पाकिस्तान की 'कॉस्मेटिक' कार्रवाई अब नाकाफी

पाकिस्तान में 'फॉल्ट-लाइन्स' की कभी न खत्म होने वाली शृंखला है। एफएटीएफ के ग्रे-सूची में रखने पर सवाल उठाना बेमानी।
आतंकियों के वित्तपोषण को रोकने का बनाना होगा प्रभावी तंत्र।

By: विकास गुप्ता

Updated: 29 Jun 2021, 09:22 AM IST

अरुण जोशी, (दक्षिण एशियाई कूटनीतिक मामलों के जानकार)

पाकिस्तान को फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) से राहत नहीं मिली है। वह एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट में अभी बना रहेगा। वजह, मनी लांड्रिंग और कुछ आतंकी-नेटवर्क और उसके सरगनाओं के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई में उसका विफल रहना है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने हाफिज सईद, मसूद अजहर और अन्य को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कर रखा है। एक आसन्न सवाल यह है, पाकिस्तान आतंकी संगठनों, उनके सरगनाओं और ऐसे ढांचे के खिलाफ कार्रवाई से क्यों कतरा रहा है? यह कोई पहेली नहीं है। इसका सीधा जवाब है, पाकिस्तान ने आतंकी नेटवर्क बनाने और उससे जानबूझकर मुंह मोडऩे के मामले में खुद को इतना उलझा लिया है कि अपने लोगों की सुरक्षा की बात ही क्यों न हो, वह उस नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई में असमर्थ है। हालांकि, उसकी इससे बड़ी समस्या आतंकवाद से लडऩे और अंतरराष्ट्रीय वॉचडॉग के तय मानकों को पूरा करने को लेकर जरूरत से ज्यादा कार्रवाई करने का भरोसा खुद को देने की प्रवृत्ति पर कायम रहना है। इस पर भी उसका यह सवाल बार-बार दोहराना कि एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट में वह क्यों है?

FATF ने पाकिस्तान को नहीं दी कोई रियायत, फिलहाल ग्रे लिस्ट में शामिल रहेगा

पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने अक्सर इस सवाल को दोहराया है और अपने 'घर' के हालात देखे बिना खुद ही निष्कर्ष पर पहुंचे हैं। पहले उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में रखने का का कोई औचित्य नहीं था क्योंकि 27 में से 26 कार्यबिंदुओं को पाकिस्तान ने पूरा किया है। यदि पाकिस्तान ने ऐसा किया भी हो, तो भी मुख्य मुद्दा यह है कि मूल समस्या से निपटने में वह विफल रहा है। शाखाओं की काट-छांट मात्र से एफएटीएफ के लिए उसे क्लीनचिट देने का सवाल ही नहीं उठता है।

पाकिस्तान के PM इमरान खान ने अमरीका से भारत जैसी दोस्ती की उम्मीद जताई, कहा-बराबरी वाले रिश्ते की है चाहत

मुद्दा यह है कि पाकिस्तान आतंकी समूहों के खिलाफ कार्रवाई करने का अनिच्छुक है क्योंकि ऐसा करने से पड़ोसी देशों के खिलाफ इन समूहों के इस्तेमाल की उसकी चाल कमजोर होगी। अफगानिस्तान में सत्ता हथियाने के लिए पाकिस्तान ही तालिबान के जरिए छद्म रूप से लड़ रहा है। पाकिस्तान की लम्बे समय से यही महत्त्वाकांक्षा रही है। अक्टूबर 2001 से पहले यानी 9/11 के आतंकी हमले के बाद अमरीकी बलों के वहां पहुंचने तक यह पूरी भी होती रही है। इसके बाद उसने भारत की सरजमीं पर खून बहाने के लिए इन समूहों का इस्तेमाल किया। जैश-ए-मोहम्मद, लश्करे-तैयबा जैसे समूहों को जम्मू-कश्मीर में हिंसक गतिविधियों के लिए उकसाया गया और फंडिंग की जाती रही। जम्मू-कश्मीर में आतंकी कृत्यों का पूरे देश की राष्ट्रीय सुरक्षा पर असर पड़ता है। पाकिस्तान यह जानता है और कश्मीर में आतंकी कृत्यों पर भारत की बेचैनी पसंद करता है। इसलिए वह केवल कॉस्मेटिक उपाय कर दुनिया से प्रमाणपत्र चाहता है कि आतंकवाद के खिलाफ उसने कार्रवाई की है। पाकिस्तान में ही शियाओं को निशाना बनाया जा रहा है तो अहमदियाओं को 'काफिर' माना जाता है। 'फॉल्ट-लाइन्स' की यह कभी न खत्म होने वाली शृंखला है।

पाकिस्तान ग्रे-लिस्ट में तो रह सकता है, पर भारत के खिलाफ अपने 'स्ट्रेटजिक ऐसेट' के खिलाफ कार्रवाई उसकी योजना में कहीं नहीं है। फिलहाल जब एफएटीएफ ने ग्रे-सूची से बाहर निकलने के लिए पांच और शर्तों का पालन करने को कह दिया है तो उसने कुछ ताकतों (जैसे फ्रांस-यूके) पर दोष मढऩा शुरू कर दिया है। एफएटीएफ के प्रेसीडेंट मार्कस प्लेयर ने स्पष्ट कहा है कि जब तक शर्तें पूरी नहीं होंगी, पाकिस्तान निगरानी में रहेगा। यह दिखना चाहिए कि पाकिस्तानी अदालतों के फैसले प्रभावी हैं। एफएटीएफ ने यह भी कहा है कि पाकिस्तान सभी सूचीबद्ध 1267 और 1373 घोषित अंतरराष्ट्रीय आतंकियों और उसके सहयोगियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करे। साथ ही आतंकियों के वित्तपोषण को रोकने के लिए प्रभावी तंत्र बनाए।

विकास गुप्ता
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned