सियासी मजबूरियों ने बढ़ाई नजदीकी

सियासी मजबूरियों ने बढ़ाई नजदीकी
Nitish Kumar

Shankar Sharma | Updated: 27 Jul 2017, 10:14:00 PM (IST) विचार

बिहार की राजनीति में पिछले चौबीस घंटों में बदलाव कोई अचानक हुआ हो ऐसा नहीं है। तात्कालिक राजनीतिक मजबूरियों के चलते नीतीश कुमार ने अपने धुर विरोधी लालू यादव से हाथ तो मिला लिया लेकिन गठबंधन सरकार में वे खुद को असहज महसूस करने लगे थे


मणिकांत ठाकुर राजनीतिक टिप्पणीकार

बिहार की राजनीति में पिछले चौबीस घंटों में बदलाव कोई अचानक हुआ हो ऐसा नहीं है। तात्कालिक राजनीतिक मजबूरियों के चलते नीतीश कुमार ने अपने धुर विरोधी लालू यादव से हाथ तो मिला लिया लेकिन गठबंधन सरकार में वे खुद को असहज महसूस करने लगे थे। लालू परिवार पर कसे जा रहे शिकंजे के बाद हालात बदल गए और फिर...

बिहार में पिछले चौबीस घंटे में आए राजनीतिक भूचाल से किसी को अचरज नहीं होना चाहिए। मुख्यमंत्री पद से नीतीश कुमार के इस्तीफे और अगले ही दिन भाजपा के सहयोग से उनका फिर सत्ता पर काबिज होना बताता है कि राजनीति में कभी कोई स्थायी मित्र और शत्रु नहीं होता। नीतीश के पास सत्ता में बने रहने के लिए इसके अलावा कोई चारा नहीं था।

मजबूरियां ऐसी बनीं कि वे जिस पार्टी को कोसते रहे उसका ही समर्थन लेना पड़ा। दरअसल, हालात ऐसे बन गए थे कि बिहार में महागठबंधन के तीन में से दो दल यानी जनता दल (यूनाइटेड) और लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का साथ रहना मुश्किल हो गया था। इसका बड़ा कारण यही रहा कि बिहार की सत्ता में साझेदारी के बाद लालू परिवार की महत्वाकांक्षाएं बढ़ गईं थीं। प्रदेश में सबसे बड़े दल के रूप में उभरा राजद अपना 'वाजिब' हक मांग रहा था।

पिछले छह माह से तो अंदरूनी तौर पर इस तरह के प्रयास शुरू हो गए थे कि उपमुख्यमंत्री व लालू पुत्र तेजस्वी यादव को आगे लाया जाए। यानी नीतीश पर एक तरह से दबाव था कि वे बिहार को राजद के लिए छोड़ें और खुद केन्द्र की राजनीति में जाएं। ये प्रयास नीतीश को किसी भी सूरत में गवारा नहीं थे। दरअसल, ताजा राजनीतिक ड्रामे की पटकथा तो तब से ही लिखी जा चुकी थी जब नीतीश ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नोटबंदी के फैसले का खुलकर समर्थन किया। इतना ही नहीं नीतीश ने प्रधानमंत्री को यह भी सुझाव दिया कि उनको बेनामी संपत्ति रखने वालों पर भी सख्त कदम उठाने चाहिए। सीधे तौर पर यह लालू परिवार पर निशाना था।

लालू परिवार की बेनामी संपत्तियों की जानकारी भी जुटाने का दौर पहले ही शुरू हो गया होगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। दोनों दलों में वैचारिक अलगाव उस समय और बढ़ गया जब नीतीश ने राष्ट्रपति चुनाव में राजग उम्मीदवार का समर्थन कर दिया। जहां तक बिहार विधानसभा चुनावों में बने महागठबंधन का सवाल है, यह भी राजनीतिक मजबूरियों का ही नतीजा था। भाजपा से दूरियां बना चुके नीतीश के पास राजद का सहयोग लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव नतीजों ने लालू व नीतीश दोनों को डरा दिया था।

इन्हें लगने लगा था कि यदि मिलकर चुनाव मैदान में नहीं गए तो हो सकता है कि राजद व जद (यू) दोनों को बिहार ही नहीं देश की राजनीति में भी हाशिए पर आना पड़ जाए। कांग्रेस तो बिहार में पहले से ही मरणासन्न है लेकिन साम्प्रदायिकता की खिलाफत का मुद्दा मजबूत करने के लिए उसका साथ भी जरूरी था। हमें बिहार व उत्तरप्रदेश की राजनीतिक परिस्थितियों में अंतर को भी समझना होगा।

चुनावों के दौरान उत्तरप्रदेश में समुदाय विशेष का ध्रुवीकरण होता है तो बिहार में जाति विशेष का। यह कहा जा रहा है कि नीतीश की सुशासन बाबू की जो छवि बनाई गई वह भी उनकी कामयाबी का कारण रहा। अब चूंकि नीतीश ने लालू कुनबे के दबावों से मुक्ति पा ली है इसलिए देखना यह है कि क्या भाजपा के साथ तालमेल कर वे प्रदेश को विकास की ओर ले जा सकेंगे? उन्होंने यह बात कही भी है कि प्रदेश के विकास की खातिर ही भाजपा का साथ लिया गया है।

नीतीश ने कभी यहां तक बयान दिए थे कि अब वे भाजपा से कभी भूल कर भी हाथ नहीं मिलाएंगे। वहीं नरेन्द्र मोदी के 'कांग्रेस मुक्त भारत' के नारे का जवाब यह कहते हुए देते थे कि वे 'संघ मुक्त भारत' बनाने में सहयोग करेंगे। राजनीतिक जुमले अपनी जगह हैं और हकीकत अपनी जगह। यह बात बिहार ही नहीं समूचे देश के राजनीतिक परिदृश्य में लागू होती है। हां, इतना जरूर है कि लालू यादव का साथ छोड़कर नीतीश ने यह संदेश देने की कोशिश अवश्य की है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टोलरेंस' की नीति पर वे कायम हैं।

इसीलिए लालू परिवार के बेनामी संपत्तियों के प्रकरण सामने आने के बाद उन्होंने यह कदम उठाया है। यह बात भी  देखनी होगी कि जिस तरह से लालू परिवार के खिलाफ तथ्य जुटाकर शिकंजा कसा गया है, उनके बचाव की उम्मीद कम ही रह गई है। नीतीश के प्रधानमंत्री बनने का सपना अभी दूर-दूर तक पूरा होता नहीं दिख रहा।

इसलिए शायद नीतीश ने ये ही मुनासिब समझा कि प्रदेश की राजनीति में ही रहा जाए। रहा सवाल वर्ष 2019 के आम चुनावों का, ऐसा लगता नहीं कि पस्त विपक्ष एकजुट होकर भाजपा के विजय रथ को रोक पाने की तैयारियां कर पाएगा। चाहे मुलायम सिंह हो या फिर लालू यादव, मायावती हो या ममता बनर्जी सबकी अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं। इनमें से कोई भी किसी एक को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाने पर शायद ही सहमत हों।

बहरहाल, बिहार में भाजपा-जद यू का यह गठबंधन क्या सचमुच बिहार को  विकास की राह पर ले जा सकेगा? क्या लालू यादव कुनबे का राजनीतिक अवसान हो गया है? क्या लालू आसानी से हार मान पाएंगे? क्या बिहार में जातिवाद का जहर कम हो पाएगा? ये अहम सवाल प्रदेश की राजनीति  से जुड़े हैं। हां, भारतीय जनता पार्टी ने बिहार जैसे बडे प्रदेश की सत्ता पर काबिज होकर आगामी आम चुनावों में बिहार में भी कुछ नया करने की तैयारी जरूर कर ली है।
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