पाक चुनाव के पोशीदा मुद्दे

एक सर्वे के मुताबिक केवल 41 फीसदी मतदाता स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों को लेकर आश्वस्त हैं लेकिन सारा मामला इस बात पर टिका है कि कितने मतदाता घर से निकल कर वोट देते हैं।

By: सुनील शर्मा

Published: 24 Jul 2018, 10:54 AM IST

- मनन द्विवेदी, विदेश मामलों के जानकार

पाकिस्तान में हर बार जब चुनाव होता है तो वह एक किस्म की उम्मीद जगाता है कि अब वहां की फौज और संदिग्ध गुप्तचर एजेंसियों के ‘गहन तंत्र’ (डीप स्टेट) या ‘छिपी ताकतों’ की गड़बडिय़ों से मुल्क को निजात मिल सकेगी। फौजी मुख्यालय रावलपिंडी और आइएसआइ ही इस देश को मिलकर चलाते हैं और भारत जैसे अपने दक्षिण एशियाई पड़ोसियों को सरहद पार आतंकवाद से हलकान किए रहते हैं।

पाकिस्तान का हालिया चुनाव भी इससे कोई अलग नहीं है। नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरियम आम लोगों की सहानुभूति जीतने और खुद को उम्मीद व लोकतंत्र के प्रतीक के रूप में पेश करने के लिए मुल्क वापस आए हैं। मियां नवाज शरीफ ने पाकिस्तान के पिछले आम चुनाव में ताकत और विकास के प्रतीक के रूप में अपने चुनाव चिह्न बाघ का इस्तेमाल बड़ी चालाकी से किया था। उनके स्थानापन्न प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार शाहबाज शरीफ ने एक सच्चे जननेता की परंपरा निभाते हुए जनता का आह्वान करते हुए कहा है, ‘पाकिस्तान ऐसी नैतिक, सैन्य व आर्थिक ऊंचाई पर पहुंचेगा कि वे (भारतीय) वाघा सीमा पर आएंगे और पाकिस्तानियों को अपना आका बताएंगे।’ जमीनी हकीकत से दूर ऐसे जुमले पाकिस्तान के चुनाव का एक चेहरा पेश करते हैं। भारत को शाश्वत खतरे के रूप में दिखाकर आंतरिक गड़बडिय़ों से पाकिस्तानी अवाम का ध्यान बंटाया जा रहा है और इस्लामाबाद की राह के हर रोड़े को ‘भारत की साजिश’ करार दिया जा रहा है।

चर्चा है कि इस बार पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान की ओर से प्रधानमंत्री पद का चेहरा इमरान खान हैं। उन्होंने भारत, अमरीका और मोटे तौर पर पश्चिमी जगत के समक्ष अपनी इसी छवि को पोषित भी किया है। पाकिस्तान में विकास की एक बड़ी खामी वहां बिजली की कमी है। इस मामले में भी दोष आंशिक रूप से भारत का ही बताया जाता है क्योंकि दोनों देशों के बीच 1960 में हुई सिंधु नदी जल संधि को बाधित करने का आरोप भारत पर ही लगाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में लंबित किशनगंगा का मामला भी पाकिस्तान के प्रति भारतीय नीति का ही परिणाम समझा जाता है। इस बार के चुनाव में न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी एक अहम मसला है जो कथित तौर पर पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान के प्रभाव में है।

वाशिंगटन स्थित विल्सन सेंटर के माइकल कगलमैन पाकिस्तानी मुस्लिम लीग - नवाज और इमरान खान की तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के बीच आमने-सामने की लड़ाई की बात कहते हैं। उनका मानना है क्योंकि फौज पीएमएल-एन के बजाय इमरान को पसंद करती है लिहाजा पीएमएल-एन के चुनावी प्रयासों को नाकाम करने के लिए वह कोई अप्रत्यक्ष कार्रवाई कर सकती है।

बहुत संभव है कि ‘सारी समस्याओं की जड़ भारत है’ पर जोर देना उतनी अहमियत न रखता हो क्योंकि इन चुनावों में विकास भी एक मुद्दा है। आंतरिक सुरक्षा का परिदृश्य भी बहुत सकारात्मक नहीं है। चूंकि तहरीक-ए-इंसाफ के एक प्रत्याशी इकरामुल्ला गांदापुर के ऊपर एक आत्मघाती हमला हो चुका है जिसमें वे जख्मी हुए हैं। दैनिक ‘डॉन’ के एक सर्वे के मुताबिक केवल 41 फीसदी मतदाता स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों को लेकर आश्वस्त हैं लेकिन सारा मामला इस बात पर टिका है कि कितने मतदाता घर से निकल कर वोट देते हैं।

पिछले चुनाव में आधे से कुछ ही ज्यादा मतदाताओं ने मत दिए थे। इस बार यह आंकड़ा उत्साहजनक हो सकता है। सर्वे यह भी कहता है कि अधिसंख्यक मतदाता पीएमएल-एन के समर्थन में हैं लेकिन कुछ ने इमरान खान की पार्टी का रुख कर लिया है। चुनावी भविष्यवक्ताओं की मानें तो मियां नवाज शरीफ वापसी करने जा रहे हैं।

भारत को नवाज शरीफ पर करीबी निगाह रखनी होगी। गुरदासपुर और पठानकोट के हमलों ने दोनों मुल्कों के बीच एक कामकाजी रिश्ता पनपने में रोड़ा अटकाया था। शरीफ व्यक्तिगत रूप से तो भारत के साथ करीबी व्यापारिक संबंधों के हक में थे लेकिन पाकिस्तान के 'डीप स्टेट' ने गुरदासपुर और पठानकोट को अंजाम दे डाला। कुलभूषण जाधव का मामला भी शरीफ ने काफी रणनीतिक तरीके से निपटाया, भले ही उन्होंने ऐसा कर रावलपिंडी को नाराज किया हो।

कुल मिलाकर देखें तो पीएमएल-एन एक आजमाई हुई और भरोसेमंद ताकत है जबकि इमरान खान अप्रत्याशित हैं और उनके पीछे फौज खड़ी है जो जनभावनाओं के हिसाब से काम करती है। चुनाव में आतंक, भाई-भतीजावाद और भारत के साथ रिश्तेे अहम मुद्दे रहने वाले हैं। पनामा मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मद्देनजर भ्रष्टाचार भी अहम मसला है। लोग आला पदों पर ईमानदारी और पारदर्शिता चाहते हैं। राजकोष और करों का संग्रहण भी एक बड़ा मसला है। इस बार लश्कर-ए-तैयबा का राजनीतिक फ्रंट मिल्ली मुस्लिम लीग भी चुनावी जंग में है जो चिंता का एक सबब है। ऐसे में दो सवाल हैं - पहला, राजनेताओं पर वैश्विक भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते मतदाता पीएमएल-एन पर कैसे भरोसा करे और दूसरा, क्या मुल्क वास्तव में 'डीप स्टेट' प्रायोजित इमरान खान पर अपना भरोसा जता सकता है? अगर मतदान पहले से ही प्रबंधित हुआ तो जाहिर है कि इन सवालों का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।

सुनील शर्मा
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