पलायन के बाद सामाजिक सुरक्षा की चुनौती

लघु व मध्यम उद्योगों की अपनी समस्याएं हैं। माल तैयार भी हो तो उसके विपणन की समस्या है। कोरोना के दौर में जरूरतमंदों तक राहत की आवश्यकता है । इसके लिए नीतियों में स्पष्टता व सिस्टम पर नियंत्रण के साथ -साथ प्रशासनिक मशीनरी को भी चुस्त दुरुस्त करना होगा।

By: Prashant Jha

Published: 27 May 2020, 02:28 PM IST

डाॅ. सत्यनारायण सिंह, सेवानिवृत आईएएस, कई प्रशासनिक पदों पर रहे

महज चार घंटे के मोहलत देकर घोषित किये गए देशव्यापी लोकडाउन की घोषणा के मात्र 12 घन्टें बाद ही बदहवास लाखों मजदूर, बच्चे, बूढ़े, महिलाओं के साथ हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा के लिए सड़क पर आ गए थे । सरकारी सख्ती, वेतन, देखभाल व सहायता के आश्वासन पर मजदूर रुके भी. लेकिन आश्वासन के अनुसार उनको न तो वेतन मिला और न ही किराया माफ़ी। जो कुछ पास में नकद पैसा था वह भी समाप्त हो गया, खाने पीने का अभाव हो गया, कर्ज हो गया, लम्बे लॉक डाउन से हालत ऐसे बने कि मकान मालिकों द्वारा बेघर कर दिया गया। सरकार वेतन व मकान किराया के लिए उद्यमियों व मकान मालिकों पर दबाव नहीं डाल सकी। देखा जाये तो सरकार के पास इन बेरोजगारों की गणना व सहायता करने का पर्याप्त समय था, परन्तु इसमें वह विफल रही।

लॉकडाउन के अब तक के चार चरणों में हमने देखा कि किस तरह से देश में 8 करोड़ प्रवासी जो रोजी रोटी की तलाश में गये थे अपने घरों के लिए निकल पडे़। सामाजिक दूरी के नियम को मुहं चिढाते मजदूरों की तीन-तीन किलोमीटर लाइन लग गई। दिहाड़ी मजदूर, कामगार, दस्तकार, कारीगर, फनकार, फड़ लगाकर सामान बेचने वाले, कचरा बीनने वाले, रिक्शा, आॅटो, टैक्सी चलाने वाले, निर्माता श्रमिक हताश धूप गर्मी में चल पड़े। कुछ को मंजिल की चाह में रास्तों ने निगल लिया। घर जाने के सिस्टम व साधन फेल हो गयें। कई स्थानों पर पुलिस द्वारा दुव्र्यवहार व पिटाई भी हुई परन्तु महानगरों में संघर्ष कर रोजी-रोटी कमाने वाले ये लोग निकल पडे़।

जब सब कुछ सामने आ रहा था तो शायद सरकार ने वैश्विक शर्मिन्दगी से बचने के लिए आकर्षक घोषणायें की। किसान मजदूर, असंगठित मजदूरों के लिए प्रावधान किए। भारत सरकार ने 20 लाख करोड़ का पैकेज दिया जिसे जीडीपी का 10 प्रतिशत बताया गया। घोषणाओं के अनुसार उद्योग, कुटीर-लघु व मजोले उद्योग, किसान मजदूर मध्यम वर्ग असंगठित मजदूरों को मदद मिलने का प्रावधान किया। लेकिन पड़ताल में पता चला कि भारत सरकार का प्रोत्साहन पैकेज तुरन्त आर्थिक मदद का नहीं होकर कर्ज की घोषणा साबित हुई।
विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने 2016 में नोटबंदी, 2017 में जीएसटी, 2018 में इन्फ्रास्टकचर लीजिंग व फाइनैन्सिल सर्विसेज लागू कर एनवीएफसी. को कमजोर कर दिया। आर्थिक गतिविधियां व उद्योग-धन्धें बन्द हो गये। सरकार ने आरबीआई को 525000 हजार करोड़ की लिक्वीडिटी दी, परन्तु डिफाल्ट में वृद्धि होने के कारण बैंक एमएसएमई को कर्ज देने में हिचकती है। एमएसएमई लगभग 120 मिलियन वर्कर्स को सर्वाधिक रोजगार उपलब्ध कराती हैं। कम्पनियों को फौरी तौर पर न तो पैकेज में कोई मदद का कदम उठाया गया और न हीं इन्फ्रास्टक्चर व कन्जम्पशन को बढ़ाने के पर्याप्त प्रयास प्रारम्भ किये गये।

रिसर्च फर्म ’बर्न स्टीन‘ ने इन्डिया के जीडीपी में 7 प्रतिशत गिरावट की आंशका बताई है। इकानाॅमी के बारे में अब तक का सबसे निराशाजनक आंकलन किया है। ”फौरन पोर्टफोलियों इन्वैस्टर्स ने 2513 करोड़ की विशुद्ध बिकवाली की है। 65000 करोड़ के शेयर बेचे जा चुके है। वोकेरेजे के डायरेक्टर अयान मुखोपाच्य ने कहा है कि “घोषणा के बाद सैन्टिमेन्ट निगेटिव हो गया। कम्पनियों की मदद या कन्जम्पशन बढ़ाने का कोई उपाय नहीं किया गया। केवल कर्ज वितरण पर जोर है, पैकेज में निवेशकों को राहत नहीं दिखी। केवल क्रेडिट ग्रोंथ बढ़ाने यानि अधिक रूपया लेने पर जोर है जिससे मार्केट में मनी फ्लो बढ़ सके“। किसानों को व कुछ सीमित आय वालों के ब्याज में कमी की गई है। आम आदमी को नहीं“। अब स्माल सेंविग्स पर ब्याज कम होगा। कामगारों की, कुशल, अर्धकुशल, अकुशल कैज्यूअल वक्र्स की डिमान्ड बनी रहेगी। परन्तु उनकी आम आदमी व छोटे कारोबारियों को वापसी की गारन्टी नहीं है।

2019 मार्च, में छोटे धन्धों को बैंको द्वारा दिया गया कर्ज 5.58 प्रतिशत था जो घटकर अब 5.37 प्रतिशत रह गया है। ना कर्ज देने की स्थिति और न कर्ज लेने की स्थिति, बाजार में माल की मांग नहीं है। उद्यमी माल का उत्पादन कर उन्हें ऊचें दाम पर बेंचे, लाभ कमायें, कर्ज मय ब्याज अदा करें, आपस में खरीद फरोस्त हो यह आवश्यक हैै। शेयर सूचकांक 1069 अंक लुढ़का है व अमेरिकी डाॅलर के मुकाबले रूपया 75.91 प्रति डालर हो गया है। आयात नीति में परिवर्तन नहीं किया गया है। आर्थिक पैकेज जीडीपी का मात्र 0.91 फीसदी है। घोषणा में केवल 186650 करोड़ की कुल प्रोत्साहन राशी है। गरीब कल्याण 33000 करोड़, मुफ्त अनाज 60 हजार करोड़, चिकित्सा व स्वास्थ्य ढांचा 15000 करोड़, जबकि प्रोत्साहन पैकेज 10 लाख करोड़ का होना चाहिए था। कर्ज लो गारन्टी सरकार देगी केवल एक रास्ता अपनाया गया है।

महंगाई की मार बढ़ रही है। आटा सप्लाई 70 प्रतिशत घटा व कीमत 50 रूपये प्रति क्विंटल बढ़ गई है। कुटीर उद्योग, लघु व नफौले उद्योगों की अपनी समस्यायें है, कच्चा माल उपलब्ध नहीं है। निर्मित सामान के विपणन की समस्या है, भयानक मंदी में जरूरतमंदों तक उचित वितरण की आवश्यकता है नीतियों में स्पष्टता सिस्टम पर नियंत्रण व राजनीति व मशीनरी की दुरूस्ती आवश्यक है।

औद्योगिक उत्पादन में गतवर्ष के मुकाबले मार्च में 16 प्रतिशत की गिरावट आई है। मोटर व्हीकलस में 49.6, मशीनरी में 50.29 प्रतिशत 31.7 प्रतिशत कमीकल्स में गिरावट आई है। 3 मई, को 27 प्रतिशत लेबर की जांब छिन चुकी है। बेरोजगारी सर्वकालिक उच्चतम स्तर तक पंहुच गई है। औद्योगिक उत्पादन बंद हो गया है। स्टाक मार्केट गिर गया है। सेंस्कस 9000 हजार पाइन्ट गिर चुका है।
कोरोना संक्रमण के खतरे व लम्बे लॉक डाउन की वजह से अब ग्रामीण विकास तो अवरुद्ध होगा ही बेरोजगारी की समस्या भी बढ़ेगी। करोड़ो की संख्या में लौटने वाले प्रवासी मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा, गांवो में कामकाज, परिवार के स्वास्थ्य, बच्चों की शिक्षा व जनजीवन को दुरस्त करने के लिए पर्याप्त, हर संभव सहायता आवश्यक होगी अन्यथा ग्रामों की शांति व व्यवस्था भी बिगडेगी।

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