गुलाब कोठारी का अग्रलेख मां व ममत्व की महिमा का सही बखान है..

मदर्स डे पर पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी के ‘मां’ शीर्षक से प्रकाशित अग्रलेख को प्रबुद्ध वर्ग ने मां व ममत्व की महिमा का सही बखान करने वाला बताया है। इनका मानना है कि यह आलेख नई पीढ़ी में मां के प्रति आदरभाव जगाने को प्रवृत्त करने वाला है। प्रतिक्रियाएं इस प्रकार हैं।

 

By: Prashant Jha

Updated: 10 May 2020, 07:36 PM IST

मां के नाम एक दिन उचित नहीं

मां तो मां होती है, उसके लिए सभी दिन हैं। होली, दीपावली की तरह मां के लिए एक दिन निश्चित किया जाना उचित नहीं है। मदर्स डे, फादर्स डे सब पाश्चात्य संस्कृति की देन हैं। कोठारी ने सही लिखा है कि मदर्स डे, फादर्स डे, टीचर्स डे सभी जीवन के नकली चेहरे हैं। हमारे देश में मां-पिता और गुरु को देवों का दर्जा दिया गया है, लेकिन पाश्चात्य संस्कृति के पीछे हम ऐसे भाग रहे हैं कि अब उनके नाम के दिन मनाने लगे हैं। वे भाग्यशाली होते हैं जिन्हें माता पिता की सेवा करने का मौका मिलता है। राजेश कुमार, भोपाल

मां के बिना कोई भी संपूर्ण नहीं
मां एक ऐसा शब्द है जो बच्चे के पैदा होने से लेकर बड़े होने तक उसका पूरा ध्यान रखती है। मां खुद अपने लिए नहीं जीती, बल्कि उसे सिर्फ अपनी संतान के लिए काम करने में सुख मिलता है। मेरे हिसाब से मां के बिना तो कोई भी संपूर्ण नहीं है। किसी भी बच्चे में बचपन से संस्कारों की नींव उसकी मां ही रखती है। कोठारी का अग्रलेख पूरी तरह से वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पूरी तरह से सटीक बैठता है। वीपी गणक, ग्वालियर

पूरी सृष्टि माता की ऋणी
मां सदैव पूजनीय है। मां को किसी एक दिन में नहीं बांधा जा सकता। व्यक्ति ही नहीं पूरी सृष्टि भी माता की ऋणी है। भारतीय संस्कृति में मां का सबसे उच्च स्थान है। धर्मग्रंथों में कहा गया है कि मां अपने बच्चे की पहली गुरू है। लेख में सही भावनाएं प्रकट कर आम जन को नए सिरे से सोचने पर विवश किया गया है। कम से कम नई पीढ़ी इस लेख से मां के महत्व को समझेगी। महेश गुरु, उज्जैन

शक्तिशाली मां
कोठारी ने लेख में हमें दुनिया में मां का महत्व बताया है। जब बच्चा पैदा होता है तो बिल्कुल गीली मिट्टी की तरह होता है। मां उसे एक पुरुष के रूप में संसार का संचालन करने की शक्ति प्रदान करती है। मां चाहे तो एक पीढ़ी में संपूर्ण मानव सभ्यता को बदल सकती है। यह पंक्ति हमें बताती है कि मां कितनी शक्तिशाली होती है। यह लेख पढऩे के बाद व्यक्ति के मन में मां के प्रति आदर और सम्मान की भावना पैदा होगी। एमएस मेवाड़ा, सीहोर

मां के प्रति सम्मान हमेशा बना रहे
मदर्स और फादर्स डे पर माता-पिता को सम्मान देना अच्छी बात है, लेकिन यह सम्मान हमेशा बना रहे तो बेहतर होगा। केवल दिखावे के लिए माता पिता को सम्मान देना न ही नैतिकता है और ना ही हमारी संस्कृति का प्रतीक। कोठारी ने बहुत प्रासंगिक बिंदु पर अपना लेख प्रस्तुत किया है। लेख प्रेरक और अमल में लाने योग्य है। राजीव खरे, सतना

संस्कृति का परिचायक शब्द मां
मां शब्द ही भारतीय संस्कृति, संस्कार व शिक्षा का आभास दिला देता है। सचमुच मां देवी की साक्षात मूरत है। भारतीय नारी बच्चों के लालन पालन तथा पति की हर परिस्थिति में सहयोगी होती है। कोठारी ने यह सही लिखा है कि भारत में मां अपने लिए नही जीती, न अघिकार जताती है। मां खुद गीले में सोती है, बच्चे को सूखे में सुलाती है। मां परिवार की आधारशिला है। ऐसे श्रेष्ठ लेख सुधि पाठकों के लिए मार्गदर्शक हैं। प्रेमलता , दमोह

मां के अस्तित्व की तार्किक व्याख्या
आज के उपभोक्तावादी युग में औपचारिक दिवसों की बाढ़ आ गई है और मां का अस्तित्व भी दिवस में कैद होता जा रहा है। इस कटु सत्य पर करारा कटाक्ष करते हुए कोठारी ने मां के अस्तित्व की जो तार्किक व्याख्या की है, वह अद्वितीय है, विचारणीय है तथा मनन करने योग्य है। इतने सुंदर चिंतनयुक्त अग्रलेख के लिए साधुवाद!’ डॉ. शरद सिंह, सागर

पिता और गुरु की तरह सृष्टि की रचयिता

कोठारी ने मां शीर्षक से वह विचार परोसे हैं, जिनके हर व्यक्ति के जीवन में कई मायने हैं। मां, पिता, गुरु सृष्टि के रचयिता हैं। व्यक्ति के जीवन में मां पिता और गुरु की अहम भूमिका है। इन तीनों के आशीर्वाद से ही एक परिपक्व व्यक्तित्व का संपूर्ण खाका तैयार होता है। हमें समझने की जरूरत है कि एक सफल जीवन के लिए हर व्यक्ति को इन आधार स्तंभों की जरूरत होती है। इनके बगैर बुनियाद कमजोर है। यादवेंद्र भटोरे, खरगोन


मां को जीवन समर्पित
राजस्थान पत्रिका के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी जी ने बिल्कुल सही लिखा है कि माता-पिता शरीर नहीं है। हमारी मदर्स- डे वाली माता कौन है? एक वर्ष में क्या एक बार ही मां को याद करेंगे, उसके लिए तो पूरा जीवन ही समर्पित है। हम केवल एक दिन मदर्स डे मनाकर मां को भूलने लगे हैं। ऐसे अग्रलेख स्कूलों के प्रार्थना के समय पढकऱ सुनाने चाहिए जिससे बच्चों में बेहतर संस्कार आ सके। बी.एम. शुक्ला, अध्यक्ष, जन चेतना मंच, अलवर।

झकझोर कर रख दिया

अग्रलेख में बिल्कुल सही लिखा है कि मां केवल आकृति ही नहीं देती है, प्रकृति में भी रूपांतरण करती है। यह क्षमता तो केवल मां ही में है। शिक्षा ने मातृत्व की दिव्यता को कम कर दिया है। मां के लोरियां उसकी आत्मा का नाद होती है। शरीर -मन और बुद्धि में यह क्षमता नहीं होती है जो आत्मा तक पहुंच सके। मां की लोरी का कोई मूल्य नहीं हो सकता है और ना ही उसकी कोई तुलना की जा सकती है। आइए, हम फिर मां की कीमत को पहचाने। संजय बवेजा, व्यवसायी, अलवर

हमारे लिए भगवान है मां-
सही लिखा है कि मां तो प्रकृति है। माता-पिता कोई शरीर नहीं है। हमें यह भाव समझने होंगे। इस समय हमें मां के महत्व को समझना होगा जिसके लिए एक ही दिन में मदर्स डे मनाने की औपचारिकता नहीं करनी है। हम कौनसी संस्कृति में जा रहे हैं। गुलाब कोठारी का यह अग्रलेख युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत का काम करेगा इसके लिए हम उन्हें साधुवाद देते हैं। इस समय नैतिक मूल्यों को बनाए रखने में ऐसे अग्रलेखों की आवश्यकता है। -उर्वशी भार्गव, समाज सेविका, अलवर

हम भारतीय संस्कृति के लोग इसी विराट स्वरूप की ओर बढ़ते हैं हम गौ माता है गंगा माता है, धरती मां है जो भी हमारा पालन-पोषण करती है। हम एक दिन *मदर डे* के रूप में ना मना कर जीवन के प्रत्येक क्षण में उसके प्रति कृतज्ञता का अनुभव करते हैं। हम माता- पिता और गुरु को देवों के समान मानते हैं। इसी कारण से हमारी संस्कृति का एक ही मंत्र है प्राणी मात्र ईश्वर है और उसी ईश्वर का स्वरूप सभी प्राणियों में है। - डॉ भारत भूषण, उदयपुर

सोशल मीडिया की आंधी में रिश्ते सारे ताक पर रखे जा चुके हैं। इसमें सबसे अधिक हानि मां व संतान के रिश्तों पर पड़ता दिखने लगा है। वर्चुअल दुनिया से नाता गाढ़ा कर रहे युवा अपने निजी रिश्तों से किनारा करने लगे हैं और एक दिवस विशेष पर अपनी थोथी भावनाओं की प्रदर्शनी लगाने मात्र से अपने कर्तव्यों की इतिश्री करने लगे हैं। - कंचन चौधरी, शिक्षिका, जोधपुर

विदेशियों द्वारा निर्धारित दिवस विशेष के चलते व्यक्ति के निजी रिश्ते प्रभावित होने लगे हैं। जिन संबंधों से व्यक्ति की न केवल पहचान होती है बल्कि उसके अस्तित्व का गर्व भी संबंधित है। वह भी अब दिखावे भर का रह गया है। पूरे साल का कैलेंडर विभिन्न दिवसों से भरा रहता है और वर्तमान युवा एक सेल्फी पोस्ट कर अपनी जिम्मेदारी पूरा कर लेता है। - अनिरुद्ध शर्मा, संगीतज्ञ,जोधपुर

यह सही है कि वर्तमान में नारी पर आधुनिकता हावी होने लगी है। शायद यही कारण है कि वर्तमान की किशोर और युवा पीढ़ी भी संस्कारवान बनने की बजाय पाश्चात्य सभ्यता की ओर अग्रसर हो रही है। कोठारी ने सच्चाई को अपनी लेखनी से बयां किया है। -सुधा आचार्य, सामाजिक कार्यकर्ता, बीकानेर

मां को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। एक मां ही होती है जो बच्चे को जन्म देने से लेकर अंतिम पड़ाव तक अपने बच्चों को हृदय में समाए रखती है। अग्रलेख संकलित करने योग्य है। मां के कार्यों का बखान किसी दिन विशेष से नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह अपार है। -नरेंद्र कुमार शर्मा, शिक्षक, बीकानेर

माता मानव देह को जन्म देने वाली ही नहीं, वरन संस्कारों की भी जन्मदात्री है। मां के लिए वर्ष के शेष दिनों को छोड़कर कोई एक दिन नियत करना, निहायत ही संकुचित मानसिकता है। आलेख में वर्तमान पीढ़ी ही नहीं, भविष्य के लिए भी व्यापक दृष्टिकोण का समावेश है। हेमशंकर जोशी, राउमावि, गोमट, जैसलमेर

मां का त्याग, बलिदान व ममत्व एवं समर्पण अपनी संतान के लिए इतना विराट है कि संपूर्ण जीवन भी समर्पित कर दिया जाए तो भी मां के ऋण से मुक्त नहीं हुआ जा सकता, इसलिए मात्र एक दिन ही मातृ दिवस नहीं मनाकर मां के प्रति संपूर्ण समर्पण की भावना ही मां के प्रति सच्ची श्रद्धा है। -राणीदानसिंह भुट्टो, शिक्षाविद, रामदेवरा, जैसलमेर

मां की ममता की लेख में लिखी गई बात दिल को छूने वाली है। मां बलिदान समर्पण त्याग की प्रतिमूर्ति है उसका संपूर्ण जीवन अपनी औलाद के लिए समर्पित होता मां किसी देवता से कम नहीं l मनोज दवे युवा, बाडमेर
मातृ दिवस मनाना केवल एक दिन के लिए काफी नहीं है l मां 365 दिन में मातृ दिवस मनाने योग्य होती है l उसके त्याग और बलिदान को उनकी उनकी औलाद कभी नहीं भूल सकती मां किसी देवता से कम नहीं होती । प्रवीण सिंह एडवोकेट बाड़मेर

आलेख में सही लिखा है कि मां, पिता और गुरु को किसी दिन विशेष में नहीं बांधा जा सकता। यह हमेशा पूजनीय और वंदनीय हैं। सुभाष स्वामी, किराना व्यवसाययी, हनुमानगढ़ जंक्शन।

मां का जीवन में सबसे महत्वपूर्ण स्थान होता है। ऐसे में उसकी हर दिन वंदना होनी चाहिए। उसे दिन विशेष में उसे बांधना हमारी संस्कृति का परिचायक नहीं है। सुनील कुमार, अध्यापक, हनुमानगढ़ जंक्शन

माता और पिता के लिए हर दिन समर्पित है। उन्हें किसी एक दिन के जरिए याद करना ठीक नहीं। यह व्यवस्था भारतीय परंपरा में कभी थीं ही नहीं। मदर्स डे पर आलेख बेहद प्रासंगिक है। सुरेश कोलानी, निजी कर्मचारी, श्रीगंगानगर

मदर्स डे भारतीय संस्कृति में कभी था ही नहीं। यह विदेशी प्रवृति से उपजी मानसिकता रही है। हमारे यहां तो मातृ देवो भव की परंपरा रही है। रमेश मेंहदीरत्ता, व्यापारी, श्रीगंगानगर

मदर्स डे आधुनिक भौतिकवादियों की देन है। अध्यात्म से सराबोर भारतीय संस्कृति वाली मां अलग व आत्म तत्व लिए हुए है। जिसकी अनुभूति इंसान के हर कार्य व काल में रहती है। पंडित दिनेश मिश्र, सीकर

मां आकृति ही नहीं प्रकृति भी देती है। लेकिन, विकास के नाम पर दी जा रही आधुनिक शिक्षा से बुद्धिमान व धनवान बनने की चाह में आज की ‘मदर बच्चों को प्रकृति से विकृति की ओर ले जा रही है। बच्चों को संस्कारित करने के अपने मूल कर्तव्य को गौण समझ रही है। इससे भारतीय दर्शन व मानवता दोनों को नुकसान हो रहा है। उमेश शर्मा, सीकर

जीवन का कौन सा क्षण मां से बाहर हो सकता है? पत्नी में पति के प्रति मातृत्व भाव का विचार भारतीय दर्शन के बहुत निकट है। अंत में कोठारी ने बहुत ही अच्छा लिखा है कि हर दिन मां का ही दिन होता है। एक दिन मदर्स डे मना कर उसकी इतिश्री नहीं की जा सकती। -उमा शर्मा, गृहणी अजमेर

मां केवल एक शब्द नहीं संसार है। मां सृजनकर्ता है। माता को केवल एकदिवसीय मदर की भूमिका में बांधना नाकाफी है। मां जीवन पर्यन्त परिवार, समाज और प्रकृति के लिए अनवरत सेवा करती रहती है। मां अपने लिए कोई अधिकार अथवा विशेष स्थान नहीं मांगती। वह शिशु की पहली गुरू और उसे सर्वोच्च पायदान पर पहुंचाने वाली सृजक होती है। -डॉ. सुमन, रीडर राजकीय महाविद्यालय अजमेर

मां के बारे में जितना कहा जाए उतना ही कम है। माता आकृति ही नहीं देती प्रकृति में भी रूपांतरण करती है। भारत में तो युगों से माता-पिता की वंदना होती आ रही है। वन्दना सांखला, शिक्षिका, अजमेर

मां शब्द के उच्चारण मात्र से हमें ममता की छांव महसूस होने लगती है। मां शक्ति, वात्सल्य और ज्ञान की त्रिवेणी है। मां अपने आप में सृष्टि है। कोठारी जी ने जो मां शब्द की व्याख्या की है वह सटीक है। मां कष्टों को सहन करने के बावजूद अपनी संतान के सामने चेहरे पर मुस्कान लिए खड़ी रहती है। स्नेहलता पारीक, शिक्षाविद्, अजमेर

लेख में मां के स्वरूप की गीतामय व्याख्या की है तथा प्रकृति के साथ जो संबंध स्थापित किया है वह आधुनिक शिक्षा के दुष्परिणाम एवं वर्तमान पीढ़ी के मां की उपेक्षा को वास्तविक धरातल पर रेखांकित किया गया है. कोठारी भारतीय चिंतन दर्शन के श्रेष्ठ पुरोधा है. उनकी दृष्टि को समझकर आधुनिकता के साथ समन्वय करके वर्तमान में आए कोरोना जैसे संकटों का भी समाधान हो सकता है। डॉ विवेक भिण्डा, शाहपुरा

पूरी सृष्टि ही माँ की शक्ति से संचालित है। असली माँ तो प्रकृति है, जिसे हम अलग अलग नामों से जानते हैं। जो दुनिया को चला रही है, उसके लिए एक दिन नियत रखना या मनाना पर्याप्त नहीं है। आदित्य विजय, अतिरिक्त जिला शिक्षा अधिकारी, कोटा

महर्षि वेद व्यास ने भी कहा है कि 'नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः। नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।।' सृष्टि का संचालन मातृ शक्ति ही कर रही है। कुछ भी उससे इतर नहीं है। ये सही है कि केवल एक दिन मातृ वंदना के लिए निर्धारित नहीं किया जा सकता है। राधेश्याम शर्मा, राष्ट्रपति अवार्ड से सम्मानित शिक्षक, कोटा

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