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Patrika Opinion: राजनीतिक असहिष्णुता लोकतंत्र के लिए अशुभ

पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद से लगातार हो रही हिंसा में कार्यकर्ताओं की मौत सभी राजनीतिक दलों के मुंह पर करारे तमाचे से कम नहीं है। यह तमाचा उन दलों के मुंह पर तो है ही, जो हिंसा में पर्दे के पीछे से शामिल हैं। तमाचा उन दलों के लिए भी है, जो राजनीतिक हिंसा को लेकर अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया देते हैं या फिर मौन साधकर चुप बैठ जाते हैं।

 

Published: March 29, 2022 03:34:12 pm

बीरभूम हिंसा मामले पर बहस की मांग को लेकर पश्चिम बंगाल विधानसभा में सोमवार को हुई अप्रिय वारदात लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं मानी जा सकती। सदन के भीतर विधायकों के बीच मारपीट और फिर विधायकों का निलंबन पश्चिम बंगाल की स्थायी पहचान में तब्दील होता जा रहा है। प. बंगाल में चुनाव के बाद से लगातार हो रही हिंसा में कार्यकर्ताओं की मौत सभी राजनीतिक दलों के मुंह पर करारे तमाचे से कम नहीं है। यह तमाचा उन दलों के मुंह पर तो है ही, जो हिंसा में पर्दे के पीछे से शामिल हैं। तमाचा उन दलों के लिए भी है, जो राजनीतिक हिंसा को लेकर अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया देते हैं या फिर मौन साधकर चुप बैठ जाते हैं।

प्रतीकात्मक चित्र
प्रतीकात्मक चित्र
आजादी के बाद से देश में चुनावी हार-जीत होती आ रही है। जीतने वाले तब जीत का जश्न मनाते थे तो हारने वाले उसे स्वीकार करते थे। धीरे-धीरे जीत और हार को पचाने का माद्दा कम होता जा रहा है। हर दल किसी भी कीमत पर बस हर चुनाव जीतना चाहता है। इस जीत और हार से उपजी आशा-निराशा इस राजनीतिक हिंसा को बढ़ावा दे रही है। राजनीतिक कटुता और चुनावी हिंसा देश के हर हिस्से में देखने को मिलती है लेकिन प. बंगाल के हाल बिल्कुल बेहाल हैं। राजनीतिक हिंसा में लोगों को जिंदा जलाया जा रहा है। आश्चर्य तब होता है जब कुछ दल इस हिंसा में भी राजनीतिक रोटियां सेकने की कोशिश करते दिखते हैं।
देश का मतदाता राजनीतिक रूप से जितना परिपक्व होता जा रहा है, हमारे नेता उतनी ही अपरिपक्वता दिखा रहे हैं। विधानसभा के भीतर अगर विधायक एक-दूसरे के कपड़े फाड़ेंगे तो सड़क पर कार्यकर्ताओं से क्या ही उम्मीद की जा सकती है। पिछले दिनों पांच राज्यों में मुख्यमंत्रियों के शपथ ग्रहण समारोह में विपक्षी दलों का शामिल नहीं होना राजनीतिक असहिष्णुता का जीता-जागता उदाहरण है। आज के दौर में राजनीतिक दल एक-दूसरे को विरोधी नहीं, अपितु 'शत्रु' की तरह समझने लगे हैं। दुख की बात ये कि इसे रोकने की दिशा में कोई पहल होती नहीं दिख रही। राष्ट्रीय मुद्दों पर होने वाली सर्वदलीय बैठकें भी खानापूर्ति बनती जा रही हैं। प. बंगाल में पिछले तीन-चार सालों से जो माहौल बना है, उसे रोकना सबकी जिम्मेदारी है। लोकतंत्र में सत्ता आती-जाती रहती है लेकिन आम जन का विश्वास लोकतंत्र पर बना रहना चाहिए। संसद और विधानसभाएं लोकतंत्र के मंदिर हैं, लिहाजा इनकी पवित्रता बनाए रखने के लिए हरसंभव उपाय किए जाने चाहिए।

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