झंझट ही झंझट

चलिए वर्तमान सरकार की ही बातें करते हैं। नरेंद्र भाई इसके मुखिया हैं और अमित भैया उनके सेनापति। बाकी सब तो 'प्यादे' समान हैं। और भाई और भैया दोनों ने तय कर रखा है कि जनता को कुछ 'मांगने' का मौका ही मत दो

By: शंकर शर्मा

Published: 24 Jul 2017, 10:57 PM IST


 व्यंग्य राही की कलम से
पता है आदमी नाम का यह जीव सबसे ज्यादा किस चीज से दूर भागता है? जी ठीक समझे आप झंझटों से। एक नौकरपेशा चाहता है कि नौकरी में झंझट न हो। गृहस्थ चाहता है कि परिवार ठीक से चलता रहे। किसान चाहता है कि फसल की उपज ढंग की मिल जाए। नौजवान की इच्छा है कि पहले एक अदद नौकरी मिल जाए और बाद में ब्याह करने को एक  छोकरी। यानी कोई भी झंझट नहीं चाहता। लेकिन क्या सत्ता और सरकार भी यही चाहती है कि झंझट न हो। जी नहीं। आप गलत हैं। सत्ता चाहती है कि सब झंझट में पड़े रहे जिससे उन्हें सरकार से कुछ मांगने की सूझे ही नहीं। सबूत?

जी हां सबूत है हमारे पास। चलिए वर्तमान सरकार की ही बातें करते हैं। नरेंद्र भाई इसके मुखिया हैं और अमित भैया उनके सेनापति। बाकी सब तो 'प्यादे' समान हैं। और भाई और भैया दोनों ने तय कर रखा है कि जनता को कुछ 'मांगने' का मौका ही मत दो। जो कुछ अपने पास है उसे ही बचाने में जुटी रहे।

जब जनता जनार्दन चुनाव में किए पन्द्रह लाख रुपए वाले वादे की याद दिलाने लगी तो नोटबंदी लागू कर दी। झटके में देशवासी अपनी बचत बचाने और नोट बदलवाने में पिल पड़े। रोटी-पाणी भूल गए। तेल-नून और लकड़ी याद नहीं रही बस एक बात दिमाग में रही किसी तरह पुराने नोट बदल जाएं। जैसे ही थोड़ी थावस मिली अचानक भाई बोले कि अब बेनामी सम्पत्ति वालों पर कहर टूटेगा। जो अब तक नहीं टूटा लेकिन लोग फिर बातें करने लगे।

अभी ढंग से उबरे भी नहीं थे कि संभाल बेटा जीएसटी का झटका। सारा बाजार रिटर्न के फॉर्म ढूंढ रहा है। यह चल ही रहा था कि खबर आई कि कर्मचारियों का रिटायरमेंट साठ की बजाय अट्ठावन में किया जा सकता है। बचा बेटा दो साल की नौकरी। किसान ज्यादा बोले तो एक टोटका छूटा कि अब खेती पर भी इनकमटैक्स लग सकता है। अब आप ही बताओ। कोई क्या खाकर नई मांग करेगा।
शंकर शर्मा
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