By: विकास गुप्ता

Published: 07 Jun 2018, 06:36 PM IST

सब्जी मंडी में फूल लेती अचानक मेरे आँखों के सामने जैसे हरा अंधेरा छा गया था, पहचानी हुई ताज़ा हरा धनिया की महक को हटाते हुए मैंने अपने दायीं तरफ उस दुबली-पतली बच्ची को देखा जो मेरे अंदाज़ से बारह वर्षीय रही होगी, बड़ी ही उम्मीद से मुझे देख रही थी। इससे पहले कि धनिया लूँ, एक दबंग महिला उसे अपशब्द कहती हुई धकियाते हुए मुझे धनिया देने लगी। जब मैंने यह देखा तो उस महिला से कहा, "उसे क्यों डरा रही हो? अब तो धनिया उसी से लूंगी।

घर आने के बाद भी मैं उन दोनों के बीच के आपसी पेशेवर तनाव व प्रतिस्पर्धा को भूल नहीं पायी। कुछ दिनों बाद फ़िर मंडी में जाना हुआ, एकाएक मेरी ओर तेज़ी से आती हुई एक बच्ची दिखी। ओह,यह तो शायद वही है! मैं धनिया खरीद चुकी थी, लेकिन उसकी मायूसी देख दो पुली धनिया और खरीद लिया तो उसके चेहरे पर खुशी के बजाय आत्मसंतुष्टि लिए स्मित मुस्कान ज्यादा नज़र आई। मुझे अचानक उस दबंग महिला का ख्याल आया, वह शायद वहां नहीं थी या दूर से हमें घूर रही थी। वह सर्दियों की शाम थी, सूरज भी जल्दी ही डूबकर महिलाओं को भी जल्दी घर पहुंचने की ताक़ीद करने लगा था। मैं चौराहे पर हरी बत्ती हो जाने का इंतज़ार कर रही थी, तभी मैंने देखा सड़क के उस पार एक दुबली-पतली काया कुछ सहमी सी इधर-उधर देख रही थी हाथ में बचा हुआ धनिया व कँधे पर एक झोला। यह तो वही बच्ची थी! सूट भी तो वही था, शायद ऊपर सर्दी को आँख दिखाने की कोशिश करता गर्म सा कुछ लपेट रखा था। क्या वह अब अँधेरे को ज्यादा समझने लगी थी, जो इधर-उधर देखते हुए बेचैन थी... क्या वह बिल्कुल अकेली है?

यह सब उधेड़बुन दिमाग में उपज ही रही थी कि गाड़ियों के तेज हॉर्न मुझे घूरने लगे। मैंने गाड़ी किनारे लगा दी व उसे देखने लगी। वह दूसरी तरफ मंदिर के पास कम रोशनी में खड़ी थी। इससे पहले मैं उसके पास पहुंच पाती, कोई मजबूत कद-काठी की महिला उसके समीप आकर खड़ी हो गयी... वह जरूर वही दबंग महिला थी। उनके बीच कोई मुस्कान नहीं थी, कोई बातचीत नहीं। दोनों अलग दिशाओं में देख रही थीं। जैसे मंजिले भी अलग थीं। वह बच्ची धीरे-धीरे उस महिला के समीप आती जा रही थी और महिला उसके समीप, जैसे अँधेरे में घूरती नजरों से उसे महफूज़ रख रही हो। तभी ऑटो आया। उस महिला ने उसके बैठने का इंतज़ार किया व ऑटो वाले को कुछ हिदायतें दीं, फ़िर खुद विपरीत दिशा में चली गयी।

मैं सुबह उठी तो वे दोनों मेरे आंखों के सामने फिर खड़ी हो गईं। न जाने क्यों उस बच्ची व महिला का अँधेरे में समीप आना मुझे मुस्कान के साथ सिहरन दे रहा था। मुस्कान के साथ सिहरन! यही उस शाम का सच था जो मुझे कचोटने लगा था। हम महिलाओं के डर हमेशा एक ही होते हैं, तमाम हव्वाओं की चीख, बेबसी व घुटन की शक़्ल एक-सी ही होती होगी। वे दो महिलाएं जो दिन के उजाले में पेशेवर शत्रु की तरह थीं, एक-दूसरे को खा जाने वाली नज़रों से घूरने वाली, शाब्दिक फूहड़ता के चरम पर भी... लेकिन रात के अँधेरे ने उन्हें एक कर दिया था। अब उनकी देह की मूक भाषा एक हो चली थी। स्त्रियों के हिस्से के उगते सूरज अलग हो सकते हैं लेकिन खुली राहों पर ढलते सूरज की परछाई का रंग एक ही है... जैसे सुर्ख़ स्याह रंग की स्याही हो, जिससे लिखी भाषा भी उनकी देह में एक समान हिज्जे लिए होती है, लेक़िन हम इस अँधेरे के डर की तरफ भी पीठ करने लगती हैं। हम स्त्रियां उजालों की तरह अपने अँधेरे भी विभाजित करने लगी हैं... जबकि यह अधिकाधिक साझा किए जाने चाहिए।

- मंजुला बिष्ट

विकास गुप्ता
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