विश्वास खोती पुलिस

सुन रहे हैं कि राजस्थान पुलिस की वर्दी बदलने वाली हैं। अब उसमें पहले से बड़ी जेबें लगाई जाएंगी। नाम भी कशीदे से लिखा जाएगा।

Bhuwanesh Jain

29 Feb 2020, 01:23 PM IST

- भुवनेश जैन

सुन रहे हैं कि राजस्थान पुलिस की वर्दी बदलने वाली हैं। अब उसमें पहले से बड़ी जेबें लगाई जाएंगी। नाम भी कशीदे से लिखा जाएगा। राजस्थान पुलिस की तेजी से बिगड़ती छवि को निखारने के लिए कशीदेकारी की बात तो समझ में आती हैं, पर जेबें बड़ी बनाने का राज पुलिस महकमा ही जानता होगा!

राजस्थान, और खासतौर से जयपुर शहर जिस तरह अपराधियों का स्वर्ग बनता जा रहा है, उससे पुलिस की छवि इतनी दागदार हो चुकी है कि शायद ही किसी तरह की कशीदाकारी इन दागों को छुपा सके। राजधानी के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले सिविल लाइन्स इलाके में जब विधायक के साथ ही लूट हो जाए तो निरीह जनता किसकी ओर देखे। जब पुलिस आयुक्तालय के पास ही निरंकुश गति से चलता ट्रक दो लोगों की जान ले ले तो यहां की सडक़ें किसके लिए सुरक्षित हैं। अपराधों के शिकार लोग थानों में जाने से डरते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि यहां उनके साथ और भी बड़ी लूट हो सकती है। उन्हें लगता है कि वहां पीडि़त की कम, अपराधियों की ज्यादा सुनवाई होती है।

पूरे राजस्थान में कहीं दलितों पर मध्ययुगीन अत्याचारों की खबरें आ रही हैं तो कहीं हिरासत में मौतों की। अभी बाड़मेर में हिरासत में मौत के बाद थाने को लाइन हाजिरी की सजा देने का ढोंग किया गया है तो अगले दिन श्रीगंगानगर में पुलिस पिटाई से मौत का समाचार आ गया। राजस्थान में पुलिस अपनी मर्दानगी कमजोर लोगों पर निकालने के लिए कुख्यात हो चुकी है। पुलिस ही क्यों स्वास्थ्य और परिवहन विभाग का भी यही हाल है। यहां बच्चों के इलाज का पैसा निजी सुख-सुविधाओं को जुटाने पर खर्च कर दिया जाता है। बस माफिया को छूट है- पैसे खिलाकर बिना फिटनैस वाहन चलाओ और बेधडक़ जनता की जिंदगी से खेलों। बच्चे मरे या यात्री। किसी को क्या फर्क पड़ता है।

सरकार बदल गई, मगर बजरी माफिया पुलिस की देखरेख में निरंतर फलफूल रहा है। कई जगह विरोध करने वालों की जान चली गईं, लेकिन अफसरों-नेताओं का पेट पाप की कमाई से भरता ही नहीं। महिला अत्याचारों की स्थिति ज्यों की त्यों है। आए दिन बलात्कार की खबरें आती हैं, लेकिन ‘बेटी बचाओ’ के नकली नारे लगाते हुए हमारी आंखे शर्म से नहीं झुकती। ज्यादा शारे-मचे तो छोटे-मोटे कर्मचारियों को निलंबित कर दो। शोर थमने पर बहाली की गारंटी के साथ। गाहे-बगाहे कुछ वाहन-चोरों को पकड़ कर पुलिस ऐसे सीना तानती दिखाई देती है मानों सीमा पर जंग जीत ली हो।

राजस्थान पुलिस में अच्छे अफसर और कर्मचारी भी कम नहीं है। पर अच्छाई ही उनकी दुश्मन बन गई है। क्लर्की जैसे कामों पर लगा कर उन्हें ‘सिस्टम’ से हटा दिया जाता है।

कई जगह लोग कानून हाथ में ले रहे हैं। पुलिस पर हाथ उठा देते हैं। पुलिस को सोचना होगा उसकी छवि बिगड़ती क्यों जा रही है। विश्वास बढऩे की बजाए अविश्वास क्यों बढ़ रहा है। क्यों लोग पुलिस थानों से दूर होकर निकलना चाहते हैं। क्यों हर बैरिकेड पर वाहन रोकते ही लोगों के मन में एकदम यही बात आती है कि ‘‘अब यहां पैसे वसूल किए जाएंगे।’’ क्या किसी अफसर को इसकी चिंता है। राजनेताओं को तो नहीं होगी। उनके लिए तो पुलिस एक उपकरण मात्र है-ताकत दिखाने और पैसा कमाने का। राजनेता तो आएंगे-जाएंगे-जनता का पुलिस से विश्वास पूरी तरह उठ गया तो वे अपने बच्चों तक से नजर नहीं मिला पाएंगे।

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