शोध में शुचिता जरूरी

शोध में शुचिता जरूरी

Sunil Sharma | Publish: Sep, 04 2018 10:08:42 AM (IST) विचार

प्लेजरिजम विरोधी नियमों और ऐसे ही किसी अन्य कदम की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि विश्वविद्यालय संचालक ये नियम कितनी गंभीरता से लागू करते हैं।

- पुष्कर, शिक्षाविद

देश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के अध्यापक हों, शोधकर्ता हों या फिर छात्र, सभी के शोध कार्यों में धोखाधड़ी के मामले जब-तब सामने आते रहते हैं। साहित्यिक चोरी यानी प्लेजरिजम, फर्जी जर्नल में सामग्री छपवाना, शोध का ‘जुगाड़’ करना, शोध पत्र में किसी ऐसे व्यक्ति का नाम देना जिसका कि उस शोध कार्य में कोई योगदान न हो, यों तो ऐसा दुनिया में सभी जगह होता है, पर भारतीय इन गतिविधियों को अंजाम देने वालों में सबसे पहले आते हैं।

हाल ही एक राष्ट्रीय अखबार ने देश में फल-फूल रहे फर्जी पत्र-पत्रिका उद्योग पर एक समाचार शृंखला प्रकाशित की। सामान्यत: ‘परजीवी’ के रूप में प्रचलित ये फर्जी जर्नल या पत्रिकाएं किसी भी व्यक्ति द्वारा भेजी गई कोई भी सामग्री अक्सर दो से सात दिन की अवधि में प्रकाशित कर देती हैं। बेशक वे इसके लिए पैसा लेते हैं, फिर भले ही सामग्री निरर्थक ही क्यों न हो। आजकल भारत ‘पैसा देकर छपवाने’ के व्यापार के बड़े केंद्रों में से एक है।

फर्जी जर्नल का प्रकाशन ऐसी गतिविधियों का एक अंश मात्र है। शोध कार्यों में धोखाधड़ी के और भी कई तरीके हैं। किसी अन्य द्वारा लिखी गई पुस्तक या पत्रिका में छपी सामग्री को ज्यों का त्यों नकल कर या उसके कुछ हिस्से कॉपी-पेस्ट कर उसे खुद के द्वारा लिखा हुआ बता कर प्रसारित करना यानी प्लेजरिजम इन दिनों एक प्रचलित तरीका है। अति तो तब हो जाती है, जब कोई शोध पूरा का पूरा किसी किताब या पत्रिका से चोरी कर फर्जी जर्नल में प्रकाशित करा दिया जाता है।

अभी तक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और विश्वविद्यालय शोध कार्य में धोखाधड़ी को लेकर गंभीर नहीं थे, पर अब लगता है कि सरकार और यूजीसी की आंखें खुल चुकी हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह शर्मिंदगी का विषय है यदि भारतीय छात्र शोध कार्य के लिए धोखाधड़ी का सहारा लेते हैं। इसका सीधा असर देश के विश्वविद्यालयों की वैश्विक रैंकिंग पर पड़ता है।

शोध कार्य में धोखाधड़ी कोई नई बात नहीं है। विडम्बना यह है कि भारत में यह तेजी से बढ़ी है। वर्ष 2010 में आए अकादमिक प्रदर्शन सूचकांक (एपीआइ) के साथ ही इसमें आश्चर्यजनक बढ़ोतरी देखने को मिली। एपीआई से पहले कुछ गिने-चुने महत्त्वाकांक्षी छात्र ही फर्जी गतिविधियों में लिप्त होते थे। ज्यादातर शोधार्थियों को कॅरियर निर्माण में शोध प्रकाशन की परवाह नहीं होती थी, क्योंकि आइआइटी और आइआइएम जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों का पूरा जोर अध्यापन पर ही था। लेकिन एपीआइ के बाद यह वैकल्पिक नहीं रह गया, बल्कि आगे बढऩे के लिए अनिवार्य हो गया। यूजीसी ने प्लेजरिजम की समस्या से निजात पाने के लिए हाल ही कुछ नए नियमों को मंजूरी दी है। भारतीय शिक्षा की साख के लिए यह अच्छा प्रयास है।

प्लेजरिजम विरोधी नियमों और ऐसे ही किसी अन्य कदम की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि विश्वविद्यालय संचालक, जिनमें कुलपति, डीन, विभागाध्यक्ष और फैकल्टी सदस्य सभी शामिल हैं, ये नियम कितनी गंभीरता से लागू करते हैं। इसके लिए प्रमुख पदों पर नियुक्त शिक्षाविदों के सतर्क रहने की भी आवश्यकता है। बहरहाल दोनों ही बातों में से निश्चित कोई एक भी नहीं है।

गत वर्ष ही ऐसी खबरें आईं कि देश के प्रतिष्ठित संस्थान जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में कुछ नवनियुक्त प्राध्यापक प्लेजरिस्ट हैं यानी कि इधर-उधर से सामग्री चुरा कर शोध सम्पन्न करने वाले। मौजूदा दौर में जबकि प्लेजरिजम जैसे शैक्षणिक अपराध बढ़ रहे हैं, अक्सर उन्हें अनदेखा ही किया जाता है, सजा शायद ही कभी दी जाती है, पर अपराधी को इनाम अक्सर मिलता है। हाल ही संसद में जानकारी दी गई कि पिछले तीन सालों में प्लेजरिजम के तीन मामलों में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की गई। ये मामले थे द्ग पॉन्डिचेरी विश्वविद्यालय के कुलपति चंद्र कृष्णमूर्ति (2015), महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के रीडर अनिल कुमार उपाध्याय (2017) और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम तकनीकी विश्वविद्यालय, लखनऊ के कुलपति विनय कुमार पाठक (2018)। जाहिर है महज तीन मामले सही तस्वीर पेश नहीं करते।

जहां तक फर्जी जर्नलों का सवाल है, सरकार कुछ सालों से इन पर नकेल कसने की तैयारी कर रही है। 2016 के मध्य में यूजीसी ने वैध जर्नलों की सूची तैयार करने का बीड़ा उठाया था ताकि अध्यापक फर्जी जर्नलों में प्रकाशन से बचें। 2017 के प्रारंभ में जारी वैध जर्नलों की पहली सूची में जहां कुछ वैध जर्नल शामिल नहीं हो सके, वहीं कुछ अवैध जर्नलों के नाम सूची में रह गए। मई 2018 तक सूची से करीब 4,305 जर्नल फर्जी करार देकर हटा दिए गए, लेकिन इस प्रक्रिया में पुन: कई वैध जर्नलों के नाम भी सूची से हट गए।

शोध कार्य में धोखाधड़ी पकडऩे का कोई आसान तरीका नहीं है। फर्जीवाड़े के दोषी लोग राजनेताओं से संबंधों और फर्जी जर्नलों में योगदान के चलते आज कुलपति, प्रधानाचार्य, डीन जैसे उच्च पदों पर आसीन हैं। प्लेजरिजम और शोध में फर्जीवाड़े पर रोक लगाने की दिशा में सरकार की ओर से एपीआई में संशोधन का कदम कुछ हद तक प्रभावी हो सकता है, यदि सरकार शोध कार्य को वैकल्पिक कर देती है, खास तौर पर कॉलेज शिक्षकों के लिए जिनका मुख्य कार्य स्नातक पाठ्यक्रमों के छात्रों को पढ़ाना है।

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