Patrika Opinion : चरमपंथ से निपटने के लिए चाहिए नई रणनीति

Patrika Opinion : किसी कट्टरवादी सिद्धांत के सही या गलत होने के बारे में चर्चा करना भी अंतत: कट्टरता को बढ़ावा देना ही साबित होता रहा है।

By: Patrika Desk

Updated: 10 Sep 2021, 08:37 AM IST

Patrika Opinion : सिर्फ धार्मिक ही नहीं, हर तरह के चरमपंथ (extremism) से निपटने का सिर्फ एक ही तरीका है, वह है उसे अलग-थलग करना। किसी कट्टरवादी सिद्धांत के सही या गलत होने के बारे में चर्चा करना भी अंतत: कट्टरता को बढ़ावा देना ही साबित होता रहा है। दुनिया में बढ़ती कट्टरता को देखकर हम यह समझ सकते हैं। कट्टरवादी यही चाहते हैं कि उनके बारे में चर्चा शुरू हो। ऐसी किसी भी चर्चा में उनके पास कुतर्क और हठधर्मिता के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता, इसलिए आखिरकार कोई नतीजा नहीं निकलता, पर लोग उसके बारे में सोचने जरूर लग जाते हैं। फिर धीरे-धीरे एक तरह की कट्टरता से मुकाबले के लिए दूसरे तरह की कट्टरता बढऩे लगती है।

इतिहास गवाह है कि 9/11 हमलों के बाद इस्लाम धर्मावलंबियों के खिलाफ न सिर्फ अमरीका बल्कि दुनिया के अन्य देशों में भी दूसरी तरह की कट्टरता बढ़ी। कट्टर विचारधाराओं में उभयनिष्ठ संबंध होता है। एक तरह की कट्टरता दूसरे तरह की कट्टरता को बढ़ावा देती है और फिर दोनों का सह-अस्तित्व मजबूत होता रहता है। अफगानिस्तान पर इस्लामी कट्टरपंथी समूह के कब्जे के बाद सबसे ज्यादा आशंका अंतत: सभ्य होते समाज को फिर से बर्बर युग में धकेल दिए जाने की है। चिंता की बात है कि कई देश फिर इस कोशिश में लग गए हैं कि तालिबान से चर्चा करके उसके आतंकी एजेंडे को नियंत्रण में रखने का प्रयास किया जाए और इसके बदले विश्व बिरादरी बंदूक की नोक पर स्थापित सत्ता को राजनीतिक मान्यता प्रदान कर दे। अमरीका के पीछे हटने के बाद रूस और चीन इसे एक मौके की तरह देख रहे हैं। ठीक वैसे ही, जैसे 1989 में अफगानिस्तान से तत्कालीन सोवियत संघ के पीछे हटने में अमरीका ने मौका देखा था। सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस विवादों के बीच बिचौलिया बनकर अपनी अहमियत बनाए रखना चाहता है। चीन लगातार विश्वमंच पर अपना दबदबा बढ़ाने में लगा हुआ है, तो अमरीका भी एकदम से बैकफुट पर आकर चीन को खुला मैदान नहीं देना चाहता।

भारतीय उपमहाद्वीप में चरमपंथ के खतरे

अफगानिस्तान से आतंकवाद व ड्रग्स के निर्यात का खतरा सभी देशों पर मंडरा रहा है। सबसे ज्यादा खतरा भारत को है - अफगान चरमपंथियों से भी, पाकिस्तान-चीन की जुगलबंदी से भी। पाकिस्तान की पहल पर अफगानिस्तान के पड़ोसी देशों की बैठक में अनुपस्थित रहकर रूस ने अपने रुख में बदलाव के संकेत दिए हैं। देखना है कि समयसिद्ध मित्र रूस के सुरक्षा सलाहकार जनरल नोकोलाय पेत्रुशेव के साथ भारतीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की मुलाकात क्या कोई नई रणनीति खोज पाएगी। भविष्य को इसकी जरूरत है।

Patrika Desk
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned