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PATRIKA OPINION : गठबंधन युग की शुरुआत, भारत को रखनी होगी नजर

भारत को लेकर गठबंधन सरकार का क्या रुख रहता है? इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में है।

जयपुरJun 04, 2024 / 03:35 pm

विकास माथुर

दक्षिण अफ्रीका के संसदीय चुनाव में राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा के नेतृत्ववाली अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (एएनसी) को तगड़ा झटका लगा है। दक्षिण अफ्रीका के संसदीय इतिहास में यह पहला अवसर है जब एएनसी बहुमत के लिए जरूरी 50 फीसदी मत प्राप्त नहीं कर पाई है। पिछले तीन दशकों से एएनसी सत्ता में है। किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण अब एशियाई देशों की तरह दक्षिण अफ्रीका भी गठबंधन की राजनीति की ओर बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। डेमोक्रेटिक अलायंस (डीए) को 22 फीसदी और पूर्व राष्ट्रपति जैकब जुमा की पार्टी उम्खोंटो वी सिजवे (एमके) ने करीब 15 फीसदी मत हासिल किए है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि एमके के साथ मिलकर एएनसी सरकार बना सकती है।
रंगभेद की समाप्ति व नेल्सन मंडेला के राष्ट्रपति निर्वाचित होने के बाद से एएनसी लगातार सत्ता में रही है। राष्ट्रपति रामाफोसा के चमत्कारिक नेतृत्व में दक्षिण अफ्रीका की सबसे उन्नत अर्थव्यवस्था के रूप में उभरा। देश गरीबी और भुखमरी से बाहर निकला, लेकिन सवाल यह है कि सभी के लिए बेहतर जीवन व्यवस्था और रंगभेद को खत्म करने का नारा देकर सत्ता में आने वाली एएनसी के प्रति लोगों में गुस्से की वजह क्या है। दरअसल, महंगाई, बेरोजगारी और अर्थव्यवस्था में ठहराव के कारण पिछले दशक में एएनसी का जनाधार आश्चर्यजनक तरीके से कम हुआ है। अफ्रीकी मतदाताओं की नाराजगी को न समझ पाने का परिणाम यह हुआ कि एएनसी के सामने बहुमत का संकट खड़ा हो गया। भारत के साथ अफ्रीका के ऐतिहासिक संबध हैं।
दोनों देशों के बीच संबंधों का दौर उस अवधि से चला रहा है जब महात्मागांधी ने एक शताब्दी पहले दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया था। 1994 नेल्सन मंडेला के राष्ट्रपति बनने के बाद दोनों देशों के संबंधों में व्यापक बदलाव आया। ब्रिक्स, इब्सा तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों के माध्यम से भारत-दक्षिण अफ्रीका संबंध और मजबूत हुए। राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद व्यापारिक रिश्ते भी मजबूत हुए। साल 2010 में तत्कालिक राष्ट्रपति जैकब जुमा की भारत यात्रा के दौरान दोनों देश वर्ष 2012 तक द्विपक्षीय व्यापार में 10 बिलियन डॉलर के लक्ष्य के लिए काम करने पर सहमत हुए। राष्ट्रपति रामाफोसा के कालखंड के दौरान यह संबंध लगातार आगे बढ़े है। एएनसी का नजरिया भारत के प्रति हमेशा से ही अनुकूल रहा है।
दोनों देश हिंद महासागर रिम एसोसिएशन को एक जीवंत संगठन बनाने के लिए काम कर रहे है। वैश्विक संगठनों विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों के लिए दक्षिण अफ्रीका भारत के आह्वान का समर्थन करता है। दूसरी ओर अफ्रीका के बिजली संकट को देखते हुए भारत ने 48 सदस्यीय परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में अफ्रीका का समर्थन किया था। अफ्रीकी महाद्वीप में भारतीय निवेश और उद्यम के लिए दक्षिण अफ्रीका प्रवेश द्वार का काम करता है। यहां एक सौ से अधिक भारतीय कंपनियां काम कर रही हैं। इसलिए दक्षिण अफ्रीका का राजनीतिक घटनाक्रम भारत के लिहाज से काफी अहम है। दूसरी ओर दक्षिण अफ्रीका उन अफ्रीकी देशों में से एक है जिसे चीन सबसे अधिक प्राथमिकता देता है। ऐसे में देखना होगा कि भारत को लेकर गठबंधन सरकार का क्या रुख रहता है। क्या वह दक्षिणपंथ के रूप में आगे बढ़ेगा या वामपंथी प्रवृत्तियों की ओर बढ़ेगा ? इसका उत्तर बहुत हद तक भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है।
— डॉ. एन. के. सोमानी

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