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Patrika Opinion: राजनीति व अपराध का खतरनाक घालमेल

राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का यह तो विकृत रूप ही कहा जाएगा जिसमें चुनाव के मौके पर किसी को अपने खेमे में लाने के लिए अपहरण कर लंबे समय तक बंधक बनाने तक का दुस्साहस होने लगे।

Published: March 21, 2022 04:05:00 pm

राजनीति और अपराध का घालमेल, चुनाव सुधारों के प्रयासों में बड़ी चुनौती के रूप में उभरा है। यह इसलिए भी क्योंकि कभी शिकायत सिर्फ यही रहती थी कि राजनेताओं की शह पर ही अपराधियों को प्रश्रय मिलता है लेकिन अब तो राजनेता खुद ही अपराधों में लिप्त होते दिखने लगे हैंं। उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी के विधायक बने महेन्द्र नाथ यादव के घर में चार माह से परिवार सहित बंधक बनाए गए दूसरे नेता को जब पुलिस दबिश देकर छुड़ाए तो राजनीति का यह बदरंग स्वरूप खुलकर सामने आता है।
ऐसा नहीं है कि ऐसी घटना कोई पहली बार हुई हो। दबंगई के ऐसे किस्से सिर्फ चुनाव के मौके पर ही सामने आते हों, ऐसा भी नहीं है। लेकिन राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का यह तो विकृत रूप ही कहा जाएगा जिसमें चुनाव के मौके पर किसी को अपने खेमे में लाने के लिए अपहरण कर लंबे समय तक बंधक बनाने तक का दुस्साहस होने लगे। महेन्द्र नाथ यादव विधायक चुने जाने के पहले अपनी पार्टी के जिलाध्यक्ष थे। पुलिस पड़ताल में जो तथ्य सामने आए हैं उनके अनुसार अपहृत किए गए नेता रामकुमार गत वर्ष मई में हुए पंचायत चुनाव में बीजेपी के टिकट पर ब्लॉक प्रमुख का चुनाव जीते थे। बाद में वे सपा में शामिल हो गए। तब से ही रामकुमार का पता नहीं चल रहा था। रामकुमार ने किसी तरह से अपने एक रिश्तेदार को फोन पर आपबीती सुनाई, तब जाकर पुलिस हरकत में आई। अपहरण और बंधक बनाने की इस कहानी का पूरा खुलासा तो पुलिस की जांच में ही होगा लेकिन बड़ी चिंता इस बात की है कि धनबल और बाहुबल का इस्तेमाल करने वालों का राजनीति में प्रवेश बढ़ता ही जा रहा है। चुनावी रंजिश के चलते आए दिन हिंसा के जो मामले सामने आते हैं उसकी बड़ी वजह भी यही है कि सियासी सुरक्षा कवच पहनकर राजनेता खुद उन कामों को अंजाम देने लगे हैं जिन्हें पहले वे अपने गुर्गों से कराते थे। कानून की समझ रखते हुए भी ये राजनेता अपने ही बनाए कानून-कायदों को धता बताने से नहीं चूकते।
यह बदनुमा तस्वीर कोई एक राजनीतिक दल की हो, ऐसा भी नहीं है। सबसे बड़ी वजह यही है कि राजनीतिक दल आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को गले लगाते हुए टिकट देने में जुटे हैं। जिन्हें जेल की सींखचों के पीछे होना चाहिए वे लोकतंत्र के मंदिरों को अपवित्र करने की कसम खाए बैठे हैं। ऐसे में चुनाव सुधारों को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले राजनीतिक दलों के कर्ता-धर्ताओं को ही समझना होगा कि 'काठ की हांडीÓ बार-बार नहीं चढ़ सकती। राजनेताओं ने इस बुराई का साथ नहीं छोड़ा तो यह भी हम देख रहे हैं कि मतदाता मौका पडऩे पर विकल्प अपनाने में देर नहीं लगाते।
प्रतीकात्मक चित्र
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