Patrika Opinion : नारों में न रह जाए जल बचाने का संकल्प

पेयजल किल्लत को लेकर पांच सितारा होटलों से लेकर संसद-विधानसभाओं में चिंता जाहिर की जाती है लेकिन पानी के संकट से उबरने को लेकर क्या सरकारें वाकई चिंतित हैं?

By: Patrika Desk

Published: 07 Sep 2021, 07:49 AM IST

save water : देश के 130 प्रमुख बांधों में पिछले साल के मुकाबले 16 फीसदी कम पानी आना चिंताजनक तो है ही, खतरे की घंटी से कम भी नहीं माना जा सकता। ये पहली बार नहीं, जब मानसून की बेरुखी ने संकट बढ़ाया हो। हर दो -तीन साल में कम वर्षा के हालात बनते हैं। पेयजल किल्लत (drinking water shortage) को लेकर पांच सितारा होटलों से लेकर संसद-विधानसभाओं में चिंता जाहिर की जाती है लेकिन पानी के संकट से उबरने को लेकर क्या सरकारें वाकई चिंतित हैं? यह सवाल रह-रह कर गूंजता जरूर है। देश की 140 करोड़ आबादी के लिए पानी की जरूरतों पर क्या कभी गंभीरता से विचार किया गया? विचार किया तो क्या इससे निपटने के लिए ठोस रणनीति बनाई गई? जवाब है - नहीं।

सब जानते हैं कि जल के बिना कुछ नहीं। 'जल है तो कल है' का नारा अनेक सरकारी इमारतों और पानी बचाने के लिए चलाए गए अभियानों में तो नजर आता है। लेकिन क्या हम जल को बचाना चाहते हैं? नारों में नहीं, बल्कि हकीकत में? मानसून के पूर्वानुमान अनेक बार गलत साबित हो जाते हैं। प्रकृति से हम संघर्ष नहीं कर सकते लेकिन उसके आचरण से कुछ सीख तो ले सकते हैं। दूसरे देशों की जल नीति से कुछ प्रेरणा भी ले सकते हैं। लेकिन इसे दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि सीख और प्रेरणा लेने के बावजूद हम उस पर अमल करना नहीं सीख पाए हैं। मौसम की मार हर साल कहीं मानसूनी वर्षा से बाढ़, तो कहीं सूखे के रूप में देश की बड़ी आबादी को आहत कर रही है। बाढ़ से निपटने में भी सरकारें अरबों-खरबों रुपए खर्च करती हैं और सूखे से पार पाने में भी। दशकों से चर्चा चल रही है नदियों को जोडऩे की। ताकि बाढ़ से भी बचा जा सके और सूखे से भी।

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अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय नदियों को जोडऩे की योजना पर काम शुरू हुआ था लेकिन परवान नहीं चढ़ सका। इस मुद्दे पर राजनीति नहीं करने के दावे सभी दल भले ही करते हों लेकिन अंतरराज्यीय जल विवाद इसकी पोल खोलने के लिए पर्याप्त हैं। सालों तक ये विवाद अदालतों में चलते हैं। जल बंटवारे को लेकर हिंसक झड़पों की खबरें भी आती रहती हैं।

जरूरत आज पानी की एक-एक बूंद के संरक्षण की है। पानी पैदा नहीं हो सकता, सिर्फ बचाया जा सकता है। इसके बावजूद इस मुद्दे पर जितना काम होना चाहिए, हो नहीं रहा। जरूरत है कि यह विषय सभी की प्राथमिकता में शीर्ष पर हो। अब भी इस पर ध्यान दिया जाए तो अच्छा होगा। नए बांधों के निर्माण की योजनाएं भी बनें और नदियों को जोडऩे पर नए सिरे से विचार भी हो।

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