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PATRIKA OPINION बराबरी का हक देने से ही मिटेगी असमानता

वर्ष 2047 तक विकसित देशों की श्रेणी में आने के हमारे लक्ष्य में यह असमानता बाधक हो सकती है। इस बाधा को दूर करने के लिए सबसे पहला काम महिलाओं की सत्ता में भागीदारी बढ़ाने का होना चाहिए।

जयपुरJun 13, 2024 / 09:31 pm

Gyan Chand Patni

आजादी के करीब 77 साल बाद भी यदि हम लैंगिक समानता के मामले में दुनिया में 77वें स्थान पर भी नहीं आ पाए हैं तो मानना पड़ेगा कि तमाम वादों और दावों के बावजूद इस मामले में रफ्तार अभी बहुत धीमी है। वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम की ताजा रिपोर्ट चौंकाने वाली भी है और हमें सीख देने वाली भी। रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि भारत में आर्थिक लैंगिक समानता का स्तर बहुत कम है। साफ शब्दों कहा जाए तो 146 देशों में हम 129वें नंबर पर ठहरते हैं। भारत में औसतन पुरुषों की 100 रुपए कमाई के मुकाबले महिलाएं &9.80 रुपए ही कमाती हैं।
कमाई के मामले में इस पिछड़ेपन की बड़ी वजह महिलाओं को उनके श्रम का उचित मूल्य नहीं मिलना भी रहा है। भारत में जिस कार्य के लिए पुरुषों को 100 रुपए मिलते हैं, उसी काम के लिए महिलाओं को केवल 52 रुपए मिलते हैं। खास बात यह कि आर्थिक लैंगिक समानता के मामले में हम पिछले साल 127वें नंबर पर थे लेकिन अब 129वें स्थान पर जा पहुंचे हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं कि देश में महिलाओं के खाते में अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल हैं। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि महिलाओं को उनका हक दिलाने में जिस गति से काम किया जाना था, हो नहीं पाया है।
फोरम की रिपोर्ट से एक बात तो साफ हो जाती है कि महिला उत्थान के तमाम दावों के बावजूद देश में यह असमानता दुनिया में हमें सवालों के कठघरे में खड़ा तो करती ही है। सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या ऐसा पुरुष प्रधान मानसिकता के कारण है? या फिर सरकारें इस दिशा में ठीक से काम ही नहीं कर पा रहीं? देश की महिलाएं आज राजनीति से लेकर प्रशासनिक उ”ा पदों पर काबिज हैं। महिला संगठन भी अपने-अपने तरीके से असमानता की इस खाई को दूर करने के लिए अनेक अभियान भी चल रहे हैं। इसके बावजूद सवाल यही खड़ा होता है कि आखिर हम पिछड़ क्यों रहे हैं? क्या सरकारी योजनाओं में खामी है या फिर योजनाओं में जान-बूझकर अड़ंगा लगाया जा रहा है?
वर्ष 2047 तक विकसित देशों की श्रेणी में आने के हमारे लक्ष्य में यह असमानता बाधक हो सकती है। इस बाधा को दूर करने के लिए सबसे पहला काम महिलाओं की सत्ता में भागीदारी बढ़ाने का होना चाहिए। चिंता इस बात की ही है कि आज भी आधी आबादी की सत्ता में भागीदारी 15 फीसदी से आगे नहीं बढ़ पा रही। जिस दिन समुचित भागीदारी हो जाएगी, असमानता दूर होने की प्रक्रिया स्वत: ही दूर हो जाएगी। जरूरत इस दिशा में ईमानदारी से काम आगे बढ़ाने की है।

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