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Patrika Opinion : सबको विश्वास में ले कर करें चुनाव सुधार

आधार की उपयोगिता को लेकर भी गाहे-बगाहे सवाल खड़े होते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट निजता के अधिकार को मूल अधिकार बता चुका है। ऐसे में इस प्रावधान से लोगों की निजता भंग नहीं होगी, इसकी गारंटी कौन देगा? खास तौर पर ऐसे दौर में, जबकि हमारे यहां डेटा सुरक्षा को लेकर कानून अभी तक नहीं बन पाया है।

नई दिल्ली

Published: December 22, 2021 08:53:43 am

आधार नंबर को वोटर आइडी से लिंक करने का बिल मंगलवार को लोकसभा के बाद राज्यसभा ने भी पास कर दिया। इस चुनाव सुधार बिल के पास होने के बाद यह उम्मीद की जा रही है कि अब एक ही व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में कई जगह दर्ज होने की समस्या से छुटकारा मिल सकेगा। एक तरह से मतदाता सूचियों में फर्जीवाड़ा रोका जा सकेगा। हालांकि आधार को वोटर आइडी से लिंक कराना स्वैच्छिक रखा गया है लेकिन यह प्रावधान किया गया है कि इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर मौजूदा वोटर से या जो लोग वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाना चाहते हैं, उनसे आधार संख्या मांग सकता है।

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बेशक, आधार को वोटर आइडी से जोडऩे के इस प्रावधान के पीछे सरकार के तर्कों में दम है। लेकिन विपक्ष ने सवाल उठाया है कि आखिर सरकार को यह बिल लाने की हड़बड़ी क्यों रही? जाहिर तौर पर उत्तरप्रदेश, पंजाब समेत पांच राज्यों में होने वाले चुनावों की छाया में प्रतिपक्ष यह सवाल उठा रहा है। आधार व वोटर आइडी को लिंक करने के खतरे भी कम नहीं। सबसे बड़ा खतरा डेटा सुरक्षा का है। डेटा लीक होने के खतरे के बीच लोगों की प्राइवेसी खत्म होने की आशंका को भी गलत नहीं ठहराया जा सकता।

बड़ा सवाल इस बात का है कि चुनाव सुधार जैसे अहम मसले पर हमारे सदनों में चर्चा आखिर क्यों नहीं होती? सरकारों की भी सदन से जुड़े मामलों में सदन के बाहर सफाई देने की आदत-सी हो गई है जिसे स्वस्थ लोकतंत्र के लिए कतई उचित नहीं कहा जा सकता। प्रतिपक्ष भी कम जिम्मेदार नहीं। अहम मौकों पर शोरगुल भी करते रहेंगे और बाद में सरकार पर यह तोहमत भी लगाएंगे कि उनकी राय नहीं ली जा रही।

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ऐसे में यह धारणा भी बन जाती है कि प्रतिपक्ष का मकसद सरकार के हर सही काम का विरोध करना ही रह गया है। आधार की उपयोगिता को लेकर भी गाहे-बगाहे सवाल खड़े होते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट निजता के अधिकार को मूल अधिकार बता चुका है। ऐसे में इस प्रावधान से लोगों की निजता भंग नहीं होगी, इसकी गारंटी कौन देगा? खास तौर पर ऐसे दौर में, जबकि हमारे यहां डेटा सुरक्षा को लेकर कानून अभी तक नहीं बन पाया है।

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मतदाता सूची में दोहराव हटाने के प्रयास सराहनीय कहे जा सकते हैं। लेकिन राजनीतिक दलों को चुनावी चंदा, चुनाव मैदान में उतरने वाले दागी, मतदाताओं को प्रलोभन देने वाली चुनावी घोषणाओं के साथ दलबदल कानून के मौजूदा प्रावधानों में निकाली जा रहीं गलियां ऐसी समस्याएं हैं, जिन पर भी सरकार व चुनाव आयोग को सबको विश्वास में लेकर ठोस कदम उठाना होगा।

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