Patrika Opinion: आखिर कैसे थमेगी घरेलू हिंसा

  • महिला उत्पीडऩ की तमाम घटनाओं के बीच घरेलू हिंसा के हजारों मामले तो घर की चौखट से बाहर आ ही नहीं पाते।

By: shailendra tiwari

Updated: 30 Sep 2020, 03:33 PM IST

महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों को लेकर हमारे देश में जितने भी कानून बने हैं, उनको देखकर तो ऐसा लगता है कि देश में महिलाएं न केवल सुरक्षित हैं, बल्कि उन्हें व्यापक अधिकार भी मिले हुए हैं। इन सबके बावजूद जब महिला उत्पीडऩ, खास तौर से घरेलू हिंसा से जुड़े मामले सामने आते हैं, तो यह सोचना पड़ता है कि क्या वाकई कानून बनाने से ही हालात बदल जाएंगे?

मध्यप्रदेश में वरिष्ठ आइपीएस अधिकारी का अपनी पत्नी को पीटने का वायरल वीडियो सामने आने के बाद मध्यप्रदेश शासन ने इस अफसर के खिलाफ कार्रवाई कर संदेश देने की कोशिश जरूर की है। ऐसी घटनाएं बता रहीं हंै कि उच्च व जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग भी महिलाओं का अपमान कर मर्यादाओं की तमाम सीमाएं लांघते दिखते हैं। महिला उत्पीडऩ की तमाम घटनाओं के बीच घरेलू हिंसा के हजारों मामले तो घर की चौखट से बाहर आ ही नहीं पाते। देश के विभिन्न हिस्सों में लॉकडाउन के दौरान आए घरेलू हिंसा के बेहिसाब मामले इसके गवाह हैं।

मध्यप्रदेश के इस समूचे घटनाक्रम को लेकर दोनों पक्षों के आरोप-प्रत्योरोप व साफ-सफाई वाले बयानों का दौर जारी है। राज्य महिला आयोग ने भी इस प्रकरण में प्रसंज्ञान ने सरकार से कार्रवाई की मांग की है। दरअसल, सरकारों की ओर से बरती जाने वाली सख्ती, महिला आयोगों की टिप्पणियां और बाद में अदालतों तक के निर्देश भी आम तौर पर तब ही आते हैं, जब महिला उत्पीडऩ के ऐसे मामले मीडिया में सुर्खिया बन जाते हैं। लेकिन घरों में सुरक्षित रहने की उम्मीद लगाए बैठे महिलाओं की तकलीफें बढ़ती ही दिखती है। सामाजिक दबाव और पारिवारिक बदनामी का डर पीडि़त महिलाओं को चुप रहने को मजबूर करता है।

आइपीएस अधिकारी का अपनी पत्नी को निर्ममता से पीटना यह भी बताता है कि घरेलू हिंसा के मामले समाज के हर तबके में हंै। कोई उच्च शिक्षा या पद हासिल कर इस समस्या से दूर रहेगा, यह उम्मीद करना भी बेमानी है। तो क्या हमारी शिक्षा प्रणाली में ही कोई खोट है? जवाब हां में इसलिए होना चाहिए, क्योंकि हमारी शिक्षा प्रणाली सबको समान समझने व खासकर अपने से कमजोर के सम्मान की रक्षा करने जैसे संस्कार देने का काम प्रभावी तरीके से नहीं कर पा रही।

सवाल यह है कि घरेलू हिंसा की पीडि़ताएं कानून की मदद मांगने से क्यों हिचकती हैं? और सवाल यह भी कि कानून आखिर ऐसे मामलों में पीडि़ताओं की मदद क्यों नहीं कर पाता? जवाब एक ही है, हालात में बदलाव की जरूरत। और, सामाजिक स्तर पर ही यह बदलाव किया जा सकता है।

shailendra tiwari
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