Paryushan Parv : पर्यावरण और मन की शुद्धि का अवसर है पर्युषण पर्व

Paryushan Parv : प्रकृति और पर्यावरण का संतुलन तब बिगड़ता है, जब इंसान में क्रोध, अहंकार, माया, लोभ, असत्य, असंयम, स्वच्छन्दता, परिग्रह, वासना आदि के भाव पैदा होते हैं।
- जैन धर्म के अनुयायी क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य, ब्रह्मचर्य के माध्यम से आत्मसाधना करते हैं। ये दस धर्म जीने की कला सिखाने के साथ पाप को धोने का काम करते हैं।

By: Patrika Desk

Updated: 10 Sep 2021, 01:49 PM IST

मुनि पूज्य सागर (जैन संत, धर्म और समाज के विषयों पर मार्गदर्शन)

Paryushan Parv : पर्युषण पर्व जैन समाज का सबसे महत्त्वपूर्ण पर्व है। इस पर्व की मुख्य बातें भगवान महावीर के मूल पांच सिद्धांतों पर आधारित हैं। अहिंसा यानी किसी को कष्ट नहीं पहुंचाना, सत्य, अस्तेय यानी चोरी न करना, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह यानी जरूरत से ज्यादा धन एकत्रित न करना। जैन धर्म के श्वेतांबर और दिगंबर दोनों ही समुदाय यह पर्व श्रद्धा से मनाते हैं। श्वेतांबर समाज आठ दिन तक पर्युषण पर्व मनाता है और दिगंबर समाज दस दिन तक दसलक्षण के रूप में पर्युषण पर्व मनाता है। श्वेतांबर समाज पर्युषण पर्व के समापन पर संवत्सरी पर्व मनाता है, जबकि दिगंबर समाज पर्युषण के समापन पर क्षमावाणी पर्व मनाता है।

दसलक्षण पर्व प्रकृति और पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ है। मानसून के दौरान मनाया जाने वाला यह पर्व पूरे समाज को प्रकृति से जुडऩे की सीख भी देता है। इसे धर्म से इसलिए जोड़ा गया है, क्योंकि जो भी सकारात्मक कार्य होता है, वह आखिर में धर्म ही तो है। पर्यावरण असंतुलन पूरी दुनिया में आज सबसे ज्यादा चिंता का विषय है। प्रकृति और पर्यावरण का संतुलन तब बिगड़ता है, जब इंसान में क्रोध, अहंकार, माया, लोभ, असत्य, असंयम, स्वच्छन्दता, परिग्रह, वासना आदि के भाव पैदा होते हैं। इन्हीं बुरे भावों पर नियंत्रण के लिए दस धर्म पालन रूपी ब्रेक लगा दिया गया है। इसके पीछे भावना यही होती है कि प्रकृति और पर्यावरण का संतुलन बना रहे। साथ ही हम धर्म का पालन करने के साथ ध्यान भी करते रहें।

जैन धर्म के अनुयायी क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य, ब्रह्मचर्य के माध्यम से आत्मसाधना करते हैं। ये दस धर्म जीने की कला सिखाने के साथ पाप को धोने का काम करते हैं। देखने में आ रहा है कि वर्तमान में लोग एक दूसरे की भावना को नहीं समझकर एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हैं। आपस का प्रेम समाप्त होता जा रहा है। आत्मिक ऊर्जा समाप्त होती जा रही है। इन सबसे बचने के लिए पर्युषण पर्व इंसान के जीवन में संजीवनी का काम करने वाला है। क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, आकिंचन्य धर्म से मानसिक स्वस्थता आती है। मन और मस्तिष्क में किसी के लिए, किसी भी प्रकार से शत्रुता, नीचा दिखाने के विचार नहीं रह जाते हैं और न ही किसी के प्रति वैरभाव रहता है। संयम, तप, ब्रह्मचर्य से शारीरिक स्वस्थता आती है। जैन ग्रंथों में पर्युषण की परिभाषा देते हुए कहा गया है-'परि समंतात् ऊषन्ते दह्यांते पापकर्माणि यस्मिन् तत् पर्यूषणम्' अर्थात जो पाप कर्मों को जलाता है, पाप क्षयकर आत्मधर्मों को उद्घाटित करता है, आत्मगुणों को प्रकट करता है, उसे पर्युषण कहते हैं। गांठ ग्रंथि- कषाय, मोह आदि रूपी गांठ को खुलने की जो कला सिखाता है, उसे पर्युषण पर्व कहते हैं।

दस दिन के संकल्प भी हैं। ये इस प्रकार हैं-मैंने जो पाप किए है, उनका प्रायश्चित करता हूं। मैं अब आगे से पाप नहीं करूंगा। विनम्र बनकर अपनी गलती को स्वीकार करूंगा। अपने दुख का कारण अपने कर्मों को समझूंगा। वृक्ष, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु का उतना ही उपयोग करूंगा, जितना जीने के लिए आवश्यक होगा। प्रतिदिन पांच मिनट आत्मचिंतन कर आत्मशक्ति को पहचाने का पुरुषार्थ करूंगा। प्राणी मात्र का सहयोग करूंगा। शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए काम करूंगा आदि। यह पर्व समूचे प्राणी-जगत को सुख-शांति का संदेश देता है। इस पर्व में संकल्प लिया जाता है कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जीव मात्र को कभी भी किसी प्रकार का कष्ट नहीं पहुंचाएंगे। किसी से कोई वैर भाव नहीं रखेंगे। संसार के समस्त प्राणियों से जाने-अनजाने में की गई गलतियों के लिए क्षमा याचना करेंगे।

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