मोबाइल फोन को लेकर नया डर, सोशल मीडिया से बन रही है दूरियां

मोबाइल फोन को लेकर नया डर, सोशल मीडिया से बन रही है दूरियां

Vikas Gupta | Updated: 12 Jun 2018, 06:57:17 PM (IST) विचार

मोबाइल की अद्यतन टेक्नोलॉजी ने मानव को संवेदनहीन बनाने का काम किया है।

मोबाइल के आने से मनुष्यों के जीवन में बहुत बदलाव आया है। शुरुआती दिनों में यह सकारात्मक प्रभाव लिए था। लेकिन जैसे-जैसे समय के साथ मोबाइल के टेक्नोलॉजी में बदलाव आता गया, मनुष्यों में सोचने-समझने की शक्ति का अभाव महसूस होने लगा। एक-दूसरे से सम्पर्क में रहने का ये सरल माध्यम धीरे-धीरे दूरियों का वाहक बनने लगा। अक्सर यह सुनने या देखने को मिलता है कि लोग किसी दुर्घटना में घायल लोगों की मदद के बजाय उस घटना की रिकॉर्डिंग करने में व्यस्त रहते हैं। इस पर अनेक जोक्स सोशल मीडिया पर घूमते रहते हैं। मोबाइल की अद्यतन टेक्नोलॉजी ने मानव को संवेदनहीन बनाने का काम किया है। सोशल मीडिया पर हर बात को पोस्ट करने की लत ने वास्तविक जीवन में दूरी बढ़ा दी है। फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और न जाने क्या-क्या.. इन सब पर हर समय नोटिफिकेशन की चाहत कब 'लत' में तब्दील हो रही, पता ही नहीं चलता । सुबह आंख खुलने से लेकर रात बिस्तर पर जाने तक..हर समय हाथ में मोबाइल रहता है। एक सर्वे के अनुसार लोग नामोफोबिया के शिकार हो रहे। नामोफोबिया यानी मोबाइल खो जाने या पास न होने का डर। किसी तकनीक पर इतनी निर्भरता कि उसके बिना जीवन बेमानी लगने लगे।

कुछ ऍप्स ऐसे आने लगे हैं जो व्यक्ति को उसकी असल शक्ल से कुछ बेहतर दिखाते हैं। खुद को खूबसूरत देखना हर कोई चाहता है। पर इस तरह बनावटी खूबसूरती इंसान को डिप्रेस करती है। जीवन की सच्चाई से दूर फोटो में तो आप खूबसूरत दिख सकते हैं, लेकिन यथार्थ में अपनी शक्ल बदल नहीं सकते।मोबाइल का यह एक पक्ष भर है। मोबाइल ने पूरी दुनिया अपने में समेट ली है और इसके सहारे एक सुविधायुक्त जीवन हम जी रहे हैं। एक क्लिक पर जानकारियों का अथाह सागर उपलब्ध हो जाता है। इसके कई सकारात्मक पहलू हैं। सूचनाएं त्वरित गति से हम तक पहुंच जाती हैं। जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से मोबाइल का सीधा संबंध है। बिजली, पानी,गैस बिल , इंटरनेट बैंकिंग सब सम्भव है मोबाइल से।

पर फिर भी यह ध्यान देना आवश्यक है कि कहीं हम मोबाइल के गिरफ्त में कैद तो नहीं हो रहे। फोन कंपनियां रोज नये फीचर्स ले आ रहीं। टच स्क्रीन और इंटरनेट की सहज उपलब्धता के कारण मोबाइल ऑक्सीजन की तरह आवश्यक लगने लगा है। यह सिर्फ दूसरों की नहीं, मेरी अपनी बात भी है। आँख खुलते ही हाथ में फोन होना चाहिये। अक्सर मेट्रो में आते-जाते गर्दन झुकाये मोबाइल में झाँकते लोग दिख जायेंगे। यहाँ तक कि छोटे बच्चे भी इस तकनीक से इस कदर जुड़ गए हैं कि उनके खिलौने के रुप मे भी मोबाइल आने लगा है।

मोबाइल एडिक्शन की तरह जीवन में शामिल हो चुका है। पिछले दिनों केलिफोर्निया में 4जून से 8 जून तक हुए एप्पल कॉन्फ्रेंस में इस पर चिंता व्यक्त की गई। एप्पल के सीईओ टीम कुक ने स्क्रीन टाइम नामक नये ios सेक्शन की घोषणा की। जिसके द्वारा आप अपने फोन को कितने समय तक इस्तेमाल करना चाहते हैं ,उसकी समय सीमा खुद तय कर सकेंगे। आगे आने वाले समय में लोग खुद इन बातों पर गम्भीरता से विचार करेंगे क्योंकि जिस गति से समाज असंवेदनशील होता जा रहा है, उसे रोकने की आवश्यकता है। सोशल मीडिया में खुद से जुड़ी हर बात पोस्ट करना और उस पर प्रतिक्रिया पाना, अपनी सदाशयता को बढ़-चढ़ के प्रचारित करना , कारण जो भी हों, आत्म- मुग्धता बढ़ रही है, इससे पहले कि पार्कों से उठते अट्टहास को खुशी का मानक मान लिया जाए , समय है सचेत हो जाने का..ठहर कर सोचने का। तकनीक के गुलाम होने के बजाय समझदारी से उसका उपयोग करने का।

- क्षमा सिंह

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