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आपसी सहयोग से ही अंतरिक्ष का शांतिपूर्ण उपयोग संभव

  • 20 जुलाई 2022ः पहला 'अंतरराष्ट्रीय चंद्रमा दिवस'
  • 20 जुलाई 1969 को पहली बार चांद की धरती पर पहुंचा था इंसान
  • पिछले दो दशकों में दुनिया में कुछ गतिविधियां संयुक्त राष्ट्र के संकल्पों से हटकर हुई हैं, जैसे अपने उपग्रहों पर प्रहार या अनचाहे उपग्रहों का खतरनाक दूरी तक आ पहुंचना या अंतरराष्ट्रीय सहयोग से हाथ खींच लेने की बात। जमीन की लड़ाई अंतरिक्ष में न ले जाई जाए। अंतरिक्ष सबका है, जहां केवल आपसी सहयोग से ही हम आगे बढ़ सकते हैं।

Published: July 20, 2022 11:15:36 pm

रमेश चंद्र कपूर
खगोलविद, खगोल विज्ञान के इतिहास पर शोधरत

भक्त कवि सूरदास (16वीं शताब्दी) ने जब 'मैया मैं तो चंद-खिलौना लैहौं' रचा तो इस रसभरी को हम सबने लूट लिया। बालकृष्ण के दिल को उनसे ज्यादा कौन जानता है। जब भी हम चंद्रमा को देखते हैं तो मन में भाव यही उपजता है। चंद्रमा का आकर्षण ही कुछ ऐसा है। मानव जब से अपने परिवेश के प्रति सजग हुआ है, उसे हमेशा लगा जैसे चंद्रमा बुला रहा हो। यह आमंत्रण तो शाश्वत है। पहली बार यह संपन्न हुआ जब अपोलो-11 मिशन के यात्री वर्ष 1969 में 20 जुलाई के दिन (21 जुलाई 01:47 भारतीय समयानुसार) चंद्रमा पर उतरे। इतिहास में पृथ्वी से बाहर सौरमण्डल के किसी अन्य पिंड पर पृथ्वीवासियों ने पहला कदम रखा और सौगात में वहां की मिट्टी और कंकड़ वापस ले आए। तब से विभिन्न देशों के अनेक चंद्रमा मिशन संपन्न हुए हैं।
अपोलो-11 मिशन के तहत पहली बार चांद पर पहुंचा इंसान।
अपोलो-11 मिशन के तहत पहली बार चांद पर पहुंचा इंसान।,अपोलो-11 मिशन के तहत पहली बार चांद पर पहुंचा इंसान।,अपोलो-11 मिशन के तहत पहली बार चांद पर पहुंचा इंसान।,अपोलो-11 मिशन के तहत पहली बार चांद पर पहुंचा इंसान।,अपोलो-11 मिशन के तहत पहली बार चांद पर पहुंचा इंसान।
1969 के इस ऐतिहासिक कदम का जश्न चलता रहे, इस उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र ने 9 दिसंबर 2021 के दिन अपने एक संकल्प पत्र के तहत 20 जुलाई का दिन 'अंतरराष्ट्रीय चंद्रमा दिवस' घोषित किया है। संयुक्त राष्ट्र का यह संकल्प पत्र 'बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग में अंतरराष्ट्रीय सहयोग' को लेकर था। इस वर्ष यह दिवस पहली बार मनाया जाएगा। इस अवसर पर सभी देशों की उपलब्धियों को लेकर विमर्श तो होगा ही, चंद्रमा के अध्ययन और संबंधित उपयोगों को जन-जन के समक्ष रखा भी जाएगा।
अंतरिक्ष में विभिन्न देशों की सक्रियता 20वीं सदी के उत्तरार्ध में शुरू हुई। संयुक्त राष्ट्र इसके प्रति आरंभ से ही सजग रहा है। 10 अक्टूबर 1967 के दिन 'अंतरिक्ष संबंधी मैग्ना कार्टा' प्रभाव में आया। इसमें चंद्रमा और अन्य अंतरिक्ष पिंडों समेत बाह्य अंतरिक्ष के उपयोग को लेकर विभिन्न देशों द्वारा सक्रियता संपन्न करने के सिद्धांतों का पालन करने के दिशा-निर्देश हैं। वर्ष 2021 के संकल्प पत्र में यह बात स्पष्ट की गई है कि विभिन्न राष्ट्र अंतरिक्ष में नियम-कायदों का पालन करते हुए शस्त्रों की दौड़ से बचें और अंतरिक्ष का अध्ययन और खोजबीन का उद्देश्य मानव कल्याण हो। प्राकृतिक आपदाओं के दूरगामी प्रभावों के मद्देनजर आपदा प्रबंधन के लिए सभी राष्ट्र प्रतिबद्ध हों और विशेष तौर पर विकासशील देशों के हितों का ध्यान रखते हुए उनकी राष्ट्रीय अंतरिक्ष नीतियों के निर्धारण में सहयोगी हों। अंतरिक्ष विज्ञान और तकनीक का स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और वातावरण संबंधी मामलों में अहम योगदान है। सदस्य राष्ट्र अंतरिक्ष में बढ़ते कचरे व अंतरिक्ष में पिंडों के पारस्परिक टकराव की बढ़ती संभावनाओं के प्रति अधिक सचेत और तत्संबंधी तकनीक के विकास में क्रियाशील हों। ऐसे में आवश्यक सूचनाओं का आदान-प्रदान और आपसी सहयोग बेहद जरूरी है।
भारत का अपना अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम भी हो, इस आशय से वर्ष 1962 में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने एक राष्ट्रीय समिति 'इन्कोस्पार' का गठन किया था। इसके सभापति थे डॉ. विक्रम साराभाई। इन्हें डॉ. होमी भाभा का ठोस सहयोग मिला। साराभाई ने भविष्य की संभावनाओं को भांपा कि भारत आने वाले समय में जन विकास की दिशा में विज्ञान और तकनीक के सदुपयोग के जरिए विकसित देशों से कैसे जुड़ेगा। चंद्रमा पर नील आर्मस्ट्रॉन्ग के पग धरने के कुछ सप्ताह बाद ही 15 अगस्त 1969 को 'इन्कोस्पार' का भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के रूप में गठन हुआ था। भारत का अपना तैयार किया हुआ भूपग्रह 1975 में अंतरिक्ष में प्रक्षेपित हुआ। आज इसरो का स्थान विश्व की सर्वश्रेष्ठ अंतरिक्ष संस्थाओं के समकक्ष है। इसरो अंतरिक्ष यात्रियों को निकट अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी में है। एक दिन हम भी चंद्रमा पर पग धरेंगे। अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग के लिए भारत भी कटिबद्ध है। हालांकि पिछले दो दशकों में दुनिया में कुछ गतिविधियां संयुक्त राष्ट्र के संकल्पों से हटकर हुई हैं, जैसे अपने उपग्रहों पर प्रहार या अनचाहे उपग्रहों का खतरनाक दूरी तक आ पहुंचना या अंतरराष्ट्रीय सहयोग से हाथ खींच लेने की बात। जमीन की लड़ाई अंतरिक्ष में न ले जाई जाए। अंतरिक्ष सबका है, जहां केवल आपसी सहयोग से ही हम आगे बढ़ सकते हैं।

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