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PATRIKA OPINION : रोजगार को मिले सर्वोच्च प्राथमिकता तो बने बात

ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग बढऩे से रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं। इसलिए इस चुनौती को भी समझना आवश्यक है।

जयपुरJun 16, 2024 / 03:21 pm

विकास माथुर

नई सरकार ने शपथ ले ली है और नरेन्द्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बन गए हैं। भले ही उनकी पार्टी लोकसभा में पिछले दो बार की तरह पूर्ण बहुमत नहीं हासिल कर पाई, पर फिर भी वह सबसे बड़ी पार्टी है। देश के राजनीतिक इतिहास में पूर्ण बहुमत प्राप्त पार्टियों की तुलना में गठबंधन सरकारों का वर्चस्व अधिक रहा है। ऐसे में, पिछले दस वर्षों के बाद भारत की राजनीति अपने सामान्य पूर्व इतिहास के दौर में लौट आई है।
यह स्थिति उस देश के लिए आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए जहां हर संभावित पहलू विविधताओं से युक्त हैं। इस लिहाज से, लोकसभा का चुनाव एक नहीं, बल्कि 543 सीटों के लिए अलग-अलग चुनाव है। जिन मुद्दों पर चुनाव लड़े जाते हैं, उनमें से ज्यादातर स्थानीय मद्दे होते हैं। बेशक, कभी-कभी किसी करिश्माई व्यक्तित्व के कारण राष्ट्रीय लहर चल जाती है लेकिन चुनावी जीत में अक्सर अन्य कारकों की तुलना में स्थानीय मुद्दे हावी होते हैं। सवाल यह है कि नई सरकार की प्रमुख वरीयताएं क्या हों और इन प्राथमिकताओं को पूरा करने के लिए किस तरह के कदम उठाए जाएं। सबसे अहम मुद्दा रोजगार और आजीविका का है।
इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन डेवलपमेंट और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार 29 वर्ष से कम उम्र के युवाओं का बेरोजगारी प्रतिशत 83 था। ऐसे में युवा बेरोजगारी से निपटने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कुछ कारणों से यह चुनौती और भी बढ़ी है। पहला ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग से खतरा । ये मौजूदा रोजगार के विकल्पों को खत्म कर सकते हैं। मैकिन्से की रिपोर्ट की मानें तो भारत की विनिर्माण क्षेत्र की लगभग 70 फीसदी नौकरियां इसी संकट की चपेट में हैं। दूसरा कारक है-बेमेल कौशल (उम्मीदवारों का कौशल और दक्षताएं पद की अपेक्षाओं के साथ मेल न खाना)।
हमारे यहां तो नौकरियों और कौशल दोनों की कमी एक साथ है। ऐसे में हमें कौशल और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को चलाने की जरूरत है जो हमारे युवाओं को कल की नौकरियों के लिए तैयार कर सके। काम करने या सीखने से ही कौशल विकास और संवर्धन होता है जो मानव पूंजी के रूप में होता है। नई सरकार जो उपाय कर सकती है, वह है राष्ट्रव्यापी अप्रेंटिसशिप कार्यक्रम पर जोर देना। इसमें छह से नौ माह का रोजगार भी मिलेगा और नियोक्ता पर कर्मचारी को स्थाई करने का दायित्व भी नहीं रहेगा। इसकी स्वीकार्यता पूरे देश में होनी चाहिए। हालांकि, अनेक राज्यों में अप्रेंटिसशिप पॉलिसी और प्रोग्राम्स उपलब्ध हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर बड़े पैमाने पर रचनात्मक तरीके से इसके लिए और प्रयास की जरूरत है।
रोजगार बढ़ाने का एक और रास्ता है अग्निवीर कार्यक्रम। इसे तीन से चार साल तक बढ़ाना चाहिए क्योंकि चार साल की अवधि बहुत कम है। रोजगार को लेकर सरकार जिस महत्त्वपूर्ण क्षेत्र पर अपना ध्यान केंद्रित कर सकती है, वह है – छोटे उद्यमी। छोटे और लघु व्यवसायों के समक्ष ऋण और कार्यशील पूंजी, बाजार, प्रौद्योगिकी और फाइनेंशियल एंड टैक्स लिटरेसी तक पहुंच चार बड़ी चुनौतियां हैं। इन चुनौतियों के मद्देनजर केंद्र सरकार एक तंत्र बना सकती है जिससे छोटे उद्यमियों को मदद मिलेगी। बाजार तक पहुंच को ई-कॉमर्स और ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स जैसे नवाचारों के जरिए आसान बनाया जा सकता है। एमएसएमई में ऋण प्रवाह को बढ़ाया जाना चाहिए। प्रौद्योगिकी की मदद से सरकार एक मुफ्त सुपर ऐप भी ला सकती है जो टैक्स, मार्केटिंग और ग्राहक संबंध से लेकर हर चीज का ध्यान रख सके।
एक अन्य मद्दा किसानों और सुनिश्चित कीमतों से संबंधित है। अब समय आ गया है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तंत्र को कानूनी शक्ति दी जाए और इसे कानून का रूप दिया जाए। यह जरूर है कि 22 फसलों के लिए एमएसपी तभी लागू होता है, जब बाजार की कीमतें तय सीमा से कम हो जाती हैं। आंकड़ों के आधार पर कहें तो तो ऐसी स्थिति लगभग आधे समय ही आती है। लिहाजा, शुद्ध राजकोषीय बोझ उतना अधिक नहीं है जितना भय था। इसके अलावा, सरकार जब खरीद शुरू करती है तो कीमतों पर दबाव बढ़ जाता है। इस वजह से एमएसपी गारंटी की जरूरत खत्म हो जाती है। इस स्तर पर देखा जाए तो एमएसपी कानून मुख्यत: एक राजनीतिक निर्णय है लेकिन यह किसानों का विश्वास जीतेगा।
— डॉ. अजीत रानाडे

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